पद्मश्री से सम्मानित प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक, शिक्षाविद् और पूर्व कुलपति डॉ. गोपालजी त्रिवेदी का मंगलवार सुबह निधन हो गया। उन्होंने पटना के मेदांता अस्पताल में सुबह करीब 5:30 बजे अंतिम सांस ली। उनके पुत्र डॉ. रमन त्रिवेदी ने बताया कि रविवार को सांस संबंधी परेशानी होने के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इलाज के बाद उनका निधन हो गया। गायघाट प्रखंड स्थित मतलुपुर गांव निवासी डॉ. त्रिवेदी कृषि क्षेत्र में अपने नवाचारों और किसानों की आय बढ़ाने वाले मॉडल के लिए देशभर में जाने जाते थे। विज्ञान और इंजीनियरिंग श्रेणी में उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री सम्मान मिला था। किसानों को पुराने बागों के संरक्षण का रास्ता दिखाया डॉ. गोपालजी त्रिवेदी ने विशेष रूप से मुजफ्फरपुर की पहचान मानी जाने वाली लीची के पुराने बागों को बचाने और उत्पादन बढ़ाने के लिए ‘पुनर्जीवन कैनोपी मैनेजमेंट’ तकनीक विकसित की थी। वर्ष 2003 में शुरू की गई इस तकनीक के तहत 40-50 साल पुराने और अनुत्पादक लीची पेड़ों की वैज्ञानिक तरीके से कटाई-छंटाई कर उन्हें फिर से फलदार बनाया जाता था। पेड़ों की ऊंचाई कम कर नई शाखाओं के विकास को बढ़ावा दिया जाता था, जिससे पुराने बागों को हटाए बिना ही नए पेड़ों जैसी उपज मिलने लगी। प्रारंभिक प्रयोग में ही उनके बाग के 10 पेड़ों से सवा क्विंटल तक अतिरिक्त उत्पादन हुआ था। मुजफ्फरपुर में करीब 12 हजार हेक्टेयर में लीची की खेती होती है। ऐसे में उनकी तकनीक ने हजारों किसानों को पुराने बागों के संरक्षण और बेहतर उत्पादन का रास्ता दिखाया। डॉ. त्रिवेदी ने जलजमाव वाले क्षेत्रों में खेती को नई दिशा देने का भी काम किया। उन्होंने मखाना, सिंघाड़ा और मत्स्य आधारित समेकित खेती को बढ़ावा देकर परती और जलजमाव वाली जमीन को उपयोगी बनाया। उनके प्रयास से 22 किसानों ने 86 एकड़ भूमि को मत्स्य आधारित खेती मॉडल में विकसित किया। इस मॉडल में मछली पालन, पौधारोपण और अन्य फसलों की खेती एक साथ की जाती थी। इसे ‘बाबा परियोजना’ यानी बिहार एक्वाकल्चर बेस्ड एग्रीकल्चर परियोजना के नाम से पहचान मिली। इससे भूजल स्तर में सुधार के साथ रोजगार के नए अवसर भी पैदा हुए। तकनीकी आधारित खेती पर फोकस राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा (पूर्व में राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय) के पूर्व कुलपति भी रहे। कृषि विस्तार, तकनीकी आधारित खेती, किसानों की आय दोगुनी करने और सतत कृषि मॉडल पर उनका कार्य बेहद प्रभावशाली माना जाता है। सेवानिवृत्ति के बाद भी वे गांव में रहकर खुद खेती करते थे और किसानों के लिए मॉडल फार्मिंग का उदाहरण पेश करते रहे। डॉ. गोपालजी त्रिवेदी का जीवन संघर्ष और उपलब्धियों से भरा रहा। पूसा हाई स्कूल से मैट्रिक और एलएस कॉलेज से इंटरमीडिएट की पढ़ाई करने के बाद उन्होंने गणित विषय से बीएससी ऑनर्स में नामांकन लिया था, लेकिन पिता के असामयिक निधन के बाद उन्हें पढ़ाई छोड़कर खेती की जिम्मेदारी संभालनी पड़ी। बाद में कृषि शिक्षा की ओर बढ़ते हुए उन्होंने स्नातक, स्नातकोत्तर और पीएचडी की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद ढोली कॉलेज में प्रोफेसर और संयुक्त निदेशक बने तथा 1988 से 1991 तक कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर रहे। लीची उत्पादक संघ के गठन अहम भूमिका देश में कृषि विज्ञान केंद्रों की स्थापना में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। अपने गांव में 85 एकड़ भूमि पर उन्होंने बिहार का पहला जलीय कृषि आधारित समेकित कृषि मॉडल विकसित किया, जिसे कृषि क्षेत्र में एक अनूठा प्रयोग माना जाता है। लीची उत्पादक संघ के गठन में भी उनकी अहम भूमिका रही। डॉ. गोपालजी त्रिवेदी के निधन से कृषि जगत, शिक्षा क्षेत्र और किसान समुदाय में शोक की लहर है। बिहार ने एक ऐसे कृषि वैज्ञानिक को खो दिया, जिन्होंने अपने ज्ञान और प्रयोगों से खेती को नई दिशा देने का काम किया। पद्मश्री से सम्मानित प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक, शिक्षाविद् और पूर्व कुलपति डॉ. गोपालजी त्रिवेदी का मंगलवार सुबह निधन हो गया। उन्होंने पटना के मेदांता अस्पताल में सुबह करीब 5:30 बजे अंतिम सांस ली। उनके पुत्र डॉ. रमन त्रिवेदी ने बताया कि रविवार को सांस संबंधी परेशानी होने के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इलाज के बाद उनका निधन हो गया। गायघाट प्रखंड स्थित मतलुपुर गांव निवासी डॉ. त्रिवेदी कृषि क्षेत्र में अपने नवाचारों और किसानों की आय बढ़ाने वाले मॉडल के लिए देशभर में जाने जाते थे। विज्ञान और इंजीनियरिंग श्रेणी में उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री सम्मान मिला था। किसानों को पुराने बागों के संरक्षण का रास्ता दिखाया डॉ. गोपालजी त्रिवेदी ने विशेष रूप से मुजफ्फरपुर की पहचान मानी जाने वाली लीची के पुराने बागों को बचाने और उत्पादन बढ़ाने के लिए ‘पुनर्जीवन कैनोपी मैनेजमेंट’ तकनीक विकसित की थी। वर्ष 2003 में शुरू की गई इस तकनीक के तहत 40-50 साल पुराने और अनुत्पादक लीची पेड़ों की वैज्ञानिक तरीके से कटाई-छंटाई कर उन्हें फिर से फलदार बनाया जाता था। पेड़ों की ऊंचाई कम कर नई शाखाओं के विकास को बढ़ावा दिया जाता था, जिससे पुराने बागों को हटाए बिना ही नए पेड़ों जैसी उपज मिलने लगी। प्रारंभिक प्रयोग में ही उनके बाग के 10 पेड़ों से सवा क्विंटल तक अतिरिक्त उत्पादन हुआ था। मुजफ्फरपुर में करीब 12 हजार हेक्टेयर में लीची की खेती होती है। ऐसे में उनकी तकनीक ने हजारों किसानों को पुराने बागों के संरक्षण और बेहतर उत्पादन का रास्ता दिखाया। डॉ. त्रिवेदी ने जलजमाव वाले क्षेत्रों में खेती को नई दिशा देने का भी काम किया। उन्होंने मखाना, सिंघाड़ा और मत्स्य आधारित समेकित खेती को बढ़ावा देकर परती और जलजमाव वाली जमीन को उपयोगी बनाया। उनके प्रयास से 22 किसानों ने 86 एकड़ भूमि को मत्स्य आधारित खेती मॉडल में विकसित किया। इस मॉडल में मछली पालन, पौधारोपण और अन्य फसलों की खेती एक साथ की जाती थी। इसे ‘बाबा परियोजना’ यानी बिहार एक्वाकल्चर बेस्ड एग्रीकल्चर परियोजना के नाम से पहचान मिली। इससे भूजल स्तर में सुधार के साथ रोजगार के नए अवसर भी पैदा हुए। तकनीकी आधारित खेती पर फोकस राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा (पूर्व में राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय) के पूर्व कुलपति भी रहे। कृषि विस्तार, तकनीकी आधारित खेती, किसानों की आय दोगुनी करने और सतत कृषि मॉडल पर उनका कार्य बेहद प्रभावशाली माना जाता है। सेवानिवृत्ति के बाद भी वे गांव में रहकर खुद खेती करते थे और किसानों के लिए मॉडल फार्मिंग का उदाहरण पेश करते रहे। डॉ. गोपालजी त्रिवेदी का जीवन संघर्ष और उपलब्धियों से भरा रहा। पूसा हाई स्कूल से मैट्रिक और एलएस कॉलेज से इंटरमीडिएट की पढ़ाई करने के बाद उन्होंने गणित विषय से बीएससी ऑनर्स में नामांकन लिया था, लेकिन पिता के असामयिक निधन के बाद उन्हें पढ़ाई छोड़कर खेती की जिम्मेदारी संभालनी पड़ी। बाद में कृषि शिक्षा की ओर बढ़ते हुए उन्होंने स्नातक, स्नातकोत्तर और पीएचडी की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद ढोली कॉलेज में प्रोफेसर और संयुक्त निदेशक बने तथा 1988 से 1991 तक कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर रहे। लीची उत्पादक संघ के गठन अहम भूमिका देश में कृषि विज्ञान केंद्रों की स्थापना में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। अपने गांव में 85 एकड़ भूमि पर उन्होंने बिहार का पहला जलीय कृषि आधारित समेकित कृषि मॉडल विकसित किया, जिसे कृषि क्षेत्र में एक अनूठा प्रयोग माना जाता है। लीची उत्पादक संघ के गठन में भी उनकी अहम भूमिका रही। डॉ. गोपालजी त्रिवेदी के निधन से कृषि जगत, शिक्षा क्षेत्र और किसान समुदाय में शोक की लहर है। बिहार ने एक ऐसे कृषि वैज्ञानिक को खो दिया, जिन्होंने अपने ज्ञान और प्रयोगों से खेती को नई दिशा देने का काम किया।


