राजस्थान के सीमावर्ती जिले जैसलमेर के धोरों से निकलकर अपनी कला का जादू बिखेरने वाले मशहूर लोक कलाकार तगाराम भील को आज नई दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक भव्य नागरिक सम्मान समारोह में देश के प्रतिष्ठित नागरिक पुरस्कार ‘पर्मश्री’ से नवाजा गया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें कला के क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान और थार मरुस्थल की पारंपरिक संगीत संस्कृति को वैश्विक स्तर पर एक नई पहचान दिलाने के लिए यह सम्मान प्रदान किया। पत्थर तोड़ने से राष्ट्रपति भवन तक का सफर तगाराम भील का जन्म जैसलमेर के मूलसागर गांव में एक साधारण भील परिवार में हुआ था। उनका शुरुआती जीवन बेहद संघर्षों से भरा रहा। महज 20 साल की उम्र में वे अपना और परिवार का पेट पालने के लिए पत्थरों की खदानों में मजदूरी करते थे और पत्थर तोड़ने का काम करते थे। कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने संगीत के प्रति अपने लगाव को कभी कम नहीं होने दिया। उन्होंने थार के पारंपरिक और प्राचीन लोक वाद्य यंत्र ‘अलगोजा’ (दो बांसुरियों से बना वाद्य) को बजाने में महारत हासिल की। कठिन साधना से मिली वैश्विक पहचान अलगोजा बजाना बेहद कठिन माना जाता है, क्योंकि इसमें कलाकार को अपनी सांसों की हवा को बिना रुके लगातार फूंक के जरिए वाद्य यंत्र में डालना पड़ता है। तगाराम ने दिन-रात रियाज कर इसमें ऐसी सिद्धहस्तता पाई कि जब एक संगीत सम्मेलन में उन्हें पहली बार मंच मिला, तो उनके अलगोजे की मधुर धुन सुनकर लोग मंत्रमुग्ध हो गए। धीरे-धीरे उनकी कला की गूंज देश की सीमाओं को पार कर गई। वे अब तक अमेरिका, यूरोप, जापान और कनाडा सहित 35 से अधिक देशों में अपनी शानदार प्रस्तुतियां दे चुके हैं। कला को जीवित रखने का संकल्प आज जब आधुनिकता के दौर में प्राचीन लोक कलाएं लुप्त होने के कगार पर हैं, तगाराम भील अपनी इस धरोहर को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने में जुटे हैं। वे अपने गांव में युवाओं को अलगोजा बजाने का प्रशिक्षण देते हैं, साथ ही वे अपनी हस्तकला से खुद अलगोजा बनाने का काम भी करते हैं। राष्ट्रपति के हाथों पद्मश्री मिलने के बाद तगाराम भील और पूरे जैसलमेर में खुशी का माहौल है। इस सम्मान पर खुशी जताते हुए उन्होंने कहा कि यह सम्मान उनकी मेहनत और राजस्थान की समृद्ध लोक संस्कृति का है। वे आगे भी इस कला को जिंदा रखने के लिए काम करते रहेंगे।


