मोबाइल फोन, टीवी और अन्य डिजिटल उपकरणों का बढ़ता इस्तेमाल बच्चों के मानसिक, शारीरिक और सामाजिक विकास के लिए गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों में बढ़ता स्क्रीन टाइम आने वाले वर्षों में एक बड़े स्वास्थ्य संकट का कारण बन सकता है। बदलती जीवनशैली, अभिभावकों की व्यस्तता और शारीरिक गतिविधियों में कमी के कारण बच्चे तेजी से डिजिटल उपकरणों पर निर्भर होते जा रहे हैं। शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. अजय कुमार (डीएम पेडियाट्रिक न्यूरोलॉजी) ने इस स्थिति को चिंताजनक बताया। उन्होंने कहा कि आज कई बच्चे मोबाइल देखे बिना खाना तक नहीं खाते। अभिभावकों की व्यस्त दिनचर्या और परिवार में संवाद की कमी के कारण बच्चों का जुड़ाव अब खेलकूद और सामाजिक गतिविधियों के बजाय मोबाइल फोन, टीवी और अन्य डिजिटल उपकरणों से अधिक हो गया है। पहले बच्चे अपना समय खेलकूद, दोस्तों और परिवार के साथ बिताते थे, लेकिन अब उनका अधिकांश समय स्क्रीन के सामने गुजर रहा है। इसका असर उनके व्यवहार, भाषा विकास और सीखने की क्षमता पर साफ दिखाई दे रहा है। कम्यूनिकेशन क्षमता हो रही प्रभावित डॉ. कुमार ने बताया कि पहले बच्चे अपना अधिकांश समय दोस्तों के साथ खेलने, नई चीजें सीखने और परिवार के साथ बिताते थे, लेकिन अब एक बड़ा वर्ग मोबाइल स्क्रीन तक सीमित होता जा रहा है। इसका सीधा असर उनके व्यवहार, भाषा, सीखने की क्षमता और मानसिक स्वास्थ्य पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा गहरा असर डॉ. अजय कुमार ने जोर देकर कहा कि शिशु रोग विशेषज्ञ की भूमिका अब केवल बीमारी का इलाज करने तक सीमित नहीं है। बच्चों के संपूर्ण शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास को सुनिश्चित करना भी चिकित्सकों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। उन्होंने अभिभावकों से स्क्रीन टाइम के खतरों को समझने और सामुदायिक स्तर पर जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया। बढ़ रही हैं मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं विशेषज्ञों के अनुसार बढ़ते स्क्रीन टाइम का सीधा असर बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। लंबे समय तक मोबाइल और टीवी देखने वाले बच्चों में एंजाइटी, तनाव, नींद की समस्या, अवसाद और चिड़चिड़ापन तेजी से बढ़ रहा है। बच्चों का सामाजिक विकास हो रहा प्रभावित बिहार की जानी-मानी क्लिनिकल फिजियोलॉजिस्ट ईषा सिंह ने कहा कि आज स्क्रीन टाइम, मोबाइल और सोशल मीडिया हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन चुके हैं। इन्हें पूरी तरह खत्म करना संभव नहीं है, लेकिन इनके अनियंत्रित उपयोग से बच्चों पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि कई शोध और विशेषज्ञों की राय बताती है कि अत्यधिक स्क्रीन टाइम बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास में बड़ी बाधा बन रहा है। आज स्थिति यह है कि छोटे बच्चे मोबाइल और टीवी के बिना खाना नहीं खाते। दिनभर स्क्रीन के सामने समय बिताने के कारण वे दूसरे बच्चों के साथ खेलना, बातचीत करना और सामाजिक व्यवहार सीखना भूलते जा रहे हैं। डॉ. ईषा सिंह ने बताया कि ऐसे बच्चों में एंजाइटी, घबराहट और सामाजिक अलगाव जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। अभिभावकों को यह समझने की जरूरत है कि बच्चे को व्यस्त रखने के लिए मोबाइल देना तत्काल समाधान भले लगे, लेकिन भविष्य में इसके गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं। खाना खाते समय मोबाइल देखने की आदत भी खतरनाक डॉ . ईषा सिंह ने बताया कि मोबाइल देखते हुए खाना खाने की आदत बच्चों के विकास पर नकारात्मक असर डालती है। जब बच्चा मोबाइल देखते हुए खाना खाता है तो उसका पूरा ध्यान स्क्रीन पर केंद्रित रहता है। वह न तो भोजन के स्वाद को महसूस कर पाता है और न ही खाने की प्रक्रिया को समझ पाता है। बच्चों में दिख रही हैं ये प्रमुख समस्याएं …
ईषा सिंह के अनुसार, अत्यधिक स्क्रीन टाइम के कारण बच्चों में कई महत्वपूर्ण जीवन कौशल प्रभावित हो रहे हैं। इनमें शामिल हैं: नींद, पढ़ाई और आंखों पर भी पड़ रहा असर विशेषज्ञों के अनुसार, बढ़ते स्क्रीन टाइम का सबसे गंभीर असर बच्चों की नींद, आंखों और पढ़ाई पर पड़ रहा है। देर रात तक मोबाइल चलाने से स्लीप डिस्टरबेंस की समस्या बढ़ रही है। पर्याप्त नींद नहीं मिलने के कारण बच्चों में ध्यान केंद्रित करने की क्षमता कम हो रही है। इसके अलावा एकेडमिक परफॉर्मेंस में गिरावट, कंसंट्रेशन की कमी और सीखने की क्षमता पर भी नकारात्मक प्रभाव देखा जा रहा है। लंबे समय तक स्क्रीन देखने से आंखों में तनाव, सिरदर्द और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं भी बढ़ रही हैं। निर्धारित समय और संतुलित उपयोग ही समाधान डॉ. ईषा सिंह का मानना है कि आज के समय में मोबाइल, टीवी और सोशल मीडिया से पूरी तरह दूरी बनाना संभव नहीं है। लेकिन इनके उपयोग के लिए स्पष्ट नियम और निर्धारित समय तय करना जरूरी है। उन्होंने बताया कि अभिभावकों को बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम की सीमा तय करनी चाहिए। साथ ही उन्हें खेलकूद, पुस्तक पढ़ने, रचनात्मक गतिविधियों और परिवार के साथ समय बिताने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते इस दिशा में कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं और गंभीर रूप ले सकती हैं। मोबाइल फोन, टीवी और अन्य डिजिटल उपकरणों का बढ़ता इस्तेमाल बच्चों के मानसिक, शारीरिक और सामाजिक विकास के लिए गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों में बढ़ता स्क्रीन टाइम आने वाले वर्षों में एक बड़े स्वास्थ्य संकट का कारण बन सकता है। बदलती जीवनशैली, अभिभावकों की व्यस्तता और शारीरिक गतिविधियों में कमी के कारण बच्चे तेजी से डिजिटल उपकरणों पर निर्भर होते जा रहे हैं। शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. अजय कुमार (डीएम पेडियाट्रिक न्यूरोलॉजी) ने इस स्थिति को चिंताजनक बताया। उन्होंने कहा कि आज कई बच्चे मोबाइल देखे बिना खाना तक नहीं खाते। अभिभावकों की व्यस्त दिनचर्या और परिवार में संवाद की कमी के कारण बच्चों का जुड़ाव अब खेलकूद और सामाजिक गतिविधियों के बजाय मोबाइल फोन, टीवी और अन्य डिजिटल उपकरणों से अधिक हो गया है। पहले बच्चे अपना समय खेलकूद, दोस्तों और परिवार के साथ बिताते थे, लेकिन अब उनका अधिकांश समय स्क्रीन के सामने गुजर रहा है। इसका असर उनके व्यवहार, भाषा विकास और सीखने की क्षमता पर साफ दिखाई दे रहा है। कम्यूनिकेशन क्षमता हो रही प्रभावित डॉ. कुमार ने बताया कि पहले बच्चे अपना अधिकांश समय दोस्तों के साथ खेलने, नई चीजें सीखने और परिवार के साथ बिताते थे, लेकिन अब एक बड़ा वर्ग मोबाइल स्क्रीन तक सीमित होता जा रहा है। इसका सीधा असर उनके व्यवहार, भाषा, सीखने की क्षमता और मानसिक स्वास्थ्य पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा गहरा असर डॉ. अजय कुमार ने जोर देकर कहा कि शिशु रोग विशेषज्ञ की भूमिका अब केवल बीमारी का इलाज करने तक सीमित नहीं है। बच्चों के संपूर्ण शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास को सुनिश्चित करना भी चिकित्सकों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। उन्होंने अभिभावकों से स्क्रीन टाइम के खतरों को समझने और सामुदायिक स्तर पर जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया। बढ़ रही हैं मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं विशेषज्ञों के अनुसार बढ़ते स्क्रीन टाइम का सीधा असर बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। लंबे समय तक मोबाइल और टीवी देखने वाले बच्चों में एंजाइटी, तनाव, नींद की समस्या, अवसाद और चिड़चिड़ापन तेजी से बढ़ रहा है। बच्चों का सामाजिक विकास हो रहा प्रभावित बिहार की जानी-मानी क्लिनिकल फिजियोलॉजिस्ट ईषा सिंह ने कहा कि आज स्क्रीन टाइम, मोबाइल और सोशल मीडिया हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन चुके हैं। इन्हें पूरी तरह खत्म करना संभव नहीं है, लेकिन इनके अनियंत्रित उपयोग से बच्चों पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि कई शोध और विशेषज्ञों की राय बताती है कि अत्यधिक स्क्रीन टाइम बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास में बड़ी बाधा बन रहा है। आज स्थिति यह है कि छोटे बच्चे मोबाइल और टीवी के बिना खाना नहीं खाते। दिनभर स्क्रीन के सामने समय बिताने के कारण वे दूसरे बच्चों के साथ खेलना, बातचीत करना और सामाजिक व्यवहार सीखना भूलते जा रहे हैं। डॉ. ईषा सिंह ने बताया कि ऐसे बच्चों में एंजाइटी, घबराहट और सामाजिक अलगाव जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। अभिभावकों को यह समझने की जरूरत है कि बच्चे को व्यस्त रखने के लिए मोबाइल देना तत्काल समाधान भले लगे, लेकिन भविष्य में इसके गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं। खाना खाते समय मोबाइल देखने की आदत भी खतरनाक डॉ . ईषा सिंह ने बताया कि मोबाइल देखते हुए खाना खाने की आदत बच्चों के विकास पर नकारात्मक असर डालती है। जब बच्चा मोबाइल देखते हुए खाना खाता है तो उसका पूरा ध्यान स्क्रीन पर केंद्रित रहता है। वह न तो भोजन के स्वाद को महसूस कर पाता है और न ही खाने की प्रक्रिया को समझ पाता है। बच्चों में दिख रही हैं ये प्रमुख समस्याएं …
ईषा सिंह के अनुसार, अत्यधिक स्क्रीन टाइम के कारण बच्चों में कई महत्वपूर्ण जीवन कौशल प्रभावित हो रहे हैं। इनमें शामिल हैं: नींद, पढ़ाई और आंखों पर भी पड़ रहा असर विशेषज्ञों के अनुसार, बढ़ते स्क्रीन टाइम का सबसे गंभीर असर बच्चों की नींद, आंखों और पढ़ाई पर पड़ रहा है। देर रात तक मोबाइल चलाने से स्लीप डिस्टरबेंस की समस्या बढ़ रही है। पर्याप्त नींद नहीं मिलने के कारण बच्चों में ध्यान केंद्रित करने की क्षमता कम हो रही है। इसके अलावा एकेडमिक परफॉर्मेंस में गिरावट, कंसंट्रेशन की कमी और सीखने की क्षमता पर भी नकारात्मक प्रभाव देखा जा रहा है। लंबे समय तक स्क्रीन देखने से आंखों में तनाव, सिरदर्द और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं भी बढ़ रही हैं। निर्धारित समय और संतुलित उपयोग ही समाधान डॉ. ईषा सिंह का मानना है कि आज के समय में मोबाइल, टीवी और सोशल मीडिया से पूरी तरह दूरी बनाना संभव नहीं है। लेकिन इनके उपयोग के लिए स्पष्ट नियम और निर्धारित समय तय करना जरूरी है। उन्होंने बताया कि अभिभावकों को बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम की सीमा तय करनी चाहिए। साथ ही उन्हें खेलकूद, पुस्तक पढ़ने, रचनात्मक गतिविधियों और परिवार के साथ समय बिताने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते इस दिशा में कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं और गंभीर रूप ले सकती हैं।


