हाईकोर्ट ने पुलिस जांच में लापरवाही पर जताई नाराजगी:नौकरशाही की जवाबदेही तय करने को सुपीरियर रिस्पांसिबिलिटी सिद्धांत की सिफारिश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आपराधिक मामलों की जांच में पुलिस अधिकारियों द्वारा की जा रही लापरवाही और अदालती आदेशों की अनदेखी पर नाराजगी जताई है। कोर्ट ने प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के लिए केंद्र सरकार से सुपीरियर रिस्पांसिबिलिटी (वरिष्ठ जवाबदेही) का कानून बनाने की सिफारिश की है, जिसके तहत अधीनस्थों की लापरवाही पर वरिष्ठ अधिकारियों को आपराधिक रूप से जिम्मेदार ठहराया जा सके। ​यह आदेश न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने झाँसी की मेघा रैकवार द्वारा अपनी 15 वर्षीय नाबालिग बेटी की बरामदगी के लिए दाखिल की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। जानिये हाईकोर्ट ने क्या कहा ​कोर्ट ने अपने आदेश की शुरुआत आचार्य कौटिल्य के अर्थशास्त्र से की। कोर्ट ने कहा कि लगभग 2300-2400 साल पहले भी कौटिल्य ने सरकारी विभागों के अधीक्षकों के कार्यों की दैनिक जांच और उनके द्वारा लापरवाही बरतने पर जुर्माने का प्रावधान किया था। कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह प्राचीन ज्ञान मौजूदा लोक प्रशासन के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है। मामले के तथ्यों के अनुसार झाँसी के सीपरी बाजार थानाक्षेत्र से 10 जून 2025 को एक 15 वर्षीय नाबालिग लड़की को बहला-फुसलाकर भगा ले जाया गया था। पुलिस ने एफआईआर तो दर्ज की लेकिन बिना पीड़िता को बरामद किए और बिना असली आरोपियों को घेरे, आरोपी के बयान के आधार पर महज 60 दिन के भीतर कोर्ट में चार्जशीट दाखिल कर दी। जांच अधिकारी का कहना था कि आरोपी के सोते समय लड़की खुद ही ट्रेन में बैठकर कहीं चली गई। ​हाईकोर्ट ने पाया कि पुलिस द्वारा चार्जशीट दाखिल करने में उसके पिछले फैसले सुभाष चंद्र बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया जा रहा है। उस फैसले में कोर्ट ने डीजीपी को निर्देश दिया था कि चार्जशीट के कॉलम-16 में हर आरोपी की भूमिका, फोरेंसिक साक्ष्य और गवाहों के बयानों का स्पष्ट विवरण होना चाहिए और चार्जशीट कोर्ट में दाखिल होने से पहले अभियोजन अधिकारी द्वारा जांची जानी चाहिए। ​जब कोर्ट ने झाँसी सहित 10 जिलों की चार्जशीट मंगवाकर देखी, तो पाया कि कहीं भी इन नियमों का पालन नहीं हो रहा था। अपर मुख्य सचिव गृह पर नाराजगी ​इस मामले में कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के अपर मुख्य सचिव गृह संजय प्रसाद के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि ​फरवरी 2026 में राज्य सरकार ने बताया था कि सुभाष चंद्र फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दाखिल कर रहे हैं इसलिए हाईकोर्ट इस पर आगे सुनवाई न करे लेकिन तीन महीने बीत जाने के बाद भी सुप्रीम कोर्ट के किसी आदेश की कॉपी पेश नहीं की गई। ऐसा प्रतीत होता है कि एसएलपी का बहाना सिर्फ हाईकोर्ट के आदेशों के क्रियान्वयन को टालने के लिए किया गया। कोर्ट ने कहा कि नौकरशाही में असीमित विवेकाधिकार और जवाबदेही की कमी लालफीताशाही और भेदभाव को जन्म देती है। ​हाईकोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए रजिस्ट्रार अनुपालन को निर्देश दिया कि इस आदेश की प्रमाणित प्रति और सुभाष चंद्र केस के आदेश की कॉपी भारत सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के सचिव को भेजी जाए। कोर्ट ने कहा कि आईएएस अधिकारी संजय प्रसाद के इस आचरण को उनके रिकॉर्ड में रखा जाए ताकि कैबिनेट की नियुक्ति समिति भविष्य में उन्हें कोई जिम्मेदारी सौंपते समय इस पर विचार कर सके। ​सुनवाई के दौरान झाँसी पुलिस ने कोर्ट को सूचित किया कि नाबालिग लड़की को सुरक्षित बरामद कर उसके माता-पिता को सौंप दिया गया है। इस पर कोर्ट ने झाँसी के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक और पुलिस टीम के प्रयासों की सराहना की और मुख्य शिकायत का निवारण होने पर याचिका को अंतिम रूप से निस्तारित कर दिया।

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