हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि लोक अदालत अथवा जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को तलाक की डिक्री देने का कोई अधिकार नहीं है। न्यायालय ने कहा कि विवाह विच्छेद की डिक्री देने का क्षेत्राधिकार सिर्फ परिवार न्यायालय के पास है और लोक अदालतें समझौता कराने तक सीमित हैं, वे न्यायिक निर्णय नहीं दे सकतीं। यह निर्णय न्यायमूर्ति शेखर बी सराफ़ व न्यायमूर्ति एके चौधरी की खंडपीठ ने उस याचिका पर दिया जिसमें एक महिला ने वर्ष 2018 में उन्नाव जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की ओर से पारित आदेश को चुनौती दी थी। पति ने उक्त समझौते को तलाक मानते हुए पुनर्विवाह का आधार बना लिया था। पुनर्विवाह के स्वतंत्रता कानूनन अस्वीकार्य न्यायालय ने कहा कि विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 और राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (लोक अदालत) विनियम, 2009 के अनुसार तलाक संबंधी मामलों को लोक अदालत में निर्णय हेतु नहीं भेजा जा सकता। लोक अदालत का कार्य केवल पक्षकारों के बीच समझौते का प्रयास करना है, न कि विवाद का न्यायिक निस्तारण करना। न्यायालय ने विधिक सेवा प्राधिकरण, उन्नाव की कार्रवाई पर गंभीर नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि जब कानून स्वयं लोक अदालत को तलाक देने से रोकता है, तब ऐसे आदेश पारित करना अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण है। न्यायालय ने यह भी कहा कि समझौते में यह उल्लेख करना कि दोनों पक्ष पुनर्विवाह के लिए स्वतंत्र हैं, कानूनन अस्वीकार्य और अवैध है। अदालतों को नियमित न्यायलयों के क्षेत्र में प्रवेश नहीं करना चाहिए न्यायालय ने स्पष्ट किया कि आज तक पक्षकारों के बीच किसी सक्षम न्यायालय की ओर से विधिवत तलाक की डिक्री पारित नहीं हुई है इसलिए पति के उक्त समझौते को तलाक का आधार बताना विधि सम्मत नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने कहा कि लोक अदालतें त्वरित और सुलभ न्याय व्यवस्था का महत्वपूर्ण माध्यम हैं, लेकिन उन्हें अपने अधिकार क्षेत्र की सीमाओं में रहकर कार्य करना होगा। नियमित न्यायालयों के लिए सुरक्षित क्षेत्र में प्रवेश नहीं करना चाहिए। मामले का निस्तारण करते हुए हाईकोर्ट ने याची महिला को कानून के अनुसार उचित कार्रवाई करने की स्वतंत्रता प्रदान की और आदेश की प्रति प्रदेश की सभी लोक अदालतों और जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों को भविष्य में अनुपालन एवं मार्गदर्शन हेतु भेजने का निर्देश दिया।


