भारत की प्राकृतिक गैस की जरूरतें लगातार बढ़ रही हैं और इसका असर विदेशों से होने वाले प्राकृतिक गैस (एलएनजी) के आयात पर भी दिखाई दे रहा है। सितंबर 2026 में भारत को गैस की आपूर्ति करने वाले देशों की सूची में बदलाव देखने को मिला। पिछले कुछ महीनों से सबसे बड़े सप्लायर रहे अमेरिका की स्थिति नीचे आ गई, जबकि ओमान और नाइजीरिया भारत के प्रमुख सप्लायर बनकर उभरे। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और होर्मुज स्ट्रेटसे आपूर्ति में आई बाधाओं के बीच भारत दूसरे देशों से गैस खरीदने पर जोर दे रहा है।
मौजूद जानकारी के अनुसार, सितंबर में भारत ने कुल 2.24 मिलियन टन एलएनजी का आयात किया, जो अगस्त के मुकाबले 12.7% कम है। हालांकि, पिछले साल सितंबर की तुलना में आयात 7% अधिक रहा। अगस्त में अमेरिका भारत का सबसे बड़ा सप्लायर था, लेकिन सितंबर में ओमान पहले, नाइजीरिया दूसरे और अमेरिका तीसरे स्थान पर रहा।
बता दें कि भारत अपनी प्राकृतिक गैस की कुल जरूरत का लगभग आधा हिस्सा आयात से पूरा करता है। इसमें से करीब 60% गैस होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते आती है। यह समुद्री रास्ता कतर और संयुक्त अरब अमीरात जैसे प्रमुख गैस निर्यातक देशों के लिए काफी अहम है। इसके उलट, ओमान से आने वाली गैस की आपूर्ति इस रास्ते पर निर्भर नहीं करती। इसी वजह से संकट के दौरान ओमान भारत के लिए एक महत्वपूर्ण विकल्प बनकर सामने आया है।
गौरतलब है कि मई से सितंबर 2026 के बीच भारत का एलएनजी आयात पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 17.8% बढ़कर 11.87 मिलियन टन हो गया। इस दौरान अमेरिका 3.41 मिलियन टन के साथ सबसे बड़ा सप्लायर रहा। यह कुल आयात का 28.7% था और पिछले साल की तुलना में अमेरिका से खरीद लगभग 175% बढ़ी। ओमान से 2.33 मिलियन टन और नाइजीरिया से 2.20 मिलियन टन गैस आई। वहीं, कतर से आयात घटकर 0.41 मिलियन टन रह गया।
अमेरिका से आने वाली गैस में हालिया कमी की एक बड़ी वजह यूरोप में सर्दियों से पहले बढ़ी खरीद भी है। यूरोपीय खरीदार अमेरिकी गैस के लिए ज्यादा प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में आपूर्ति का रुख बदल रहा है।
केप्लर की गैस विश्लेषक सोनल रंजन के मुताबिक, 2026 के अंत तक भारत में एलएनजी की मांग मजबूत बनी रह सकती है। शहरों में पाइप से मिलने वाली गैस का बढ़ता इस्तेमाल, रसोई गैस से पाइप वाली गैस की ओर बदलाव और घरेलू उत्पादन में कमी आयात की जरूरत बढ़ा रहे हैं। खाद और शहरों में गैस वितरण जैसे क्षेत्रों की मांग भी महत्वपूर्ण है। बिजली उत्पादन में जलविद्युत की उपलब्धता कम रहने और कोयले से बिजली बनाने पर दबाव बढ़ने के कारण गैस की जरूरत बढ़ी है।
हालांकि, अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊंची कीमतें उद्योगों और बिजली क्षेत्र के लिए मुश्किल पैदा कर सकती हैं। ऐसे में कुछ क्षेत्र दूसरे ईंधनों की ओर रुख कर सकते हैं। भारत के सामने चुनौती यह है कि जरूरी क्षेत्रों के लिए गैस की आपूर्ति बनाए रखी जाए और बदलते वैश्विक बाजार में कीमतों तथा उपलब्धता के बीच संतुलन कायम रखा जाए, ताकि ऊर्जा की जरूरतें पूरी होती रहें हैं।

