पैक्स सोसायटियों में अब नहीं चलेगी मनमानी:हर 10 में से 7 समिति डिफॉल्टर, इसके बावजूद किसानों की मदद में पीछे नहीं, बांटा 21 हजार करोड़ रु. का कर्ज

पैक्स सोसायटियों में अब नहीं चलेगी मनमानी:हर 10 में से 7 समिति डिफॉल्टर, इसके बावजूद किसानों की मदद में पीछे नहीं, बांटा 21 हजार करोड़ रु. का कर्ज

मप्र के ग्रामीण अंचल में खेती-किसानी की रीढ़ मानी जाने वाली सहकारी सोसायटियों की सेहत को लेकर एक चौंकाने वाला सच सामने आया है। गांवों में खाद, बीज और नगद कर्ज पहुंचाने वाली हर 10 में से 7 समितियां खुद कर्ज के दलदल में फंसी हैं और सरकारी रिकॉर्ड में डिफॉल्टर घोषित हो चुकी हैं। हालात ये हैं कि राज्य की 5,207 पैक्स सोसायटियों में से महज 1,341 समितियां ही नियम-कायदों पर खरी उतर रही हैं, जबकि बाकी 3,247 सोसायटियां ब्लेक लिस्टेड हो चुकी हैं। इस भारी आर्थिक संकट और अपनी खराब माली हालत के बावजूद इन सोसायटियों ने किसानों का साथ नहीं छोड़ा और 57 लाख से अधिक किसानों को 21,495 करोड़ रुपये का रिकॉर्ड तोड़ कर्ज (वर्ष 2024-25) बांटकर खेती के पहिये को थामे रखा। अब इन केंद्रों में होने वाली किसी भी तरह की गड़बड़ी और मनमानी को जड़ से खत्म करने के लिए सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। पारदर्शिता लाने के लिए अब इन सभी 5207 केंद्रों के खातों को सीधे नाबार्ड के डिजिटल सॉफ्टवेयर से जोड़ा जा रहा है, ताकि एक-एक पैसे का हिसाब सीधे दिल्ली की निगरानी में रहे। डिजिटल हुई सोसायटियां: अब दिल्ली तक रहेगा हिसाब किताब: प्रदेश की सहकारी समितियों में अब पुराने बही-खातों का दौर खत्म हो रहा है और पारदर्शिता लाने के लिए इन्हें सीधे दिल्ली के डिजिटल सिस्टम से जोड़ दिया गया है। राज्य की कुल 5,455 सोसायटियों को कंप्यूटर से जोड़ने की मंजूरी मिली थी, जिनमें से 4,532 सोसायटियों का पूरा काम अब नए नेशनल सॉफ्टवेयर पर शुरू हो चुका है। वर्तमान में 4,524 सोसायटियां ‘गो-लाइव’ मोड पर हैं, यानी यहां होने वाले हर लेन-देन की जानकारी रीयल-टाइम में नाबार्ड तक पहुंच रही है। अब सिर्फ 923 सोसायटियां ही इस डिजिटल नेटवर्क से जुड़ना शेष हैं। इस आधुनिक तकनीक से ऋण वितरण में तेजी आएगी और लेनदेन की लागत में कमी आने की संभावना है। सिस्टम पर इसलिए जरूरी हो गया था डिजिटल पहरा सहकारी ढांचे की वित्तीय सेहत पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बिगड़ी है, जिसने इस नए डिजिटल सिस्टम की जरूरत को अनिवार्य बना दिया। जिला सहकारी बैंकों का जो बकाया कर्ज साल 2021 में 4125 करोड़ रुपये था, वह महज चार साल में बढ़कर 6890 करोड़ रुपये तक जा पहुंचा है। कर्ज में हुई यह 2765 करोड़ रुपये की भारी बढ़ोतरी चिंताजनक है क्योंकि इसके मुकाबले वसूली की रफ्तार बेहद सुस्त रही है। आलम यह है कि जून 2025 तक सोसायटियों पर बैंकों का 21 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा बकाया खड़ा हो गया, जबकि किसानों से वसूली का आंकड़ा 17 हजार करोड़ पर ही अटका है। रुपयों के इस बड़े अंतर और डूबते कर्ज (एनपीए) के खतरे को देखते हुए ही अब नाबार्ड के सॉफ्टवेयर से सीधी निगरानी शुरू की जा रही है, ताकि पाई-पाई का हिसाब रखा जा सके और सहकारी बैंकिंग सिस्टम धराशायी होने से बचाया जा सके।

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