गुरुवार को विकास नगर की उस सुबह में सिर्फ धुआं नहीं था, बल्कि सैकड़ों टूटे सपनों की गंध भी घुली थी। जहां कभी झोपड़ियों में जिंदगी बसती थी, वहां अब सिर्फ राख, जले हुए बर्तन और बिखरी हुई यादें पड़ी हैं।
हर तरफ रोते-बिलखते लोग… हर आंख में एक ही सवाल-अब आगे क्या? राख में उम्मीद तलाशती काजल काजल अपनी मां के साथ लकड़ी से राख को धीरे-धीरे हटाकर कुछ ढूंढ रही थी—शायद कोई गहना, शायद कोई बची हुई याद। काजल की मां की आंखों में आंसू थे, लेकिन हाथ रुक नहीं रहे थे। “सालों से लोगों के घरों में बर्तन मांजकर, जूठा साफ करके एक-एक चीज जोड़ी थी… सब जलकर खत्म हो गया…” उनकी आवाज में सिर्फ दर्द नहीं, टूट चुकी मेहनत की थकान भी साफ झलक रही थी। “पांच बकरी, दस मुर्गी… सब जल गए” – पूसू की टूटी आजीविका पूसू के लिए यह सिर्फ आग नहीं थी, यह उसकी पूरी जिंदगी का अंत था। “हमारी पांच बकरी और 10 मुर्गी जलकर खाक हो गए… घर का सारा सामान भी चला गया…” उसके चेहरे पर खालीपन था-जैसे अब कुछ बचा ही नहीं जिसके लिए वो खड़ा हो सके। 10 साल की मेहनत एक रात में खत्म -राहुल की कहानी राहुल पिछले 10 सालों से यहीं मजदूरी कर अपना घर चला रहा था। आज वही राहुल राख के ढेर के सामने खड़ा था -बिना शब्दों के।“किसी तरह घर चल रहा था… अब तो कुछ भी नहीं बचा… कहीं के नहीं रहे…” उसकी आवाज धीमी थी, लेकिन दर्द गहरा। “बच्चे का गुल्लक भी जल गया…” -छिब्बन की 20 साल की दुनिया उजड़ी छबील 20 साल से विकास नगर में झोपड़ी डालकर रह रहा था। आज उसकी पूरी दुनिया राख में बदल चुकी थी।“जेवर, पैसे सब जल गए… बच्चे का गुल्लक भी नहीं बचा…” उसकी आंखों में सिर्फ नुकसान नहीं, बल्कि बीते सालों की यादों का अंत था। “नाम तक नहीं लिखा गया…” – नासिर अली की शिकायत नासिर अली की पीड़ा सिर्फ आग से नहीं, सिस्टम से भी थी। “पुलिस आई थी, लेकिन हमारा नाम तक नहीं नोट किया गया… एक जगह कई परिवार रहते थे, पर सिर्फ एक का नाम लिखा गया…” उनकी आवाज में नाराजगी थी- और उस अनदेखी का दर्द, जो शायद आग से भी ज्यादा चुभ रहा था।


