334 करोड़ का रबर डैम बेअसर, फल्गु नदी सूखी:गया में पिंडदानियों को पानी की परेशानी, पंडा बोले- प्रकृति से छेड़छाड़ का परिणाम सामने

334 करोड़ का रबर डैम बेअसर, फल्गु नदी सूखी:गया में पिंडदानियों को पानी की परेशानी, पंडा बोले- प्रकृति से छेड़छाड़ का परिणाम सामने

आस्था और मोक्ष की भूमि माने जाने वाले गयाजी में इन दिनों पिंडदानियों को जल संकट का सामना करना पड़ रहा है। फल्गु नदी, जो धार्मिक कर्मकांडों के लिए महत्वपूर्ण है, सूखे और गंदे पानी की समस्या से जूझ रही है। विष्णुपद मंदिर और फल्गु नदी के तट पर देश-विदेश से श्रद्धालु पितृपक्ष समेत पूरे वर्ष पिंडदान के लिए आते हैं। हालांकि, इस बार उन्हें धार्मिक अनुष्ठान के लिए आवश्यक शुद्ध जल उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। स्थानीय पंडा गजाधर लाल कटियार ने इस स्थिति पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि “प्रकृति से छेड़छाड़ का परिणाम सामने है।” उन्होंने आरोप लगाया कि रबर डैम बनने के बाद फल्गु का स्वरूप बिगड़ गया है और सरकार के दावों के विपरीत, पिंडदानियों और स्थानीय लोगों को पानी के लिए तरसना पड़ रहा है। गर्मी शुरू होते ही डैम का पानी सूखा करीब 334 करोड़ रुपये की लागत से बना रबर डैम, जिसे आधुनिक तकनीक का उदाहरण बताया गया था, अब सवालों के घेरे में है। वर्ष 2022 में शुरू की गई इस परियोजना का उद्देश्य फल्गु नदी में साल भर पानी बनाए रखना था, ताकि पिंडदानियों को सुविधा मिल सके। लेकिन गर्मी शुरू होते ही डैम का पानी या तो सूख जाता है या इतना दूषित हो जाता है कि उसका उपयोग करना मुश्किल हो जाता है। डैम में जमा पानी पूजा सामग्री, फूल-पत्तियों और कचरे से दूषित हो जाता है। कई बार स्थिति इतनी खराब हो जाती है कि प्रशासन को डैम का पानी छोड़ना पड़ता है। हाल ही में अप्रैल महीने में भी पानी डाउनस्ट्रीम छोड़ दिया गया था, जिसके बाद डैम पूरी तरह सूख गया। तकनीकी समाधान के रूप में रबर डैम बनाया कहा जाता है कि माता सीता ने इसे ‘अंत:सलिला’ होने का श्राप दिया था। कथा के अनुसार, भगवान राम अपने पिता दशरथ का पिंडदान करने यहां आए थे। उस दौरान हुई एक घटना के बाद सीता ने फल्गु नदी को श्राप दिया, जिसके कारण यह नदी ऊपर से सूखी दिखाई देती है और इसका जल धरती के भीतर बहता है। हालांकि, आधुनिक दौर में इस पौराणिक मान्यता को चुनौती देने के लिए तकनीकी समाधान के रूप में रबर डैम बनाया गया, लेकिन वर्तमान हालात देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि यह प्रयास पूरी तरह सफल नहीं हो पाया है। लोगों का कहना है कि यह सिर्फ तकनीकी विफलता नहीं, बल्कि रखरखाव की कमी और योजना की कमजोर क्रियान्वयन का नतीजा है। इस संबंध में गया के जिलाधिकारी शशांक शुभंकर से रबर डैम सुखा होने को लेकर प्रतिक्रिया लेना चाहा तो उन्होंने कॉल रिसीव नहीं किया। आस्था और मोक्ष की भूमि माने जाने वाले गयाजी में इन दिनों पिंडदानियों को जल संकट का सामना करना पड़ रहा है। फल्गु नदी, जो धार्मिक कर्मकांडों के लिए महत्वपूर्ण है, सूखे और गंदे पानी की समस्या से जूझ रही है। विष्णुपद मंदिर और फल्गु नदी के तट पर देश-विदेश से श्रद्धालु पितृपक्ष समेत पूरे वर्ष पिंडदान के लिए आते हैं। हालांकि, इस बार उन्हें धार्मिक अनुष्ठान के लिए आवश्यक शुद्ध जल उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। स्थानीय पंडा गजाधर लाल कटियार ने इस स्थिति पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि “प्रकृति से छेड़छाड़ का परिणाम सामने है।” उन्होंने आरोप लगाया कि रबर डैम बनने के बाद फल्गु का स्वरूप बिगड़ गया है और सरकार के दावों के विपरीत, पिंडदानियों और स्थानीय लोगों को पानी के लिए तरसना पड़ रहा है। गर्मी शुरू होते ही डैम का पानी सूखा करीब 334 करोड़ रुपये की लागत से बना रबर डैम, जिसे आधुनिक तकनीक का उदाहरण बताया गया था, अब सवालों के घेरे में है। वर्ष 2022 में शुरू की गई इस परियोजना का उद्देश्य फल्गु नदी में साल भर पानी बनाए रखना था, ताकि पिंडदानियों को सुविधा मिल सके। लेकिन गर्मी शुरू होते ही डैम का पानी या तो सूख जाता है या इतना दूषित हो जाता है कि उसका उपयोग करना मुश्किल हो जाता है। डैम में जमा पानी पूजा सामग्री, फूल-पत्तियों और कचरे से दूषित हो जाता है। कई बार स्थिति इतनी खराब हो जाती है कि प्रशासन को डैम का पानी छोड़ना पड़ता है। हाल ही में अप्रैल महीने में भी पानी डाउनस्ट्रीम छोड़ दिया गया था, जिसके बाद डैम पूरी तरह सूख गया। तकनीकी समाधान के रूप में रबर डैम बनाया कहा जाता है कि माता सीता ने इसे ‘अंत:सलिला’ होने का श्राप दिया था। कथा के अनुसार, भगवान राम अपने पिता दशरथ का पिंडदान करने यहां आए थे। उस दौरान हुई एक घटना के बाद सीता ने फल्गु नदी को श्राप दिया, जिसके कारण यह नदी ऊपर से सूखी दिखाई देती है और इसका जल धरती के भीतर बहता है। हालांकि, आधुनिक दौर में इस पौराणिक मान्यता को चुनौती देने के लिए तकनीकी समाधान के रूप में रबर डैम बनाया गया, लेकिन वर्तमान हालात देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि यह प्रयास पूरी तरह सफल नहीं हो पाया है। लोगों का कहना है कि यह सिर्फ तकनीकी विफलता नहीं, बल्कि रखरखाव की कमी और योजना की कमजोर क्रियान्वयन का नतीजा है। इस संबंध में गया के जिलाधिकारी शशांक शुभंकर से रबर डैम सुखा होने को लेकर प्रतिक्रिया लेना चाहा तो उन्होंने कॉल रिसीव नहीं किया।  

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