आगरा के बल्केश्वर पार्क में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन आस्था और भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिला। कथा व्यास आचार्य इंद्रेश उपाध्याय ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि भक्ति केवल शब्दों में नहीं, बल्कि व्यक्ति के आचरण, व्यवहार और जीवनशैली में दिखाई देनी चाहिए। उन्होंने कहा कि सच्चा सत्संग केवल कथा सुनने तक सीमित नहीं है, बल्कि अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण, अच्छे विचार, श्रेष्ठ संगति और पवित्र जीवन जीने का नाम भी सत्संग है। श्रीकृष्ण जन्मोत्सव प्रसंग के कारण बुधवार को कथा स्थल पर श्रद्धालुओं का अभूतपूर्व जनसैलाब उमड़ पड़ा। शाम चार बजे शुरू होने वाली कथा के लिए दोपहर बाद से ही लोगों का पहुंचना शुरू हो गया और निर्धारित समय से करीब आधा घंटा पहले ही पूरा पंडाल भर गया। पीले वस्त्रों में पहुंचे श्रद्धालुओं और गुब्बारों से सजे पंडाल ने पूरे वातावरण को उत्सवमय बना दिया। कथा की शुरुआत भजन “श्यामा प्यारी, कुंजबिहारी जय-जय श्री हरिदास दुलारी” से हुई। इसके बाद इंद्रेश उपाध्याय ने कहा कि आगरा केवल ऐतिहासिक स्मारकों का शहर नहीं, बल्कि ब्रज संस्कृति और भक्ति परंपरा से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि यहां के लोगों की भाषा, व्यवहार और खानपान में भी ब्रज की झलक दिखाई देती है। चार दिनों के प्रवास में उन्हें यहां के लोगों के मन की मिठास और आत्मीयता का अनुभव हुआ है। उन्होंने कहा कि मनुष्य का व्यक्तित्व उसकी संगति और विचारों से बनता है। अच्छे लोगों का साथ व्यक्ति को ऊंचाइयों तक पहुंचा सकता है, जबकि गलत संगति पतन का कारण बनती है। उन्होंने सत्य, दया, दान और पवित्रता को धर्म का आधार बताते हुए कहा कि आज लोग शरीर की स्वच्छता पर तो ध्यान दे रहे हैं, लेकिन मन की पवित्रता को भूलते जा रहे हैं। जब तक मन निर्मल नहीं होगा, तब तक जीवन में वास्तविक सुख और शांति नहीं मिल सकती। कथा के दौरान इंद्रेश उपाध्याय ने नाम जप की महिमा का भी वर्णन किया। उन्होंने कहा कि केवल माला फेरना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि मन में सरलता, व्यवहार में मधुरता और हृदय में सच्ची श्रद्धा होनी चाहिए। ऐसे व्यक्ति की भक्ति भगवान को प्रिय होती है और उसके जीवन के अनेक बंधन स्वतः समाप्त होने लगते हैं। उन्होंने श्रोताओं को जीवन के नकारात्मक व्यवहारों से बचने की सीख देते हुए कहा कि क्रोध, कटु वचन, असंतोष, माता-पिता का अनादर और गलत कार्यों को देखकर भी चुप रहना व्यक्ति को अधोगति की ओर ले जाता है। वहीं प्रेम, सेवा, विनम्रता और सदाचार मनुष्य को आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर करते हैं। श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के अवसर पर कथा स्थल पर विशेष उत्साह देखने को मिला। बाल स्वरूप में सजे एक नन्हे श्रीकृष्ण को आचार्य इंद्रेश उपाध्याय ने मंच पर गोद में लेकर दुलार किया। इस भावुक दृश्य को देखकर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। इसके बाद नंदोत्सव मनाया गया और “नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की” के जयघोष से पूरा पंडाल गूंज उठा। श्रद्धालुओं ने एक-दूसरे को बधाइयां दीं और भक्ति रस में सराबोर होकर उत्सव का आनंद लिया। कार्यक्रम के दौरान विभिन्न संत-महंतों ने भी कथा में सहभागिता की। प्रेम निधि मंदिर, नाई की मंडी के महंत हरिमोहन गोस्वामी और सुनीत गोस्वामी ने आचार्य इंद्रेश उपाध्याय का सम्मान कर उन्हें स्मृति चिन्ह भेंट किया।


