Marco Rubio और S Jaishankar के बीच Mumbai में अहम बैठक, रक्षा और ऊर्जा पर हुई बात

Marco Rubio और S Jaishankar के बीच Mumbai में अहम बैठक, रक्षा और ऊर्जा पर हुई बात

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो और विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने मंगलवार को मुख्य रूप से ऊर्जा और रक्षा क्षेत्रों में सहयोग पर ध्यान केंद्रित करते हुए व्यापक बातचीत की। यह बातचीत दोनों देशों के संबंधों में जारी तनाव के बीच हुई। जयशंकर और रुबियो की यह मुलाकात, अमेरिका के शीर्ष राजनयिक के मुंबई पहुंचने के कुछ ही समय बाद हुई।

वह भारत की तीन दिवसीय यात्रा पर आए हैं; इससे पहले, विदेश मंत्री के तौर पर उनकी पहली भारत यात्रा लगभग पांच महीने पहले हुई थी। जयशंकर के साथ बातचीत से पहले रुबियो ने ताज स्मारक का दौरा किया और 26/11 के मुंबई आतंकी हमलों के पीड़ितों को श्रद्धांजलि देने के लिए पुष्पचक्र अर्पित किया। इन हमलों में छह अमेरिकी नागरिकों सहित कई लोग मारे गए थे।

अमेरिकी विदेश मंत्री ने सोशल मीडिया पर कहा, “मुंबई में, भारत के विदेश मंत्री डॉ. जयशंकर और मैंने ऊर्जा सुरक्षा तथा रक्षा सहयोग पर चर्चा की, और साथ ही अमेरिका-भारत रणनीतिक साझेदारी को आगे बढ़ाने के महत्व को दोहराया।”
शीर्ष राजनयिक ने भारत-अमेरिका ऊर्जा संबंधों और साथ ही बुधवार को जामनगर में रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड की रिफाइनरी की अपनी यात्रा के बारे में मीडिया के सवालों के जवाब भी दिए। उन्होंने कहा, “ऊर्जा को इस्तेमाल के लायक बनाने के लिए, आपको उसे शोधित करना पड़ता है। आपके पास एक ऐसी कंपनी है जिसके पास शोधन की बहुत बड़ी क्षमता है।

मुझे लगता है कि मुझे उनसे बात करनी चाहिए, खासकर तब जब इसमें अलग-अलग देश शामिल हों।”
उन्होंने कहा, “हम एक ऐसी कंपनी के पास जा रहे हैं, जिसके पास शोधन की बहुत बड़ी क्षमता है। उनसे इस बारे में बात करना बिल्कुल सही रहेगा। अगर आप उनसे बात नहीं करेंगे, तो किसी चीज को समझना या यह देखना बहुत मुश्किल होगा कि क्या संभावनाएं हैं।”
अमेरिकी विदेश मंत्री ने भारत द्वारा रूस से कच्चा तेल खरीदने के सवाल पर भी प्रतिक्रिया दी।

उन्होंने कहा, “भारत ने बार-बार अपने ऊर्जा पोर्टफोलियो में विविधता लाने की इच्छा जताई है, जो कि एक समझदारी भरा कदम है। ऐसा रातों-रात कर पाना आसान नहीं है।”
रुबियो ने कहा, “मुझे लगता है कि उन्होंने इस दिशा में काफी अच्छी प्रगति की है, और यह देखकर हमें खुशी है। लेकिन आखिरकार, बात सिर्फ रूसी तेल की नहीं है; बल्कि यह भारत की अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने की इच्छा के बारे में है, और हमें लगता है कि हम भारत की ऊर्जा जरूरतों के लिए एक स्रोत बन सकते हैं।”
उन्होंने कहा, “हमने वेनेजुएला और अन्य देशों के बारे में चर्चा की है, और मुझे लगता है कि विविध ऊर्जा पोर्टफोलियो वाले मजबूत सहयोगी होना हमारे हित में है।”
अपनी इस यात्रा से पहले रुबियो ने उज्बेकिस्तान में कहा कि अमेरिका भारत के साथ व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के ‘‘बेहद करीब’’ है।

उन्होंने यह भी संकेत दिया कि रूसी तेल खरीदने पर अमेरिका द्वारा शुल्क में छूट देने का फैसला इसी से जुड़ा है। पिछले सप्ताह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस और रूसी तेल के पांच सबसे बड़े खरीदारों, जिनमें भारत भी शामिल है, पर लगाए गए कुछ प्रतिबंधों को निलंबित कर दिया था। रुबियो ने कहा, ‘‘हम अभी भारत के साथ व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने की कोशिश कर रहे हैं।

हम ऐसा करने के बहुत करीब हैं। इसलिए जब राष्ट्रपति राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी छूट या इस तरह के अन्य मामलों पर कोई फैसला लेते हैं तो हम इन बातों को भी ध्यान में रखते हैं।’’
भारत और अमेरिका 2025 की शुरुआत से ही एक प्रस्तावित व्यापार समझौते पर बातचीत कर रहे हैं। इसका उद्देश्य शुल्क संबंधी विवादों को सुलझाना, गैर-टैरिफ बाधाओं को हटाना और दोनों देशों के बीच बाजार तक पहुंच को बढ़ाना है।

भारत चाहता है कि अमेरिकी बाजार में उसके सामान पर उसके प्रतिस्पर्धियों की तुलना में बेहतर शुल्क दरें लागू हों। जयशंकर ने कुछ दिन पहले कहा था कि दोनों देशों के बीच व्यापार वार्ता अब समझौते के अंतिम चरण के करीब पहुंच रही है। पिछले साल अमेरिका द्वारा भारत पर दंडात्मक शुल्क लगाए जाने और ट्रंप द्वारा मई 2025 में भारत-पाकिस्तान सैन्य टकराव को कम करने में अपनी भूमिका के दावे किए जाने के बाद भारत-अमेरिका संबंधों में काफी गिरावट आई थी।

ट्रंप के इन दावों पर भारतीय अधिकारियों ने तीखी प्रतिक्रिया दी थी। अमेरिका की नयी आव्रजन नीति और एच-1बी वीजा शुल्क बढ़ाने के फैसले ने भी भारत-अमेरिका संबंधों में गिरावट में योगदान दिया। इसके अलावा, जब अमेरिका ने टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) और विप्रो जैसी प्रमुख वैश्विक और भारतीय आईटी कंपनियों के लिए एक महत्वपूर्ण ग्रीन-कार्ड प्रोसेसिंग प्रोग्राम को सीमित करने का फैसला किया तो दोनों देशों के संबंधों में और अधिक तनाव आ गया।

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