मध्य प्रदेश में लागू डकैती अधिनियम को लेकर हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच में सुनवाई चल रही है। 6 अक्टूबर 1981 को ग्वालियर-चंबल, सतना और पन्ना के जंगलों में डकैतों के आतंक और लगातार होती ‘पकड़’ (अपहरण) की घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए एक विशेष कानून के रूप में यह ‘11/13 मध्यप्रदेश डकैती अधिनियम’ लाया गया था। समय के साथ-साथ जंगल कम होते गए, तो डकैत भी खत्म होते चले गए। पिछले एक दशक से एमपी के जंगलों में कोई भी लिस्टेड गैंग नहीं है। मध्य प्रदेश के पूर्व गृह मंत्री गोविंद सिंह ने अपनी याचिका में दावा किया कि 2020 से 2026 तक 6 सालों में 1 हजार लोगों पर इस विशेष कानून के तहत FIR दर्ज की गई हैं। जबकि इन्हीं 6 सालों में तीन बार विधानसभा में सरकार के गृह मंत्री खुद यह दावा कर चुके हैं कि अब प्रदेश के जंगलों में कोई लिस्टेड गैंग नहीं है। इसके बाद भी यह विशेष कानून लागू है। 8 सितंबर 2026 को सुनवाई के बाद कोर्ट ने डीजीपी, गृह विभाग के प्रमुख सचिव और ग्वालियर-चंबल अंचल के 6 एसपी को नोटिस जारी किए हैं। इसी के चलते इस सख्त अधिनियम की चर्चाएं हो रही हैं। पढ़िए, क्या है यह अधिनियम, कब और किन परिस्थितियों में लागू किया गया था। जानते हैं क्या है यह अधिनियम… 80 के दशक में था डकैतों का आतंक
मध्य प्रदेश के ग्वालियर-चंबल अंचल के जंगल, बीहड़ में 80 के दशक में कई खूंखार डकैत थे। यह संगठित डकैतों ने सालों से जंगलों पर राज किया है। कुछ ऐसे ही हालात मध्यप्रदेश के सतना, पन्ना, चित्रकूट के जंगल में भी थे। आए दिन डकैती, अपहरण व सामूहिक हत्याओं पर अंकुश लगाने के लिए तत्कालीन मध्य प्रदेश सरकार ने एक विशेष कानून के रूप में 11/13 मध्यप्रदेश डकैती अधिनियम को लाने विचार किया। जिसमें सजा के कड़े प्रावधान थे। ऐसे विशेष मामलों में कोर्ट में ट्रायल के भी विशेष इंतजाम रखे गए। 6 अक्टूबर 1981 को तत्कालीन राष्ट्रपति से अनुमति मिल गई। 7 अक्टूबर 1981 को गजट नोटिफिकेशन के बाद यह कानून लागू हो गया। तब से लेकर अब तक यह कानून बना हुआ है। समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकारों का हनन
इस अधनियम को लेकरकांग्रेस के वरिष्ठ नेता पूर्व नेता प्रतिपक्ष, पूर्व गृहमंत्री गोविंद सिंह ने हाईकोर्ट में इस डकैती अधिनियम को चुनौती देते हुए याचिका लगाई है। तर्क दिया है कि जिन विषम परिस्थितियों में यह कठोर कानून बनाया था, वे अब समाप्त हो चुकी हैं। इसके बावजूद सामान्य विवादों या मारपीट की घटनाओं में भी इस कानून की धारा 11 और 13 जोड़ दी जाती हैं। बिना उचित जांच के कठोर धाराएं लगाने से निर्दोष नागरिकों को अग्रिम जमानत तक नहीं मिलती, जो संविधान में दिए गए समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों के खिलाफ है। हाईकोर्ट ने गृह सचिव, डीजीपी और 6 जिलों के SP से मांगा जवाब जनहित याचिका पर 8 सितंबर 2026 को हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। ग्वालियर डिवीजन बेंच ने ‘मध्य प्रदेश डकैती और व्यपहरण प्रभावित क्षेत्र अधिनियम, 1981’ की संवैधानिकता को लेकर राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है। कोर्ट ने गृह विभाग के प्रमुख सचिव, पुलिस महानिदेशक (DGP) और अंचल के ग्वालियर, शिवपुरी, दतिया, भिंड, मुरैना व श्योपुर के पुलिस अधीक्षकों (SP) को कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। सभी को चार सप्ताह में अपना जवाब देना है। उसके बाद अगली सुनवाई होगी। याचिका में इस कठोर कानून को असंवैधानिक (अल्ट्रा वायर्स) घोषित कर निरस्त करने की मांग की गई है। 45 साल पुराना कानून अब अप्रासंगिक
हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता पूर्व गृहमंत्री गोविंद सिंह की तरफ से सीनियर एडवोकेट राजीव शर्मा ने दलील दी। उन्होंने बताया कि जब राज्य सरकार और गृह विभाग खुद विधानसभा के पटल पर स्वीकार कर चुके हैं कि प्रदेश में कोई भी ‘सूचीबद्ध डकैत गिरोह’ सक्रिय नहीं है, तब इस 45 साल पुराने कानून को लागू रखना पूरी तरह अप्रासंगिक है। उन्होंने कोर्ट को बताया कि… अब बीहड़ में कोई भी डकैत नहीं
शासकीय अधिवक्ता धर्मेंद्र शर्मा ने बताया कि डकैतों की रोकथाम के लिए इस एक्ट को विशेष और कड़े प्रावधानों के साथ लागू किया था। विशेष न्यायालय में इसकी सुनवाई होती है। हालांकि, अब कई वर्षों से जंगल या बीहड़ में कोई भी लिस्टेट डकैत गिरोह नहीं है। उसके बाद भी लगातार यह मध्य प्रदेश डकैती अधिनियम लागू है और उसमें एफआईआर भी दर्ज हो रही हैं और विशेष कोर्ट में सुनवाई भी हो रही है। इसमें 3 साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है। यह 1981 में लाया गया था। 70 से 80 का दशक डकैतों का दशक माना जाता है। चंबल की बीहड़ में एक से बड़े एक खूंखार डकैत हुए थे इसलिए इस एक्ट की जरुरत पड़ी थी। यह खबर भी पढ़ें… MP के 45 साल पुराने ‘डकैती अधिनियम’ को चुनौती मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर डिवीजन बेंच ने ‘मध्य प्रदेश डकैती और व्यपहरण प्रभावित क्षेत्र अधिनियम, 1981’ की संवैधानिकता को लेकर राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है। पूर्व नेता प्रतिपक्ष व पूर्व गृहमंत्री डॉ. गोविंद सिंह की जनहित याचिका पर मंगलवार को सुनवाई हुई। पूरी खबर यहां पढ़ें…

