दिल्ली हाई कोर्ट ने गुरुवार को मनी लॉन्ड्रिंग मामले में रहेजा डेवलपर्स लिमिटेड (RDL) के पूर्व डायरेक्टर नयन एन रहेजा की अग्रिम ज़मानत याचिका पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) की दलीलें सुनीं। ट्रायल कोर्ट ने 19 सितंबर को उनकी अग्रिम ज़मानत याचिका खारिज कर दी थी। जस्टिस अमित बंसल ने आरोपी के सीनियर वकील और ED के वकील की शुरुआती दलीलें सुनीं। मामले की सुनवाई के लिए 6 अक्टूबर की तारीख तय की गई है। ED की ओर से वकील रजत नायर पेश हुए और जवाब देने के लिए समय मांगा। उन्होंने कहा कि आवेदक जांच में सहयोग नहीं कर रहे हैं। दूसरी ओर, नयन एन. रहेजा की ओर से सीनियर वकील विकास पाहवा पेश हुए। सीनियर वकील ने बताया कि रहेजा एक जाने-माने बिल्डर हैं। उन्होंने लगभग 15 प्रोजेक्ट पूरे किए हैं। उन्होंने BPL कैटेगरी के लिए भी करीब 2000 फ्लैट बनाए हैं। आवेदक जांच में शामिल होने के लिए तैयार हैं। साकेत डिस्ट्रिक्ट कोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में नयन एन. रहेजा की अग्रिम ज़मानत याचिका खारिज कर दी थी। इससे पहले, उन्हें ज़बरदस्ती की कार्रवाई से सुरक्षा दी गई थी। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने घर खरीदारों को तय समय में फ़्लैट न सौंपने के मामले में केस दर्ज किया था। स्पेशल जज (PMLA) सचिन जैन ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में नयन एन रहेजा की अग्रिम ज़मानत अर्ज़ी खारिज कर दी। जज ने यह फ़ैसला उनके इस व्यवहार को देखते हुए लिया कि बुलाए जाने पर भी वे जांच अधिकारी के सामने पेश नहीं हुए।
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कोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ इसलिए कि आवेदक का नाम ECIR का हिस्सा बनी किसी FIR में नहीं है, या नाम होने पर भी चार्जशीट में नाम नहीं है, इसका मतलब यह नहीं है कि वह PMLA के तहत कार्यवाही से बरी हो गया है। ऐसा तब तक नहीं माना जा सकता जब तक कि वह अग्रिम ज़मानत के चरण में यह साबित न कर दे या कम से कम प्रथम दृष्टया यह न दिखाए कि उसने PMLA की धारा 3 के तहत अपराध से हुई कमाई (proceeds of crime) का किसी भी तरह से लेन-देन नहीं किया है। ट्रायल कोर्ट का मानना था कि PMLA की धारा 45(1)(ii) के तहत दी गई दोहरी शर्तें पूरी नहीं होती हैं और आवेदक यह दिखाने में असमर्थ रहा है कि यह मानने के लिए उचित आधार हैं कि वह मनी लॉन्ड्रिंग के अपराध का दोषी नहीं है। कोर्ट ने 19 सितंबर के आदेश में कहा, “इसके अलावा, बुलाए जाने पर जांच में पेश न होने और सहयोग न करने का उनका व्यवहार उन्हें अग्रिम ज़मानत की सुविधा का हकदार नहीं बनाता है। यह सुविधा आम तौर पर केवल असाधारण परिस्थितियों में ही दी जा सकती है, जब आरोपी यह दिखा सके कि उसे परेशान करने और अपमानित करने के इरादे से झूठा फंसाया गया है।” कोर्ट ने पाया कि आवेदक को सात बार समन भेजे गए, लेकिन वह गुरुग्राम ज़ोनल ऑफ़िस में केवल दो बार पेश हुआ और पांच बार किसी न किसी बहाने से व्यक्तिगत रूप से पेश होने और जांच में सहयोग करने में विफल रहा। ED के स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर (SPP) आनंद कीर्ति ने तर्क दिया कि भले ही आरोपी ने दिल्ली हाई कोर्ट के सामने स्पष्ट वचन दिया था – जिसे 30.07.2026 के आदेश में दर्ज किया गया था कि “याचिकाकर्ता का यह वचन रिकॉर्ड पर लिया जाता है कि याचिकाकर्ता प्रवर्तन निदेशालय के साथ पूरा सहयोग करेगा” – ED ने कई आधारों पर मामला दर्ज किया था। दिल्ली और गुरुग्राम में FIR दर्ज की गईं।
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यह तर्क दिया गया कि सभी FIR में यह आरोप लगाया गया था कि उनमें नामजद आरोपियों/संस्थाओं ने ‘रहेजा रेवांता’, ‘रहेजा शिलास’, ‘रहेजा ट्रिनिटी’, ‘रहेजा ओमा’, ‘रहेजा मॉल’, ‘रहेजा अरण्य’, ‘रहेजा अथर्व’ और ‘वेदांता’ जैसे प्रोजेक्ट्स के तहत ग्राहकों से रेजिडेंशियल फ्लैट और कमर्शियल स्पेस देने के नाम पर पैसे इकट्ठा किए थे; हालांकि, आरोप है कि इन प्रोजेक्ट्स को पूरा करने के लिए इकट्ठा किए गए फंड का इस्तेमाल करने के बजाय, कंपनी ने उस फंड का गलत इस्तेमाल किया और तैयार यूनिट्स की डिलीवरी नहीं की। आरोपियों के वकील ने तर्क दिया कि चूंकि आरोपियों के खिलाफ मुख्य अपराधों (प्रेडिकेट ऑफेंस) में चार्जशीट दाखिल नहीं की गई है, इसलिए PMLA की धारा 3 के तहत उनके खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का कोई अपराध नहीं बनता है।

