इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा है कि आपराधिक न्याय प्रणाली की स्थिति अत्यंत खराब है और सार्वजनिक हित में सरकार को इसे ध्यान में लेने की आवश्यकता है। कोर्ट ने कहा बिना ठोस कारण केवल इसलिए रिहा नहीं किया गया कि अपराध दुहरायेगा और भाग सकता है। कोर्ट ने कहा निरूद्धि आदेश देने के लिए साक्ष्य व उचित कारण होना जरूरी है। मनमानी कार्रवाई नहीं की जा सकती। जानिये क्या है पूरा मामला गौतमबुद्ध नगर निवासी अमित कुमार सिंह की याचिका की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने कहा, निरुद्ध व्यक्ति के खिलाफ जारी आदेश में कोई संतोषजनक जानकारी नहीं दी गई है, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि अधिकारियों ने विचार-विमर्श किया है।
पीठ ने कहा, ‘प्रतिवादी संख्या तीन और चार, भारत सरकार के वित्त मंत्रालय राजस्व विभाग (पीआईटीएनडीपीएस) के संयुक्त सचिव तथा उप सचिव का आचरण अत्यधिक मनमाना और अवैध है। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 22 का उल्लंघन करते हुए अपने अधिकारों का प्रयोग किया है।
कोर्ट ने की गंभीर टिप्प्णी सार्वजनिक सेवक होने के बावजूद उनका आचरण कानून के प्रति कम सम्मान दर्शाता है और यह उनके कर्तव्यों में लापरवाही को दर्शाता है, जिसे कदाचार माना जा सकता है।’ कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि ऐसी स्थिति लंबे समय से बनी हुई है। याची को मादक पदार्थों और मनोवैज्ञानिक पदार्थों के अवैध ट्रैफिक की रोकथाम अधिनियम (पीआइटीएनडीपीएस) 1988 के तहत निरुद्ध किया गया था।
याची ने अदालत से यह कहते हुए रिहाई की मांग की कि वह 2024 से कासना जेल में न्यायिक हिरासत में है, जबकि निरुद्ध आदेश आठ अगस्त 2025 को पारित किया गया था।
उसे वह दस्तावेज भी नहीं दिए गए, जिसके दम पर उसे निरुद्ध किया गया। बचाव पक्ष का कहना था कि निरुद्ध आदेश केवल इस अनुमान पर आधारित है कि याची भाग जाएगा और मुकदमे में बाधा डालेगा, जबकि निरुद्ध आदेश में इस संबंध में कोई संतोषजनक जानकारी नहीं दी गई थी। अदालत ने निरुद्ध आदेश की समीक्षा करते हुए पाया कि याची को हिरासत में रखने के लिए कोई ‘संतुष्टिजनक ‘ कारण नहीं दर्ज किया गया था। अधिकारियों ने विचार ही नहीं किया।


