क्या अंदर से टूट चुका है इजरायल ? ट्रंप के एक फैसले ने खोल दी पोल, जानें क्यों लेनी पड़ी सुपरपॉवर अमेरिका से मदद

क्या अंदर से टूट चुका है इजरायल ? ट्रंप के एक फैसले ने खोल दी पोल, जानें क्यों लेनी पड़ी सुपरपॉवर अमेरिका से मदद

US Financial Aid: इजरायल की गिनती दुनिया के सबसे ताकतवर, तकनीकी रूप से उन्नत और अमीर देशों में होती है। वहां का ‘स्टार्टअप कल्चर’ और मजबूत अर्थव्यवस्था पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल मानी जाती है। लेकिन इन दिनों एक खबर ने वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इजरायल को एक बड़ा आर्थिक राहत पैकेज देने जा रहे हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जो देश खुद इतना संपन्न है, उसे अचानक अमेरिका से इस भारी-भरकम आर्थिक मदद की जरूरत क्यों आन पड़ी?

ईरान जंग से इजरायल के खजाने पर भारी बोझ डाला

इस पूरी कहानी की जड़ मध्य पूर्व में चल रहा लंबा और विनाशकारी युद्ध है। ईरान और उसके समर्थक सशस्त्र गुटों के साथ लगातार चल रहे टकराव ने इजरायल के खजाने पर भारी बोझ डाल दिया है। युद्ध के कारण सेना का रोजाना का खर्च आसमान छू रहा है। इसके अलावा, लंबे समय तक रिजर्व सैनिकों की ड्यूटी पर तैनाती के कारण इजरायल के कई घरेलू कारोबार और उद्योग ठप पड़ गए हैं। विदेशी निवेश में भी भारी गिरावट दर्ज की गई है। लगातार मिसाइल हमलों से निपटने के लिए अपने ‘आयरन डोम’ और अन्य रक्षा प्रणालियों को चालू रखने के लिए इजरायल को तुरंत बड़े नकदी की आवश्यकता है।

अमेरिका हर मुश्किल घड़ी में अपने सबसे खास दोस्त इजरायल के साथ

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति में इजरायल हमेशा से एक बेहद अहम और रणनीतिक साझीदार रहा है। ट्रंप प्रशासन का स्पष्ट मानना है कि मध्य पूर्व में अमेरिका का दबदबा बनाए रखने और ईरान को काबू में रखने के लिए इजरायल का सैन्य और आर्थिक रूप से मजबूत रहना बहुत जरूरी है। यह बेलआउट पैकेज सिर्फ पैसे का लेन-देन नहीं है, बल्कि दुनिया और खासकर ईरान को यह सीधा संदेश है कि अमेरिका हर मुश्किल घड़ी में अपने सबसे खास दोस्त के साथ पूरी ताकत से खड़ा है।

यह ट्रंप का एक मास्टरस्ट्रोक

इस बड़े आर्थिक फैसले पर अमेरिका और दुनिया भर से मिली-जुली प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञों और ट्रंप के समर्थकों का कहना है कि यह एक मास्टरस्ट्रोक है, जो मध्य पूर्व में इजरायल की सुरक्षा सुनिश्चित करेगा। वहीं, दूसरी ओर आलोचक और कई अमेरिकी नागरिक इस फैसले से नाराज हैं। उनका स्पष्ट तर्क है कि जब इजरायल खुद एक विकसित देश है, तो अमेरिकी करदाताओं की गाढ़ी कमाई का पैसा वहां क्यों भेजा जा रहा है? आलोचकों का मानना है कि अमेरिका को यह पैसा अपने देश की महंगाई कम करने और घरेलू अर्थव्यवस्था को सुधारने में खर्च करना चाहिए।

डोनाल्ड ट्रंप के लिए अपने ही देश में चुनौती

इस ऐलान के बाद अब सबकी निगाहें अमेरिकी संसद (कांग्रेस) पर टिक गई हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस भारी-भरकम बेलआउट पैकेज को संसद से कैसे पास करवाते हैं, क्योंकि वहां उन्हें विपक्ष के कड़े सवालों का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा, हमारी नजर इस बात पर भी रहेगी कि अमेरिका के इस कदम के बाद ईरान और अन्य खाड़ी देश कूटनीतिक या सैन्य स्तर पर क्या नई रणनीति अपनाते हैं। क्या इससे युद्ध और भड़केगा या शांति की कोई नई राह निकलेगी?

कूटनीतिक नजरिये से देखें तो यह अमेरिका की मजबूरी

इस पूरी खबर का एक बड़ा ‘पहलू’ इजरायल की वैश्विक छवि से जुड़ा है। दशकों से इजरायल ने खुद को एक ‘आत्मनिर्भर’ और मजबूत ‘स्टार्टअप नेशन’ के तौर पर पेश किया है। लेकिन इस बेलआउट पैकेज की मांग ने उसकी इस अजेय छवि को थोड़ी ठेस पहुंचाई है। इसके साथ ही, यह इस बात का भी प्रमाण है कि आधुनिक युग में कोई युद्ध कितना खर्चीला हो सकता है कि एक अमीर देश की अर्थव्यवस्था भी कुछ ही महीनों में डगमगाने लगती है। कूटनीतिक नजरिये से देखें तो यह अमेरिका की भी मजबूरी है, क्योंकि वह अपने सबसे बड़े क्षेत्रीय सहयोगी को कमजोर पड़ता हुआ नहीं देख सकता।

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