भोजशाला विवाद मामले में सुनवाई और बहस:एडवोकेट के तर्क; समान मुद्दों पर पहले हो चुका है फैसला; ऐतिहासिक पहलुओं पर होगी अगली बहस

भोजशाला विवाद मामले में सुनवाई और बहस:एडवोकेट के तर्क; समान मुद्दों पर पहले हो चुका है फैसला; ऐतिहासिक पहलुओं पर होगी अगली बहस

चर्चित भोजशाला विवाद मामले में मंगलवार की सुनवाई के दौरान रेस ज्यूडीकेटा और याचिकाओं की मेंटेनबिलिटी के मुद्दों पर विस्तृत बहस हुई। सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट सलमान खुर्शीद वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उपस्थित हुए और तर्क रखे। एडवोकेट नूर अहमद शेख बताया कि मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसायटी की ओर से की ओर से एडवोकेट खुर्शीद ने दलीलें पेश कीं। मेंटेनबिलिटी और रेस ज्यूडीकेटा पर जोर बहस के दौरान जवाब और सिनॉप्सिस के साथ विभिन्न न्यायिक निर्णयों का हवाला दिया गया। एडवोकेट सलमान खुर्शीद ने मुख्य रूप से दो बिंदुओं पर तर्क रखे। याचिका की मेंटेनबिलिटी: यह मुद्दा उठाया गया कि इस प्रकार के विषयों का निर्णय रिट क्षेत्राधिकार में नहीं किया जा सकता। रेस ज्यूडीकेटा का सिद्धांत: दलील दी गई कि समान राहत की मांग वाली कई याचिकाएं पहले ही निर्णयित हो चुकी हैं, जिनमें 7 अप्रैल 2003 के आदेश को चुनौती दी गई थी। बताया गया कि पूर्व में दायर याचिकाओं में से कुछ पर हाई कोर्ट द्वारा निर्णय दिया जा चुका है और उनसे संबंधित रिट अपील पेंडिंग है। ऐसे में समान प्रकृति की याचिकाओं पर पुनः सुनवाई रेस ज्यूडीकेटा के सिद्धांत के तहत बाधित हो सकती है। हालांकि, प्रतिपक्ष ने यह भी तर्क रखा कि इस मामले में रेस ज्यूडीकेटा लागू नहीं होता। आगे की सुनवाई में ऐतिहासिक पहलुओं पर बहस एडवोकेट शेख ने बताया कि अगली सुनवाई में ऐतिहासिक पहलुओं पर विस्तार से तर्क प्रस्तुत किए जाएंगे। साथ ही, अयोध्या से संबंधित निर्णय का भी उल्लेख किया गया है, जिस पर आगे बहस होने की संभावना है। उन्होंने कहा कि अभी कई पक्षकारों की दलीलें शेष हैं, जिनमें भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और शासन की ओर से प्रस्तुतियां शामिल हैं। मामले की सुनवाई जारी है।
इधर, कोर्ट ऑर्डर के अनुसार कमाल मौलाना वेलफेयर सोसायटी की ओर से सलमान खुर्शीद ने कोर्ट को बताया कि उनका वीडियोग्राफी प्रस्तुत करने संबंधी आवेदन ( IA क्रमांक 2318/26 ) विचाराधीन है जिस पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा 1 अप्रैल 2026 को पारित आदेश में यह निर्देश दिए थे कि यदि वीडियोग्राफी में दर्ज तथ्यों के आधार पर कोई आपत्तियां होती हैं, तो हाई कोर्ट उन आपत्तियों को भी अन्य आपत्तियों के साथ प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुसार विचार करेगा। अतः एएसआई द्वारा किए गए सर्वेक्षण की वीडियोग्राफी उन्हें उपलब्ध कराई जाए, ताकि उसे देखकर वे अपनी आपत्तियां प्रस्तुत कर सकें। एएसआई की ओर से सुनील जैन ने आपत्ति लेते हुए कहा कि 98 दिनों के
सर्वे की वीडियोग्राफी उपलब्ध कराने में काफी समय लगेगा। यही नहीं सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार वीडियोग्राफी केवल कोर्ट द्वारा देखने तक ही सीमित है। एएसआई 27 अप्रैल तक उपलब्ध कराएं वीडियोग्राफी ASI के तर्क को अमान्य करते हुए कोर्ट सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को ध्यान में रखते हुए एएसआई को यह निर्देशित किया कि चूंकि भोजशाला मामले की सुनवाई प्रतिदिन चल रही अतः भोजशाला सर्वे की वीडियोग्राफी को एक डिजिटल प्लेटफॉर्म गूगल ड्राइव या क्लाउड सेवा पर 27 अप्रैल तक प्राथमिकता के आधार पर अपलोड कर याचिकाकर्ता को प्रदान की जाए। बुधवार को एडवोकेट फिर इस मुद्दे पर बहस करेंगे।

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