एहलर्स-डानलोस सिंड्रोम व हाइपरमोबिलिटी स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर के बढ़ रहे केस

भास्कर न्यूज | उजियारपुर उजियारपुर प्रखंड स्थित देसुआ पब्लिक लाइब्रेरी में एहलर्स-डानलोस सिंड्रोम और हाइपरमोबिलिटी स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर पर एक जागरूकता सेमिनार का आयोजन किया गया। इस अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि आप हर सुबह इस अनिश्चितता के साथ जागें कि आज शरीर का कौन-सा हिस्सा दर्द देगा या कौन-सा नया लक्षण सामने आएगा। यह स्थिति उन लोगों की है जो एहलर्स-डानलोस सिंड्रोम और हाइपरमोबिलिटी स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर जैसी दुर्लभ बीमारियों से पीड़ित हैं। मरीजों के साथ-साथ उनके परिवार और देखभाल करने वालों को भी रोज नई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ईडीएस और एच‌एसडी शरीर के संयोजी ऊतकों से जुड़ी बीमारियां हैं। मुख्य वक्ता प्रो सरमन सिंह ने कहा कि संयोजी ऊतक त्वचा, मांसपेशियों, जोड़ों, रक्त वाहिकाओं और अन्य अंगों को मजबूती प्रदान करते हैं। इन बीमारियों में कोलेजन नामक महत्वपूर्ण प्रोटीन में गड़बड़ी हो जाती है, जिससे जोड़ों में अत्यधिक लचीलापन, बार-बार चोट लगना, त्वचा का असामान्य रूप से खिंचना और कई अन्य जटिल समस्याएं पैदा होती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, बीमारी का असर केवल जोड़ों तक सीमित नहीं रहता बल्कि हृदय, पाचन तंत्र, श्वसन तंत्र, तंत्रिका तंत्र और रीढ़ की हड्डी तक भी पहुंच सकता है। कुछ मामलों में रक्त वाहिकाओं के फटने और गंभीर रक्तस्राव का खतरा भी बना रहता है। ईडीएस और एच‌एसडी की पहचान मुख्य रूप से मरीज के लक्षणों, पारिवारिक इतिहास और शारीरिक परीक्षणों के आधार पर की जाती है। इसके लिए ‘बीटन स्कोर’ नामक 9 अंकों का पैमाना इस्तेमाल किया जाता है। इन बीमारियों से पीड़ित लोगों को अक्सर ऐसी सुविधाओं की जरूरत होती है जो बाहर से दिखाई नहीं देतीं। स्कूल, कॉलेज और कार्यस्थलों पर लचीली व्यवस्था, घर से काम करने के अवसर, आपातकालीन चिकित्सा सहायता और मानसिक-सामाजिक सहयोग उनके जीवन को आसान बना सकते हैं।विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में इसके वास्तविक मरीजों की संख्या अभी अज्ञात है। विशेषज्ञ मनीष तरूण ने कहा कि चूंकि ये आनुवंशिक विकार हैं, इसलिए इनका स्थायी इलाज उपलब्ध नहीं है। फिलहाल उपचार का उद्देश्य दर्द, थकान, पाचन संबंधी समस्याओं और अन्य लक्षणों को नियंत्रित करना है। फिजियोथेरेपी, जीवनशैली में बदलाव और नियमित चिकित्सकीय निगरानी मरीजों के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में ऐसे मरीजों के लिए न तो पर्याप्त विशेषज्ञ उपलब्ध हैं। भास्कर न्यूज | उजियारपुर उजियारपुर प्रखंड स्थित देसुआ पब्लिक लाइब्रेरी में एहलर्स-डानलोस सिंड्रोम और हाइपरमोबिलिटी स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर पर एक जागरूकता सेमिनार का आयोजन किया गया। इस अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि आप हर सुबह इस अनिश्चितता के साथ जागें कि आज शरीर का कौन-सा हिस्सा दर्द देगा या कौन-सा नया लक्षण सामने आएगा। यह स्थिति उन लोगों की है जो एहलर्स-डानलोस सिंड्रोम और हाइपरमोबिलिटी स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर जैसी दुर्लभ बीमारियों से पीड़ित हैं। मरीजों के साथ-साथ उनके परिवार और देखभाल करने वालों को भी रोज नई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ईडीएस और एच‌एसडी शरीर के संयोजी ऊतकों से जुड़ी बीमारियां हैं। मुख्य वक्ता प्रो सरमन सिंह ने कहा कि संयोजी ऊतक त्वचा, मांसपेशियों, जोड़ों, रक्त वाहिकाओं और अन्य अंगों को मजबूती प्रदान करते हैं। इन बीमारियों में कोलेजन नामक महत्वपूर्ण प्रोटीन में गड़बड़ी हो जाती है, जिससे जोड़ों में अत्यधिक लचीलापन, बार-बार चोट लगना, त्वचा का असामान्य रूप से खिंचना और कई अन्य जटिल समस्याएं पैदा होती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, बीमारी का असर केवल जोड़ों तक सीमित नहीं रहता बल्कि हृदय, पाचन तंत्र, श्वसन तंत्र, तंत्रिका तंत्र और रीढ़ की हड्डी तक भी पहुंच सकता है। कुछ मामलों में रक्त वाहिकाओं के फटने और गंभीर रक्तस्राव का खतरा भी बना रहता है। ईडीएस और एच‌एसडी की पहचान मुख्य रूप से मरीज के लक्षणों, पारिवारिक इतिहास और शारीरिक परीक्षणों के आधार पर की जाती है। इसके लिए ‘बीटन स्कोर’ नामक 9 अंकों का पैमाना इस्तेमाल किया जाता है। इन बीमारियों से पीड़ित लोगों को अक्सर ऐसी सुविधाओं की जरूरत होती है जो बाहर से दिखाई नहीं देतीं। स्कूल, कॉलेज और कार्यस्थलों पर लचीली व्यवस्था, घर से काम करने के अवसर, आपातकालीन चिकित्सा सहायता और मानसिक-सामाजिक सहयोग उनके जीवन को आसान बना सकते हैं।विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में इसके वास्तविक मरीजों की संख्या अभी अज्ञात है। विशेषज्ञ मनीष तरूण ने कहा कि चूंकि ये आनुवंशिक विकार हैं, इसलिए इनका स्थायी इलाज उपलब्ध नहीं है। फिलहाल उपचार का उद्देश्य दर्द, थकान, पाचन संबंधी समस्याओं और अन्य लक्षणों को नियंत्रित करना है। फिजियोथेरेपी, जीवनशैली में बदलाव और नियमित चिकित्सकीय निगरानी मरीजों के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में ऐसे मरीजों के लिए न तो पर्याप्त विशेषज्ञ उपलब्ध हैं।  

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