Pakistan UAE Loan: पाकिस्तान चुकाएगा 3.5 अरब डॉलर का कर्ज, सीनेटर मुशाहिद हुसैन ने यूएई को क्यों बताया ‘बेचारा’

Pakistan UAE Loan: पाकिस्तान चुकाएगा 3.5 अरब डॉलर का कर्ज, सीनेटर मुशाहिद हुसैन ने यूएई को क्यों बताया ‘बेचारा’

Financial Crisis: पाकिस्तान इस महीने के अंत तक संयुक्त अरब अमीरात (UAE) को 3.5 अरब डॉलर का कर्ज चुकाने की तैयारी कर रहा है। यह धनराशि साल 2019 में अबू धाबी विकास कोष के माध्यम से पाकिस्तान को दी गई थी, जिसका मुख्य उद्देश्य पाकिस्तान के गिरते भुगतान संतुलन को स्थिर करना था। पाकिस्तानी मीडिया के अनुसार इस कर्ज वापसी की प्रक्रिया के बीच पाकिस्तानी सीनेटर मुशाहिद हुसैन का एक बड़ा और विवादास्पद बयान सामने आया है। उन्होंने इस कर्ज अदायगी को ‘भाईचारे की मदद’ करार देते हुए संयुक्त अरब अमीरात को एक ‘फंसा हुआ और असहाय’ राष्ट्र बताया है। वर्तमान वैश्विक आर्थिक संकट के बीच एक देनदार देश के सीनेटर का यह बयान कूटनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है।

डोनाल्ड ट्रंप और मध्य पूर्व युद्ध का हवाला

मुशाहिद हुसैन ने एक साक्षात्कार में दावा किया कि संकट के इस दौर में संयुक्त अरब अमीरात का समर्थन करना पाकिस्तान की नैतिक जिम्मेदारी है। सीनेटर ने कहा कि यूएई को पैसों की सख्त जरूरत है क्योंकि उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से बड़े वित्तीय वादे किए हैं। हुसैन के अनुसार, 28 फरवरी को शुरू हुए मध्य पूर्व युद्ध के बाद से क्षेत्रीय अस्थिरता चरम पर है। उन्होंने दावा किया कि यूएई ने डोनाल्ड ट्रंप को 150 अरब डॉलर देने का वादा किया है, जिससे उनके विदेशी मुद्रा भंडार पर भारी दबाव आ गया है। इसके अलावा, यमन और सूडान के संघर्षों में उलझने के कारण भी यूएई की वित्तीय स्थिति लाचार हो गई है और ऐसे में पाकिस्तान बड़े भाई की भूमिका निभा रहा है।

यूएई के निर्माण में पाकिस्तान की भूमिका का दावा

पाकिस्तान और यूएई के ऐतिहासिक संबंधों का जिक्र करते हुए मुशाहिद हुसैन ने कहा कि पाकिस्तान ने यूएई के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने याद दिलाया कि शेख जायद बिन सुल्तान अल नाहयान (संयुक्त अरब अमीरात के संस्थापक) के समय से ही दोनों देशों के बीच मजबूत संबंध रहे हैं। हुसैन ने विशेष रूप से उल्लेख किया कि पाकिस्तानी सैन्य विशेषज्ञों ने संयुक्त अरब अमीरात के सशस्त्र बलों को प्रशिक्षण देने में अहम भूमिका अदा की है, इसलिए संकट के समय कर्ज चुकाना पाकिस्तान का फर्ज है।

भारत को लेकर यूएई को दी ‘सलाह’

आर्थिक और सैन्य मुद्दों के अलावा, सीनेटर हुसैन ने यूएई को भारत के साथ संबंधों को लेकर भी एक ‘भाईचारे वाली सलाह’ दे डाली। उन्होंने यूएई की डेमोग्राफी का हवाला देते हुए कहा कि वहां की कुल एक करोड़ की आबादी में से करीब 43 लाख लोग भारतीय मूल के हैं। हुसैन ने यूएई को सचेत करते हुए कहा कि भारत के साथ अत्यधिक मैत्रीपूर्ण संबंध कहीं उन्हें ‘अखंड भारत’ का हिस्सा न बना दें।

पाकिस्तान की अपनी अर्थव्यवस्था खस्ताहाल

एक तरफ पाकिस्तानी सीनेटर यूएई की मदद का दावा कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान की अपनी आर्थिक स्थिति बेहद नाजुक दौर से गुजर रही है। पाकिस्तान फिलहाल अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के एक कड़े प्रोग्राम का हिस्सा है। इस प्रोग्राम के तहत उसे चीन, सऊदी अरब और यूएई से लगभग 12.5 अरब डॉलर का बाहरी वित्तपोषण जुटाना अनिवार्य है। वर्तमान में पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक का कुल भंडार 16.3 अरब डॉलर है। 3.5 अरब डॉलर चुकाने के बाद इस भंडार में सीधे 18 प्रतिशत की बड़ी गिरावट आएगी। इससे पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा आवरण और अधिक कमजोर हो जाएगा। इसके अलावा, मध्य पूर्व में ईरान के साथ जारी युद्ध के कारण कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें पाकिस्तान जैसी संघर्षरत अर्थव्यवस्था के लिए नई मुसीबतें पैदा कर रही हैं। राष्ट्रीय गरिमा के नाम पर चुकाया जा रहा यह कर्ज पाकिस्तान की आम जनता पर महंगाई का नया बोझ डाल सकता है।

कर्ज चुकाना महज एक संप्रभु दायित्व

पाकिस्तानी सीनेटर मुशाहिद हुसैन के इस बयान पर कूटनीतिक जानकारों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि कर्ज चुकाना एक संप्रभु दायित्व है, इसे ‘एहसान’ या ‘बड़े भाई की मदद’ के रूप में पेश करना यूएई जैसे मजबूत आर्थिक साझेदार को नाराज कर सकता है। विशेषकर भारतीय प्रवासियों पर की गई टिप्पणी को कूटनीतिक रूप से अपरिपक्व माना जा रहा है। इस बयान के बाद अब यह देखना अहम होगा कि संयुक्त अरब अमीरात का विदेश मंत्रालय इस पर क्या आधिकारिक प्रतिक्रिया देता है। इसके अलावा, पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि 18 प्रतिशत विदेशी मुद्रा भंडार घटने के बाद वह आईएमएफ की शर्तों और अपने आयात खर्चों को कैसे प्रबंधित करेगा।

इसका सीधा असर पाकिस्तान और अन्य विकासशील देशों पर पड़ रहा

इस पूरी घटना का एक महत्वपूर्ण पहलू मध्य पूर्व युद्ध का आर्थिक प्रभाव है। जिस तरह से क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ रही है, उससे न केवल युद्धरत देश बल्कि खाड़ी के संपन्न देश भी अपने वित्तीय संसाधनों को लेकर सतर्क हो गए हैं। इसका सीधा असर पाकिस्तान और अन्य विकासशील देशों पर पड़ रहा है, जिन्हें अब पहले की तरह आसानी से बेलआउट पैकेज या कर्ज में छूट नहीं मिल पा रही है।

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