अब बिना पहुंचे पहाड़ियों तक पौधे लगाएगा वन विभाग:बस्सी सेंचुरी में पहली बार ड्रोन से होगा बीजारोपण, 20 हेक्टेयर पहाड़ी क्षेत्र का किया चयन

अब बिना पहुंचे पहाड़ियों तक पौधे लगाएगा वन विभाग:बस्सी सेंचुरी में पहली बार ड्रोन से होगा बीजारोपण, 20 हेक्टेयर पहाड़ी क्षेत्र का किया चयन

चित्तौड़गढ़ की बस्सी वाइल्ड लाइफ सेंचुरी में जंगलों को फिर से हरा-भरा बनाने के लिए वन विभाग इस बार एक नई पहल करने जा रहा है। कई बार आग लगने या दूसरे कारणों से जंगल का कुछ हिस्सा पूरी तरह बंजर हो जाता है। ऐसे इलाकों में दोबारा पौधे लगाना आसान नहीं होता, क्योंकि वहां तक पहुंचना भी मुश्किल रहता है। खासकर पहाड़ी और दुर्गम इलाकों में वन विभाग का स्टाफ और मजदूर आसानी से नहीं पहुंच पाते। इसी परेशानी को देखते हुए अब वन विभाग ड्रोन तकनीक का इस्तेमाल करने जा रहा है। विभाग ने तय किया है कि मानसून की पहली बारिश में ड्रोन की मदद से सीड्स बॉल यानी बीज वाली मिट्टी के गोले जंगल में गिराए जाएंगे ताकि बारिश के साथ वहां नए पौधे उग सकें। इस साल बस्सी सेंचुरी के करीब 20 हेक्टेयर इलाके में यह काम किया जाएगा। इसके लिए अभी से सीड्स बॉल तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की जा रही है। वन विभाग का मानना है कि अगर यह एक्सपेरिमेंट सफल रहा तो आने वाले समय में सीतामाता सेंचुरी में काम किया जाएगा। दुर्गम पहाड़ियों तक पहुंचना मुश्किल, इसलिए लिया ड्रोन तकनीक का सहारा चित्तौड़गढ़ वाइल्ड लाइफ डिवीजन की डीएफओ मृदुला सिंह ने बताया कि विभाग पहली बार इस तरह का नवाचार कर रहा है। उन्होंने कहा कि बस्सी सेंचुरी में कई ऐसे इलाके हैं जहां जंगल तो मौजूद है, लेकिन वह अच्छी स्थिति में नहीं है। कुछ हिस्सों में आगजनी और प्राकृतिक कारणों से हरियाली कम हो गई है। कई जगह जमीन पथरीली और पहाड़ी है, जहां तक पहुंचना काफी कठिन होता है। ऐसे इलाकों में प्लांटेशन करना बहुत चुनौती भरा काम बन जाता है। कई बार मजदूर और वनकर्मी वहां तक नहीं पहुंच पाते, जिसके कारण उन हिस्सों को दोबारा विकसित नहीं किया जा सकता। इसी कारण से विभाग ने इस बार नई तकनीक अपनाने का फैसला किया है। ड्रोन की मदद से बीजों को सीधे उन इलाकों में गिराया जाएगा जहां इंसानों का पहुंचना मुश्किल है। इससे समय भी बचेगा और कम मेहनत में ज्यादा इलाके में काम किया जा सकेगा। वन विभाग को उम्मीद है कि बारिश के बाद इन बीजों से नए पौधे निकलेंगे और धीरे-धीरे जंगल फिर से घना होने लगेगा। गांव के लोगों की मदद से तैयार किए जाएंगे सीड्स बॉल वन विभाग इस काम में स्थानीय लोगों की भी मदद ले रहा है। डीएफओ मृदुला सिंह ने बताया कि गांवों में बनी वीएफएमसी यानी विलेज फॉरेस्ट मैनेजमेंट कमेटियों के सदस्य सीड्स बॉल तैयार करेंगे। इन कमेटियों में शामिल ग्रामीण जंगल संरक्षण के काम से जुड़े रहते हैं। सीड्स बॉल बनाने के लिए मिट्टी, खाद और रेत को एक खास अनुपात में मिलाया जाता है। इसके बाद उसमें अलग-अलग पेड़ों के बीज डाले जाते हैं। हर बॉल में दो बीज रखे जाएंगे ताकि पौधे उगने की संभावना ज्यादा रहे। इन गोलियों को हाथ से गोल आकार दिया जाता है और फिर धूप में सुखाया जाता है। जब ये अच्छे से सूखकर थोड़ी मजबूत हो जाती हैं, तब इन्हें सुरक्षित रख लिया जाता है। वन विभाग का कहना है कि अगर सीड्स बॉल मजबूत नहीं होंगी तो ड्रोन से गिराने पर टूट सकती हैं। इसलिए इन्हें खास तरीके से तैयार किया जाएगा। मानसून की पहली या दूसरी अच्छी बारिश के बाद इन सीड्स बॉल को ड्रोन के जरिए जंगल में गिराया जाएगा ताकि मिट्टी में नमी मिलने पर बीज अंकुरित हो सकें। 20 हेक्टेयर इलाके में होगा प्रयोग, 12 हजार सीड्स बॉल गिराए जाएंगे वन विभाग ने इस एक्सपेरिमेंट के लिए बस्सी सेंचुरी के एक खास पहाड़ी इलाके का चयन किया है। विभाग ने पहले उस क्षेत्र का सर्वे कराया और यह देखा कि वहां पौधे उगने की संभावना कितनी है। जांच में सामने आया कि अगर वहां बीजारोपण किया जाए तो अच्छे रिजल्ट मिल सकते हैं। लेकिन वहां तक पहुंचना काफी मुश्किल है। इसी कारण विभाग ने ड्रोन तकनीक का इस्तेमाल करने का फैसला किया। इस साल करीब 20 हेक्टेयर जमीन पर सीड्स बॉल गिराए जाएंगे। विभाग के अनुसार प्रति हेक्टेयर करीब 600 सीड्स बॉल डाले जाएंगे। इस हिसाब से पूरे इलाके में लगभग 12 हजार सीड्स बॉल गिराने की तैयारी है। मृदुला सिंह ने बताया कि ड्रोन अलग-अलग क्षमता के होते हैं, लेकिन सामान्य रूप से इस्तेमाल होने वाला ड्रोन एक बार में करीब 10 किलो वजन उठा सकता है। उसी हिसाब से सीड्स बॉल की संख्या और वजन तय किया जाएगा ताकि काम आसानी से हो सके। कम समय में ज्यादा काम, जंगल बढ़ाने में मिल सकती है बड़ी मदद DFO सिंह के अनुसार ड्रोन तकनीक से काम करने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि कम समय में बड़े इलाके में प्लांटेशन किया जा सकता है। विभाग का अनुमान है कि एक हेक्टेयर इलाके में सीड्स बॉल गिराने में करीब 30 मिनट का समय लगेगा। यानी पारंपरिक तरीके की तुलना में यह तरीका काफी तेज और आसान साबित हो सकता है। इसके अलावा जिन पहाड़ियों और जंगलों तक इंसान आसानी से नहीं पहुंच सकते, वहां भी पौधे उगाने का काम किया जा सकेगा। वन विभाग का मानना है कि आने वाले समय में जंगलों को बचाने और बढ़ाने के लिए इस तरह की तकनीक बहुत उपयोगी साबित हो सकती है। अगर बस्सी सेंचुरी में यह प्रयोग सफल रहता है तो इसे दूसरे वन क्षेत्रों के साथ-साथ सीतामाता सेंचुरी में भी लागू किया जा सकता है। इससे न केवल जंगलों की हरियाली बढ़ेगी बल्कि वन्यजीवों को भी बेहतर माहौल मिल सकेगा। विभाग को उम्मीद है कि स्थानीय लोगों की भागीदारी और नई तकनीक के मेल से जंगल संरक्षण के काम को नई दिशा मिलेगी।

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