“Abandoned newborns found in Jaipur: कहते हैं कि मां की गोद दुनिया की सबसे सुरक्षित जगह होती है, लेकिन गुलाबी नगरी के कानोता इलाके में शुक्रवार को ममता का एक ऐसा चेहरा सामने आया जिसे देख पत्थर दिल भी पसीज जाए। 41.8 डिग्री सेल्सियस की झुलसा देने वाली गर्मी में, जहां बड़ों का दम घुट रहा था, वहां दो मासूम नवजातों को उनके ही अपनों ने मौत के मुंह में धकेल दिया।
दो अलग-अलग स्थान, एक ही दर्दनाक कहानी
कानोता थाना क्षेत्र में शुक्रवार को मानवता उस वक्त लहूलुहान हो गई जब दो अलग-अलग जगहों पर नवजात लावारिस हालत में मिले।
पहली घटना (सिंघौली क्षेत्र): ढूंढ नदी के बांध के पास झाड़ियों से किसी के रोने की आवाज आ रही थी। एक राहगीर ने जब पास जाकर देखा तो उसकी रूह कांप गई। एक नवजात प्लास्टिक की थैली में बंद था और सांस लेने के लिए छटपटा रहा था। पास ही खून से सना एक पायदान और कपड़ों से भरा बैग मिला, जिससे अंदेशा लगाया जा रहा है कि बच्चे को किसी वाहन से लाकर यहां फेंका गया है।
दूसरी घटना (मानगढ़ खोखावाला): यहां भी एक मकान के पीछे टीनशेड के नीचे एक और नवजात मिला। पुलिस के अनुसार दोनों बच्चों (एक बालक और एक बालिका) का जन्म महज 2-3 घंटे पहले ही हुआ था।
मेडिकल क्लैंप ने खोला राज: अस्पताल में हुआ था जन्म
हैरान कर देने वाली बात यह है कि एक नवजात की नाल (Umbilical cord) पर मेडिकल क्लैंप लगा हुआ मिला है। यह इस बात का पुख्ता सबूत है कि बच्चे का जन्म किसी अस्पताल या नर्सिंग होम में हुआ था। पुलिस अब आस-पास के सभी अस्पतालों के प्रसव रिकॉर्ड खंगाल रही है ताकि उन ‘निर्दयी’ माता-पिता तक पहुंचा जा सके जिन्होंने इन फूलों जैसे बच्चों को कांटों के बीच छोड़ दिया।
जेके लोन अस्पताल में चल रहा है इलाज
पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए दोनों नवजातों को तुरंत जयपुर के जेके लोन अस्पताल में भर्ती कराया है। फिलहाल डॉक्टर्स की टीम उनकी देखरेख कर रही है। स्वस्थ होने के बाद इन बच्चों को बाल कल्याण समिति (CWC) को सौंपा जाएगा। बताया जा रहा है कि दोनों बच्चों की स्कीन लाल कुछ जगहों से लाल हो गई है। संभवतः भीषण गर्मी से स्कीन झुलसी है। उसका भी इलाज जारी है। प्रशासन का कहना है कि बच्चों की जान बचाना उनकी पहली प्राथमिकता है।
मासूम को छोड़ना सिर्फ पाप नहीं, अपराध भी है
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों को इस तरह लावारिस छोड़ना एक गंभीर अपराध है। एडवोकेट सबदेश राठौड़ बताते हैं कि:
“BNS की धारा 91 के तहत 12 वर्ष से कम उम्र के बच्चे को त्यागना दंडनीय अपराध है। इसमें दोषी को 7 साल तक की सजा और जुर्माना हो सकता है। अगर कोई पालन नहीं कर सकता, तो ‘पालना गृह’ एक सुरक्षित विकल्प है, जहां बच्चे को बिना पहचान बताए छोड़ा जा सकता है।”
सवाल जो समाज को झकझोर रहे हैं
क्या मजबूरी इतनी बड़ी हो सकती है कि एक मां अपने ही कलेजे के टुकड़े को 41.8 डिग्री की जलती धूप में मरने के लिए छोड़ दे? उन मासूमों का क्या कसूर था, जिन्होंने अभी दुनिया में ठीक से आंखें भी नहीं खोली थीं? यह घटना न केवल पुलिस के लिए एक चुनौती है, बल्कि हमारे समाज के गिरते नैतिक मूल्यों पर भी एक गहरा प्रहार है।


