पूर्णिया जेल से रची हैदराबाद में गोल्ड लूट की साजिश:15 मिनट में 15KG सोना लूटने का दिया टारगेट; तेलंगाना पुलिस सुबोध को ले गई

पूर्णिया जेल से रची हैदराबाद में गोल्ड लूट की साजिश:15 मिनट में 15KG सोना लूटने का दिया टारगेट; तेलंगाना पुलिस सुबोध को ले गई

तेलंगाना पुलिस पूर्णिया जेल में बंद गोल्ड लूट गैंग के सरगना सुबोध सिंह को गुरुवार शाम करीब 5 बजे रिमांड पर हैदराबाद ले गई है। दरअसल, मामला हैदराबाद के करीमनगर के पीएमजे ज्वेलर्स में 3 मई को दिनदहाड़े 82.02 लाख रुपए की ज्वेलरी लूटकांड से जुड़ा है। नाम न छापने की शर्त पर पूर्णिया सेंट्रल जेल से जुड़े एक स्टाफ ने इसकी पुष्टि की है। लूटकांड में हैदराबाद पुलिस ने 15 मई को 3 आरोपियों को गिरफ्तार किया था। आरोपियों से पूछताछ के बाद पुलिस ने बताया था कि ज्वेलरी लूटकांड को बिहार के पूर्णिया जेल में बंद सुबोध सिंह के कहने पर अंजाम दिया गया है। करीमनगर के पुलिस कमिश्नर गौश आलम ने बताया था कि लूटकांड की साजिश एक अंतरराज्यीय आपराधिक गिरोह ने रची थी, जिसका नेतृत्व सुबोध सिंह कर रहा था। वो जेल से ही अपने गैंग को ऑपरेट करता है। उन्होंने बताया था कि लूटकांड गिरोह में शामिल सदस्य पुलिस से बचने के लिए एक स्पेशल मोबाइल एप्लिकेशन का इस्तेमाल करते थे। सुबोध सिंह कौन है? गैंग की मदद से अब तक उसने ज्वेलरी लूटकांड की कितनी वारदातों को अंजाम दिया है? उसने कैसे 100 से अधिक अपराधियों की गैंग खड़ी की? पढ़िए पूरी रिपोर्ट। सबसे पहले हैदराबाद में 3 मई को हुई लूटकांड की कहानी जानिए 82 लाख से ज्यादा की ज्वेलरी लूटकांड में गिरफ्तार 3 आरोपियों ने पुलिस से पूछताछ में बताया था कि सुबोध सिंह ने 15 मिनट में 15 किलोग्राम सोना लूटकर भागने का टारगेट दिया था। इसके बाद हम लोगों ने करीमनगर स्थित ज्वेलरी शॉप पर धावा बोला था। हैदराबाद के सीनियर अफसरों ने तब एक मीडिया हाउस को बताया था कि सुबोध सिंह ने साथियों के जरिए लूटकांड में शामिल अपराधियों तक ये टारगेट पहुंचाया था। सुबोध ने चोरी को अंजाम देने वाले पांचों अपराधियों को इनाम के रूप में 5 लाख रुपए देने का वादा किया था। हालांकि, पीएमजे में लूट के दौरान विरोध के बाद अपराधी सिर्फ 1.61 किलोग्राम सोना और हीरा ही लेकर भाग सके। मामले की जांच कर रहे एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि हमने गिरफ्तार किए गए दो अपराधियों रघुनाथ कर्माकर और रविश कुमार से पूछा कि तुम लोगों ने वारदात के दौरान अपने चेहरे को क्यों नहीं छिपाया था, तो उन्होंने जवाब दिया कि मास्क पहनने से सुरक्षाकर्मियों को शक हो जाता, जिससे उनके लिए दुकान में घुसना मुश्किल हो जाता। एक पुलिस अधिकारी ने बताया था कि हमें संदेह है कि सुबोध की टीम, जो चोरी का सोना लेने तेलंगाना आई थी। गिरोह का तरीका ये रहा है कि वे चोरी के सोने को पश्चिम बंगाल या बिहार में जल्दी से पिघला देते हैं और फिर उसे नेपाल में अपने साथियों को भेज देते हैं। अधिकारियों ने बताया कि सुबोध को पुलिस के काम करने के तरीके की अच्छी जानकारी थी, क्योंकि वो साल 2000 से 2008 के बीच पुलिस मुखबिर रहा था। इस दौरान उसने पुलिस के काम करने के तरीके को करीब से देखा, रणनीति सीखी, इसके बाद इसका यूज वारदात को अंजाम देने और पुलिस से बचने में करने लगा। जेल में ही सुबोध से हुई थी एक अपराधी की मुलाकात 15 मई को हैदराबाद पुलिस की ओर से गिरफ्तार आरोपियों की पहचान पश्चिम बंगाल के मल्लिकपाड़ा निवासी रघुनाथ कर्मकार (41), जिसके खिलाफ डकैती, हत्या और आर्म्स एक्ट के उल्लंघन समेत सात आपराधिक मामले लंबित हैं। रवीश कुमार (23), बिहार के गवाल भीगा गांव निवासी, जिसके खिलाफ कथित तौर पर 15 आपराधिक मामले दर्ज हैं; और मेहताब खान (32), पश्चिम बंगाल के पश्चिम बर्धमान निवासी, जिसने कथित तौर पर गिरोह को 10,000 रुपए प्रति सिम कार्ड की दर से सिम कार्ड की आपूर्ति की थी, के रूप में हुई थी। जानकारी के अनुसार, गिरफ्तार किए गए बंगाल के रहने वाले रघुनाथ की पहली मुलाकात सुबोध से कुछ महीने पहले उस वक्त हुई थी, जब वे दोनों पश्चिम बंगाल के आसनसोल जेल में बंद थे। करीमनगर मामले में शामिल पांचों आरोपियों में से कोई भी साजिश रचने के समय सुबोध के सीधे संपर्क में नहीं था। रघुनाथ, रविश और तीन अन्य लोगों के लिए सुबोध के गुर्गे ही मुख्य सूत्रधार थे। लूटकांड की जांच में शामिल पुलिसकर्मियों के मुताबिक, गिरोह के सभी सदस्यों का सुबोध सिंह के गिरोह में शामिल होने से पहले आपराधिक इतिहास था, जिसने कथित तौर पर बिहार, पश्चिम बंगाल, झारखंड, तेलंगाना और महाराष्ट्र में आभूषण की दुकानों और बैंकों को निशाना बनाया था। दो महीने तक करीमनगर के कई इलाकों की अपराधियों ने रेकी की थी पुलिस कमिश्रर ने बताया था कि गिरोह के सदस्यों ने डकैती को अंजाम देने से पहले लगभग दो महीने तक खम्मम, सिद्दिपेट, पेद्दापल्ली और करीमनगर जिलों में रेकी की थी। पकड़े जाने से बचने के लिए उन्होंने फर्जी आधार कार्ड, गाड़ियों की नकली रजिस्ट्रेशन वाली नंबर प्लेट का इस्तेमाल किया। साथ ही पेद्दापल्ली, सिद्दिपेट और धर्मपुरी के निजी लॉजों में रुके। अपराधियों ने वारदात को अंजाम देने से पहले 2 मई को महाराष्ट्र के चंद्रपुर से देसी पिस्तौलें खरीदी थीं। 3 मई को लुटेरों ने पीएमजे ज्वैलर्स शोरूम पर गोलीबारी की, जिसमें चार कर्मचारी घायल हो गए और वे 161.4 तोला सोने के आभूषण, 112 कैरेट हीरे के आभूषण, जिनकी कीमत 82.02 लाख रुपए थी, लेकर फरार हो गए। पुलिस के अनुसार, आरोपियों में से एक पहले ग्राहक बनकर शोरूम में घुसा और स्थिति का जायजा लिया। गिरोह के बाकी सदस्य बाद में अंदर आए और कर्मचारियों को हथियारों से धमकाया और कर्मचारियों के विरोध करने पर कथित तौर पर गोलीबारी की। इसके बाद गिरोह आभूषणों से भरा बैग लेकर मोटरसाइकिलों पर सवार होकर फरार हो गया। पुलिस कमिश्नर ने बताया कि कर्माकर और गिरोह का एक अन्य सदस्य गहनों से भरा बैग लेकर मोटरसाइकिल पर सवार होकर गुंडाला वन क्षेत्र गए, जहां उन्होंने कथित तौर पर बैग और मोटरसाइकिल कार में सवार अपने साथियों को सौंप दी और फिर पास के रेलवे स्टेशन से बिहार भाग गए। पुलिस कमिश्नर ने बताया कि डीजीपी सीवी आनंद और सीनियर पुलिस अधिकारी इस जांच पर कड़ी नजर रख रहे हैं। जांच में करीब 132 पुलिसकर्मी शामिल हैं और गिरोह का पता लगाने के लिए पुलिस टीमों ने 9 राज्यों का दौरा किया। करीमनगर टू टाउन पुलिस स्टेशन में भारतीय न्याय संहिता की धारा 310(2), 311 और 109 तथा भारतीय शस्त्र अधिनियम की धारा 25(1)(ए) और 27 के तहत मामला दर्ज किया गया है। 1999 से 2007 तक पुलिस का मुखबिर रहा था सुबोध बिहार में नालंदा के चांदी थाने के चिस्तीपुर गांव का रहने वाले ईश्वरप्रसाद कुर्मी के 42 साल के बेटे सुबोध सिंह के खिलाफ देश के अलग-अलग राज्यों में लूट, हत्या और डकैती के 42 से ज्यादा मामले दर्ज हैं। सुबोध 12वीं पास है। साल 1996 तक वो बिहार के वैशाली जिले के छोटे-मोटे चोरों के साथ वारदातों को अंजाम देता था। साल 1999 आते-आते बिहार में पुलिस का लोकल मुखबिर बन गया। इस दौरान उसका लगातार बिहार एसटीएफ के जवानों और बड़े अफसरों के पास उठना-बैठना भी हो गया। ये काम उसने साल 2007 तक किया। इस दौरान ही सुबोध ने बिहार एसटीएफ और पुलिस की हर स्टाइल और चाल को भी बड़े अच्छे से समझ लिया। सुबोध ने पुलिस को पूछताछ में बताया हैं कि मुखबिरी करते-करते उसका क्रिमिनल नेटवर्क भी बन गया था। उसने 2008 में पहले कोलकाता की आइओबी बैंक और बाद में रायपुर की एक बैंक में डकैती को अंजाम दिया। इन्हीं मामलों में तब पहले कोलकाता पुलिस और बाद में रायपुर पुलिस ने उसे गिरफ्तार भी किया। साल 2015 तक वो रायपुर जेल में बंद रहा। जमानत पर छूटने के बाद उसने मुथूट, मण्णापुरम और बड़े ज्वेलर्स को टारगेट किया। लूट के लिए अपनी गैंग भी बना ली। हर वारदात के लिए पूरी प्लानिंग बनाता सुबोध सुबोध हर वारदात के लिए पूरी प्लानिंग बनाता। साथियों को उनके रोल बांटता था। हर लूट में ये गैंग 15-20 किलो से ज्यादा गोल्ड को लूट लेती थी। साल 2018 आते-आते उसने राजस्थान के जयपुर, महाराष्ट्र के पुणे और नागपुर शहर व पंचिम बंगाल के बैरकपुर में बड़ी गोल्ड लूट की घटनाओं को अंजाम दिया। बिहार के भी कई शहरों में वारदातें की। जनवरी 2018 में बिहार एसटीएफ ने सुबोध को बिहार में वैशाली जिले के दानापुर से उस वक्त गिरफ्तार किया था, जब वो प्रेमिका से मिलने आया था। हालांकि, सुबोध ने पुलिस पूछताछ में कहा कि उसे तो सड़क से पकड़ा गया था। उसकी कोई प्रेमिका नहीं थी। उसके पास से तब 16.5 किलो गोल्ड के साथ ही पिस्टल व देसी कट्टा बरामद किया था। उसे पटना की बेऊर जेल में भेज दिया गया। वो लंबे समय तक बेऊर जेल में ही बंद रहा। वहां से ही अपनी गैंग के मार्फत एक के बाद एक गोल्ड लूट की वारदातों को अंजाम देता रहा। जेल में रहकर बढ़ाता रहा गैंग सुबोध सिंह ने जेल में ही नए लोगों को अपनी गैंग से जोड़ना शुरू कर दिया। जैसे ही जेल में चैन स्नैचिंग या चोरी के मामले में कोई अपराधी पकड़ा जाता, सुबोध सिंह और उसके गुर्गे बड़े-बड़े लालच देकर गैंग में जोड़ लेते। बदमाश के तैयार होने के बाद सुबोध उसकी जेल से जमानत करवाता। जब वह जेल से बाहर निकल जाता तो जेल के बाहर के गैंग से जुड़े बदमाश उसे ट्रेनिंग देते और बताते हैं कि कैसे व कहां से गोल्ड लूटना है। सुबोध की गैंग लूटे हुए सोने को नेपाल और पश्चिम बंगाल ले जाती है। यहां गलाने के बाद गोल्ड बेच दिया जाता है। सुबोध का दावा है कि देश में अब तक जितनी भी गोल्ड की लूट हुई है। उसका 70% सोना उसी की गैंग ने लूटा है। सुबोध सिंह जेल में रहते हुए भी अलग–अलग राज्यों में वारदातें करा रहा था। सुबोध सिंह पटना के बेऊर जेल में सेक्टर 3 की बैरक 21 और 22 में ही रहा। वहां उसे बड़े आराम से वीआईपी ट्रीटमेंट और लग्जरी सुविधाएं दी जाती थी। इस दोनों बैरक में सुबोध सिंह के गैंग के लोग और उसके जानने वाले लोग ही रहते थे। उसे ओडिशा में हुई एक गोल्ड लूट के मामले में पहली बार ओडिशा पुलिस ने मार्च 2025 में पूछताछ के लिए पकड़ा और अब राजस्थान की कांकरोली पुलिस ओडिशा से पकड़कर राजस्थान लेकर पहुंची थी। सुबोध के गैंग में 132 अपराधी, ज्यादातर की उम्र 22-35 साल 2018 में बिहार STF और पटना पुलिस ने जॉइंट ऑपरेशन के तहत सुबोध सिंह को पटना से गिरफ्तार किया था। वह पहले बेऊर जेल में बंद था। इसके बाद पश्चिम बंगाल की पुलिस अपने राज्य में हुए करोड़ों रुपए के सोना लूट मामले में रिमांड पर ले गई। फिर उसे ओडिशा के संबलपुर जेल ले जाया गया था। सूत्र बताते हैं कि सुबोध के गैंग में करीब 132 बदमाश हैं। ज्यादातर की उम्र 22-35 साल है। गैंग में समस्तीपुर और वैशाली के लड़के सबसे अधिक हैं। इसके अलावा गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु, राजस्थान, महाराष्ट्र, यूपी, दिल्ली, पश्चिम बंगाल, झारखंड सहित 12 से अधिक राज्यों में इसके गैंग का नेटवर्क फैला है। अपने गुर्गों के बूते जेल में बैठकर सुबोध सोना लूटने के लिए बड़े ज्वेलरी शॉप, गोल्ड लोन देने वाली कंपनियों और बैंकों को टारगेट करता है। सुबोध सिंह लूट का करोड़ों रुपए का सोना कहां खपाता है? सूत्रों के मुताबिक, यह सोना 50% कीमत पर बिहार, झारखंड और नेपाल में बेचा जाता है। सुबोध का तगड़ा कनेक्शन लूट का सोना खरीदने वालों से है। सोना तय ठिकाने पर पहुंचाना सुबोध गैंग के अपराधियों के जिम्मा होता है। लूट का सोना नेपाल पहुंचाने के लिए नेपाल बॉर्डर पर उन जगहों को चुना जाता है, जहां सिक्योरिटी कम होती है या न के बराबर रहती है। सोना लूटने से पहले सुबोध सिंह कैश लूटता था। इसने करीब 2014 में क्राइम की दुनिया में कदम रखा था। शुरुआती दौर में वह नालंदा जिले के रहने वाले कुख्यात अपराधी सुनील सिंह का असोसिएट हुआ करता था। बाद में उसने खुद का गैंग बनाया। फिर बड़े ज्वेलरी शॉप और गोल्ड लोन देने वाली कंपनियों को टारगेट किया, सोना लूटने लगा। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, 2017 में इसने खुद से आखिरी बार राजस्थान में सोना लूट की बड़ी वारदात को अंजाम दिया था। इसके बाद से अपने गुर्गों से सोना लूटवाता आ रहा है। पुलिस जांच में सामने आया है कि सुबोध ने सोना लूट के बल पर 50 करोड़ से ज्यादा की संपत्ति खड़ी की है। उसने रांची में एक बड़ा मॉल बनवा रखा है। पुलिस उस मॉल को आइडेंटिफाई कर रही है। तेलंगाना पुलिस पूर्णिया जेल में बंद गोल्ड लूट गैंग के सरगना सुबोध सिंह को गुरुवार शाम करीब 5 बजे रिमांड पर हैदराबाद ले गई है। दरअसल, मामला हैदराबाद के करीमनगर के पीएमजे ज्वेलर्स में 3 मई को दिनदहाड़े 82.02 लाख रुपए की ज्वेलरी लूटकांड से जुड़ा है। नाम न छापने की शर्त पर पूर्णिया सेंट्रल जेल से जुड़े एक स्टाफ ने इसकी पुष्टि की है। लूटकांड में हैदराबाद पुलिस ने 15 मई को 3 आरोपियों को गिरफ्तार किया था। आरोपियों से पूछताछ के बाद पुलिस ने बताया था कि ज्वेलरी लूटकांड को बिहार के पूर्णिया जेल में बंद सुबोध सिंह के कहने पर अंजाम दिया गया है। करीमनगर के पुलिस कमिश्नर गौश आलम ने बताया था कि लूटकांड की साजिश एक अंतरराज्यीय आपराधिक गिरोह ने रची थी, जिसका नेतृत्व सुबोध सिंह कर रहा था। वो जेल से ही अपने गैंग को ऑपरेट करता है। उन्होंने बताया था कि लूटकांड गिरोह में शामिल सदस्य पुलिस से बचने के लिए एक स्पेशल मोबाइल एप्लिकेशन का इस्तेमाल करते थे। सुबोध सिंह कौन है? गैंग की मदद से अब तक उसने ज्वेलरी लूटकांड की कितनी वारदातों को अंजाम दिया है? उसने कैसे 100 से अधिक अपराधियों की गैंग खड़ी की? पढ़िए पूरी रिपोर्ट। सबसे पहले हैदराबाद में 3 मई को हुई लूटकांड की कहानी जानिए 82 लाख से ज्यादा की ज्वेलरी लूटकांड में गिरफ्तार 3 आरोपियों ने पुलिस से पूछताछ में बताया था कि सुबोध सिंह ने 15 मिनट में 15 किलोग्राम सोना लूटकर भागने का टारगेट दिया था। इसके बाद हम लोगों ने करीमनगर स्थित ज्वेलरी शॉप पर धावा बोला था। हैदराबाद के सीनियर अफसरों ने तब एक मीडिया हाउस को बताया था कि सुबोध सिंह ने साथियों के जरिए लूटकांड में शामिल अपराधियों तक ये टारगेट पहुंचाया था। सुबोध ने चोरी को अंजाम देने वाले पांचों अपराधियों को इनाम के रूप में 5 लाख रुपए देने का वादा किया था। हालांकि, पीएमजे में लूट के दौरान विरोध के बाद अपराधी सिर्फ 1.61 किलोग्राम सोना और हीरा ही लेकर भाग सके। मामले की जांच कर रहे एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि हमने गिरफ्तार किए गए दो अपराधियों रघुनाथ कर्माकर और रविश कुमार से पूछा कि तुम लोगों ने वारदात के दौरान अपने चेहरे को क्यों नहीं छिपाया था, तो उन्होंने जवाब दिया कि मास्क पहनने से सुरक्षाकर्मियों को शक हो जाता, जिससे उनके लिए दुकान में घुसना मुश्किल हो जाता। एक पुलिस अधिकारी ने बताया था कि हमें संदेह है कि सुबोध की टीम, जो चोरी का सोना लेने तेलंगाना आई थी। गिरोह का तरीका ये रहा है कि वे चोरी के सोने को पश्चिम बंगाल या बिहार में जल्दी से पिघला देते हैं और फिर उसे नेपाल में अपने साथियों को भेज देते हैं। अधिकारियों ने बताया कि सुबोध को पुलिस के काम करने के तरीके की अच्छी जानकारी थी, क्योंकि वो साल 2000 से 2008 के बीच पुलिस मुखबिर रहा था। इस दौरान उसने पुलिस के काम करने के तरीके को करीब से देखा, रणनीति सीखी, इसके बाद इसका यूज वारदात को अंजाम देने और पुलिस से बचने में करने लगा। जेल में ही सुबोध से हुई थी एक अपराधी की मुलाकात 15 मई को हैदराबाद पुलिस की ओर से गिरफ्तार आरोपियों की पहचान पश्चिम बंगाल के मल्लिकपाड़ा निवासी रघुनाथ कर्मकार (41), जिसके खिलाफ डकैती, हत्या और आर्म्स एक्ट के उल्लंघन समेत सात आपराधिक मामले लंबित हैं। रवीश कुमार (23), बिहार के गवाल भीगा गांव निवासी, जिसके खिलाफ कथित तौर पर 15 आपराधिक मामले दर्ज हैं; और मेहताब खान (32), पश्चिम बंगाल के पश्चिम बर्धमान निवासी, जिसने कथित तौर पर गिरोह को 10,000 रुपए प्रति सिम कार्ड की दर से सिम कार्ड की आपूर्ति की थी, के रूप में हुई थी। जानकारी के अनुसार, गिरफ्तार किए गए बंगाल के रहने वाले रघुनाथ की पहली मुलाकात सुबोध से कुछ महीने पहले उस वक्त हुई थी, जब वे दोनों पश्चिम बंगाल के आसनसोल जेल में बंद थे। करीमनगर मामले में शामिल पांचों आरोपियों में से कोई भी साजिश रचने के समय सुबोध के सीधे संपर्क में नहीं था। रघुनाथ, रविश और तीन अन्य लोगों के लिए सुबोध के गुर्गे ही मुख्य सूत्रधार थे। लूटकांड की जांच में शामिल पुलिसकर्मियों के मुताबिक, गिरोह के सभी सदस्यों का सुबोध सिंह के गिरोह में शामिल होने से पहले आपराधिक इतिहास था, जिसने कथित तौर पर बिहार, पश्चिम बंगाल, झारखंड, तेलंगाना और महाराष्ट्र में आभूषण की दुकानों और बैंकों को निशाना बनाया था। दो महीने तक करीमनगर के कई इलाकों की अपराधियों ने रेकी की थी पुलिस कमिश्रर ने बताया था कि गिरोह के सदस्यों ने डकैती को अंजाम देने से पहले लगभग दो महीने तक खम्मम, सिद्दिपेट, पेद्दापल्ली और करीमनगर जिलों में रेकी की थी। पकड़े जाने से बचने के लिए उन्होंने फर्जी आधार कार्ड, गाड़ियों की नकली रजिस्ट्रेशन वाली नंबर प्लेट का इस्तेमाल किया। साथ ही पेद्दापल्ली, सिद्दिपेट और धर्मपुरी के निजी लॉजों में रुके। अपराधियों ने वारदात को अंजाम देने से पहले 2 मई को महाराष्ट्र के चंद्रपुर से देसी पिस्तौलें खरीदी थीं। 3 मई को लुटेरों ने पीएमजे ज्वैलर्स शोरूम पर गोलीबारी की, जिसमें चार कर्मचारी घायल हो गए और वे 161.4 तोला सोने के आभूषण, 112 कैरेट हीरे के आभूषण, जिनकी कीमत 82.02 लाख रुपए थी, लेकर फरार हो गए। पुलिस के अनुसार, आरोपियों में से एक पहले ग्राहक बनकर शोरूम में घुसा और स्थिति का जायजा लिया। गिरोह के बाकी सदस्य बाद में अंदर आए और कर्मचारियों को हथियारों से धमकाया और कर्मचारियों के विरोध करने पर कथित तौर पर गोलीबारी की। इसके बाद गिरोह आभूषणों से भरा बैग लेकर मोटरसाइकिलों पर सवार होकर फरार हो गया। पुलिस कमिश्नर ने बताया कि कर्माकर और गिरोह का एक अन्य सदस्य गहनों से भरा बैग लेकर मोटरसाइकिल पर सवार होकर गुंडाला वन क्षेत्र गए, जहां उन्होंने कथित तौर पर बैग और मोटरसाइकिल कार में सवार अपने साथियों को सौंप दी और फिर पास के रेलवे स्टेशन से बिहार भाग गए। पुलिस कमिश्नर ने बताया कि डीजीपी सीवी आनंद और सीनियर पुलिस अधिकारी इस जांच पर कड़ी नजर रख रहे हैं। जांच में करीब 132 पुलिसकर्मी शामिल हैं और गिरोह का पता लगाने के लिए पुलिस टीमों ने 9 राज्यों का दौरा किया। करीमनगर टू टाउन पुलिस स्टेशन में भारतीय न्याय संहिता की धारा 310(2), 311 और 109 तथा भारतीय शस्त्र अधिनियम की धारा 25(1)(ए) और 27 के तहत मामला दर्ज किया गया है। 1999 से 2007 तक पुलिस का मुखबिर रहा था सुबोध बिहार में नालंदा के चांदी थाने के चिस्तीपुर गांव का रहने वाले ईश्वरप्रसाद कुर्मी के 42 साल के बेटे सुबोध सिंह के खिलाफ देश के अलग-अलग राज्यों में लूट, हत्या और डकैती के 42 से ज्यादा मामले दर्ज हैं। सुबोध 12वीं पास है। साल 1996 तक वो बिहार के वैशाली जिले के छोटे-मोटे चोरों के साथ वारदातों को अंजाम देता था। साल 1999 आते-आते बिहार में पुलिस का लोकल मुखबिर बन गया। इस दौरान उसका लगातार बिहार एसटीएफ के जवानों और बड़े अफसरों के पास उठना-बैठना भी हो गया। ये काम उसने साल 2007 तक किया। इस दौरान ही सुबोध ने बिहार एसटीएफ और पुलिस की हर स्टाइल और चाल को भी बड़े अच्छे से समझ लिया। सुबोध ने पुलिस को पूछताछ में बताया हैं कि मुखबिरी करते-करते उसका क्रिमिनल नेटवर्क भी बन गया था। उसने 2008 में पहले कोलकाता की आइओबी बैंक और बाद में रायपुर की एक बैंक में डकैती को अंजाम दिया। इन्हीं मामलों में तब पहले कोलकाता पुलिस और बाद में रायपुर पुलिस ने उसे गिरफ्तार भी किया। साल 2015 तक वो रायपुर जेल में बंद रहा। जमानत पर छूटने के बाद उसने मुथूट, मण्णापुरम और बड़े ज्वेलर्स को टारगेट किया। लूट के लिए अपनी गैंग भी बना ली। हर वारदात के लिए पूरी प्लानिंग बनाता सुबोध सुबोध हर वारदात के लिए पूरी प्लानिंग बनाता। साथियों को उनके रोल बांटता था। हर लूट में ये गैंग 15-20 किलो से ज्यादा गोल्ड को लूट लेती थी। साल 2018 आते-आते उसने राजस्थान के जयपुर, महाराष्ट्र के पुणे और नागपुर शहर व पंचिम बंगाल के बैरकपुर में बड़ी गोल्ड लूट की घटनाओं को अंजाम दिया। बिहार के भी कई शहरों में वारदातें की। जनवरी 2018 में बिहार एसटीएफ ने सुबोध को बिहार में वैशाली जिले के दानापुर से उस वक्त गिरफ्तार किया था, जब वो प्रेमिका से मिलने आया था। हालांकि, सुबोध ने पुलिस पूछताछ में कहा कि उसे तो सड़क से पकड़ा गया था। उसकी कोई प्रेमिका नहीं थी। उसके पास से तब 16.5 किलो गोल्ड के साथ ही पिस्टल व देसी कट्टा बरामद किया था। उसे पटना की बेऊर जेल में भेज दिया गया। वो लंबे समय तक बेऊर जेल में ही बंद रहा। वहां से ही अपनी गैंग के मार्फत एक के बाद एक गोल्ड लूट की वारदातों को अंजाम देता रहा। जेल में रहकर बढ़ाता रहा गैंग सुबोध सिंह ने जेल में ही नए लोगों को अपनी गैंग से जोड़ना शुरू कर दिया। जैसे ही जेल में चैन स्नैचिंग या चोरी के मामले में कोई अपराधी पकड़ा जाता, सुबोध सिंह और उसके गुर्गे बड़े-बड़े लालच देकर गैंग में जोड़ लेते। बदमाश के तैयार होने के बाद सुबोध उसकी जेल से जमानत करवाता। जब वह जेल से बाहर निकल जाता तो जेल के बाहर के गैंग से जुड़े बदमाश उसे ट्रेनिंग देते और बताते हैं कि कैसे व कहां से गोल्ड लूटना है। सुबोध की गैंग लूटे हुए सोने को नेपाल और पश्चिम बंगाल ले जाती है। यहां गलाने के बाद गोल्ड बेच दिया जाता है। सुबोध का दावा है कि देश में अब तक जितनी भी गोल्ड की लूट हुई है। उसका 70% सोना उसी की गैंग ने लूटा है। सुबोध सिंह जेल में रहते हुए भी अलग–अलग राज्यों में वारदातें करा रहा था। सुबोध सिंह पटना के बेऊर जेल में सेक्टर 3 की बैरक 21 और 22 में ही रहा। वहां उसे बड़े आराम से वीआईपी ट्रीटमेंट और लग्जरी सुविधाएं दी जाती थी। इस दोनों बैरक में सुबोध सिंह के गैंग के लोग और उसके जानने वाले लोग ही रहते थे। उसे ओडिशा में हुई एक गोल्ड लूट के मामले में पहली बार ओडिशा पुलिस ने मार्च 2025 में पूछताछ के लिए पकड़ा और अब राजस्थान की कांकरोली पुलिस ओडिशा से पकड़कर राजस्थान लेकर पहुंची थी। सुबोध के गैंग में 132 अपराधी, ज्यादातर की उम्र 22-35 साल 2018 में बिहार STF और पटना पुलिस ने जॉइंट ऑपरेशन के तहत सुबोध सिंह को पटना से गिरफ्तार किया था। वह पहले बेऊर जेल में बंद था। इसके बाद पश्चिम बंगाल की पुलिस अपने राज्य में हुए करोड़ों रुपए के सोना लूट मामले में रिमांड पर ले गई। फिर उसे ओडिशा के संबलपुर जेल ले जाया गया था। सूत्र बताते हैं कि सुबोध के गैंग में करीब 132 बदमाश हैं। ज्यादातर की उम्र 22-35 साल है। गैंग में समस्तीपुर और वैशाली के लड़के सबसे अधिक हैं। इसके अलावा गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु, राजस्थान, महाराष्ट्र, यूपी, दिल्ली, पश्चिम बंगाल, झारखंड सहित 12 से अधिक राज्यों में इसके गैंग का नेटवर्क फैला है। अपने गुर्गों के बूते जेल में बैठकर सुबोध सोना लूटने के लिए बड़े ज्वेलरी शॉप, गोल्ड लोन देने वाली कंपनियों और बैंकों को टारगेट करता है। सुबोध सिंह लूट का करोड़ों रुपए का सोना कहां खपाता है? सूत्रों के मुताबिक, यह सोना 50% कीमत पर बिहार, झारखंड और नेपाल में बेचा जाता है। सुबोध का तगड़ा कनेक्शन लूट का सोना खरीदने वालों से है। सोना तय ठिकाने पर पहुंचाना सुबोध गैंग के अपराधियों के जिम्मा होता है। लूट का सोना नेपाल पहुंचाने के लिए नेपाल बॉर्डर पर उन जगहों को चुना जाता है, जहां सिक्योरिटी कम होती है या न के बराबर रहती है। सोना लूटने से पहले सुबोध सिंह कैश लूटता था। इसने करीब 2014 में क्राइम की दुनिया में कदम रखा था। शुरुआती दौर में वह नालंदा जिले के रहने वाले कुख्यात अपराधी सुनील सिंह का असोसिएट हुआ करता था। बाद में उसने खुद का गैंग बनाया। फिर बड़े ज्वेलरी शॉप और गोल्ड लोन देने वाली कंपनियों को टारगेट किया, सोना लूटने लगा। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, 2017 में इसने खुद से आखिरी बार राजस्थान में सोना लूट की बड़ी वारदात को अंजाम दिया था। इसके बाद से अपने गुर्गों से सोना लूटवाता आ रहा है। पुलिस जांच में सामने आया है कि सुबोध ने सोना लूट के बल पर 50 करोड़ से ज्यादा की संपत्ति खड़ी की है। उसने रांची में एक बड़ा मॉल बनवा रखा है। पुलिस उस मॉल को आइडेंटिफाई कर रही है।  

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