सरकारी सेवाओं में पारदर्शिता, जवाबदेही और निष्पक्षता सुनिश्चित करने को लेकर तिरहुत प्रमंडल स्तर पर एमआईटी सभागार में विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में प्रमंडल के छह जिलों के अधिकारियों और कर्मियों को अनुशासनिक कार्रवाई से जुड़े नियमों, प्रक्रियाओं और कानूनी प्रावधानों की विस्तृत जानकारी दी गई। प्रशिक्षण कार्यक्रम की अध्यक्षता बिहार सरकार के महानिदेशक-सह-मुख्य जांच आयुक्त दीपक कुमार सिंह ने की। कार्यक्रम में मुख्य जांच आयुक्त निदेशालय, बिहार पटना से आए विशेषज्ञ अधिकारियों ने “नेचुरल जस्टिस” यानी प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत और सीसीए रूल (Classification, Control and Appeal Rules) को अनुशासनिक कार्रवाई का आधारस्तंभ बताया। उन्होंने कहा कि किसी भी सरकारी कर्मी के खिलाफ कार्रवाई करते समय नियमों और प्रक्रियाओं का अक्षरशः पालन अनिवार्य है। बिना सुनवाई किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता प्रशिक्षण के दौरान विशेषज्ञों ने कहा कि प्राकृतिक न्याय का मूल सिद्धांत है कि किसी भी व्यक्ति को बिना पक्ष सुने दोषी नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने “दूसरे पक्ष को भी सुनो” के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी भी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई से पहले उसे अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। विशेषज्ञों ने कहा कि जांच प्रक्रिया निष्पक्ष और पूर्वाग्रह रहित होनी चाहिए। यदि जांच अधिकारी निष्पक्षता के सिद्धांत का पालन नहीं करेगा तो पूरी कार्रवाई न्यायिक समीक्षा में कमजोर पड़ सकती है। सीसीए रूल की प्रक्रिया की दी गई जानकारी प्रशिक्षण में अधिकारियों को सीसीए रूल के विभिन्न प्रावधानों की जानकारी दी गई। इसमें आरोप पत्र गठन, लिखित जवाब प्राप्त करना, जांच अधिकारी की नियुक्ति, साक्ष्य संकलन, गवाहों की सुनवाई और अंतिम निर्णय तक की प्रक्रिया को विस्तार से समझाया गया। विशेषज्ञों ने कहा कि कई बार प्रक्रियात्मक गलतियों के कारण विभागीय कार्रवाई कोर्ट में टिक नहीं पाती। इसलिए अधिकारियों और कर्मियों को नियमों की सही जानकारी होना बेहद जरूरी है। अनुशासनिक कार्रवाई दंड नहीं, प्रशासनिक सुधार का माध्यम मुख्य जांच आयुक्त दीपक कुमार सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि अनुशासनिक कार्रवाई केवल दंड देने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था को प्रभावी और जवाबदेह बनाए रखने का महत्वपूर्ण माध्यम है। उन्होंने कहा कि सरकारी सेवक जनता के प्रति उत्तरदायी होते हैं और उनसे नियमों और नैतिक मूल्यों के अनुरूप काम करने की अपेक्षा की जाती है। उन्होंने अधिकारियों को अनुशासनिक मामलों में जल्दबाजी और व्यक्तिगत पूर्वाग्रह से बचने की सलाह देते हुए कहा कि सभी निर्णय तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर होने चाहिए। साथ ही जांच प्रक्रिया समयबद्ध तरीके से पूरी करने पर भी जोर दिया गया। पारदर्शिता और जवाबदेही पर बल प्रमंडलीय आयुक्त गिरिवर दयाल सिंह ने कहा कि वर्तमान समय में प्रशासनिक कार्यों में पारदर्शिता और जवाबदेही की अपेक्षा पहले से अधिक बढ़ गई है। ऐसे में अधिकारियों और कर्मियों को नियमों की अद्यतन जानकारी होना जरूरी है। उन्होंने कहा कि इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्देश्य सिर्फ नियमों की जानकारी देना नहीं, बल्कि अधिकारियों में विधिक समझ और प्रशासनिक संवेदनशीलता विकसित करना भी है। इससे सरकारी कार्यों के निष्पादन में निष्पक्षता और गुणवत्ता सुनिश्चित होगी। अधिकारियों ने पूछे व्यावहारिक सवाल कार्यक्रम के दौरान अधिकारियों और कर्मियों ने विभागीय जांच से जुड़े जटिल मामलों पर विशेषज्ञों से सवाल भी पूछे। विशेषज्ञों ने आरोप पत्र की भाषा, दस्तावेजी साक्ष्य, गवाहों की भूमिका और अपील प्रक्रिया जैसे व्यावहारिक पहलुओं पर विस्तार से जानकारी दी। कार्यक्रम में प्रमंडलीय आयुक्त गिरिवर दयाल सिंह, जिलाधिकारी सुब्रत कुमार सेन, नगर आयुक्त ऋतुराज प्रताप सिंह, आयुक्त सचिव संदीप शेखर प्रियदर्शी समेत तिरहुत प्रमंडल के सभी छह जिलों के वरीय अधिकारी और विभिन्न विभागों के कर्मी मौजूद रहे। सरकारी सेवाओं में पारदर्शिता, जवाबदेही और निष्पक्षता सुनिश्चित करने को लेकर तिरहुत प्रमंडल स्तर पर एमआईटी सभागार में विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में प्रमंडल के छह जिलों के अधिकारियों और कर्मियों को अनुशासनिक कार्रवाई से जुड़े नियमों, प्रक्रियाओं और कानूनी प्रावधानों की विस्तृत जानकारी दी गई। प्रशिक्षण कार्यक्रम की अध्यक्षता बिहार सरकार के महानिदेशक-सह-मुख्य जांच आयुक्त दीपक कुमार सिंह ने की। कार्यक्रम में मुख्य जांच आयुक्त निदेशालय, बिहार पटना से आए विशेषज्ञ अधिकारियों ने “नेचुरल जस्टिस” यानी प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत और सीसीए रूल (Classification, Control and Appeal Rules) को अनुशासनिक कार्रवाई का आधारस्तंभ बताया। उन्होंने कहा कि किसी भी सरकारी कर्मी के खिलाफ कार्रवाई करते समय नियमों और प्रक्रियाओं का अक्षरशः पालन अनिवार्य है। बिना सुनवाई किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता प्रशिक्षण के दौरान विशेषज्ञों ने कहा कि प्राकृतिक न्याय का मूल सिद्धांत है कि किसी भी व्यक्ति को बिना पक्ष सुने दोषी नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने “दूसरे पक्ष को भी सुनो” के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी भी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई से पहले उसे अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। विशेषज्ञों ने कहा कि जांच प्रक्रिया निष्पक्ष और पूर्वाग्रह रहित होनी चाहिए। यदि जांच अधिकारी निष्पक्षता के सिद्धांत का पालन नहीं करेगा तो पूरी कार्रवाई न्यायिक समीक्षा में कमजोर पड़ सकती है। सीसीए रूल की प्रक्रिया की दी गई जानकारी प्रशिक्षण में अधिकारियों को सीसीए रूल के विभिन्न प्रावधानों की जानकारी दी गई। इसमें आरोप पत्र गठन, लिखित जवाब प्राप्त करना, जांच अधिकारी की नियुक्ति, साक्ष्य संकलन, गवाहों की सुनवाई और अंतिम निर्णय तक की प्रक्रिया को विस्तार से समझाया गया। विशेषज्ञों ने कहा कि कई बार प्रक्रियात्मक गलतियों के कारण विभागीय कार्रवाई कोर्ट में टिक नहीं पाती। इसलिए अधिकारियों और कर्मियों को नियमों की सही जानकारी होना बेहद जरूरी है। अनुशासनिक कार्रवाई दंड नहीं, प्रशासनिक सुधार का माध्यम मुख्य जांच आयुक्त दीपक कुमार सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि अनुशासनिक कार्रवाई केवल दंड देने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था को प्रभावी और जवाबदेह बनाए रखने का महत्वपूर्ण माध्यम है। उन्होंने कहा कि सरकारी सेवक जनता के प्रति उत्तरदायी होते हैं और उनसे नियमों और नैतिक मूल्यों के अनुरूप काम करने की अपेक्षा की जाती है। उन्होंने अधिकारियों को अनुशासनिक मामलों में जल्दबाजी और व्यक्तिगत पूर्वाग्रह से बचने की सलाह देते हुए कहा कि सभी निर्णय तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर होने चाहिए। साथ ही जांच प्रक्रिया समयबद्ध तरीके से पूरी करने पर भी जोर दिया गया। पारदर्शिता और जवाबदेही पर बल प्रमंडलीय आयुक्त गिरिवर दयाल सिंह ने कहा कि वर्तमान समय में प्रशासनिक कार्यों में पारदर्शिता और जवाबदेही की अपेक्षा पहले से अधिक बढ़ गई है। ऐसे में अधिकारियों और कर्मियों को नियमों की अद्यतन जानकारी होना जरूरी है। उन्होंने कहा कि इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्देश्य सिर्फ नियमों की जानकारी देना नहीं, बल्कि अधिकारियों में विधिक समझ और प्रशासनिक संवेदनशीलता विकसित करना भी है। इससे सरकारी कार्यों के निष्पादन में निष्पक्षता और गुणवत्ता सुनिश्चित होगी। अधिकारियों ने पूछे व्यावहारिक सवाल कार्यक्रम के दौरान अधिकारियों और कर्मियों ने विभागीय जांच से जुड़े जटिल मामलों पर विशेषज्ञों से सवाल भी पूछे। विशेषज्ञों ने आरोप पत्र की भाषा, दस्तावेजी साक्ष्य, गवाहों की भूमिका और अपील प्रक्रिया जैसे व्यावहारिक पहलुओं पर विस्तार से जानकारी दी। कार्यक्रम में प्रमंडलीय आयुक्त गिरिवर दयाल सिंह, जिलाधिकारी सुब्रत कुमार सेन, नगर आयुक्त ऋतुराज प्रताप सिंह, आयुक्त सचिव संदीप शेखर प्रियदर्शी समेत तिरहुत प्रमंडल के सभी छह जिलों के वरीय अधिकारी और विभिन्न विभागों के कर्मी मौजूद रहे।


