संपादकीय: कर्जदारों की छवि धूमिल करने के इरादों पर नकेल

कारोबारी जगत में सफलता का सबसे बड़ा मंत्र- ‘ग्राहक ही भगवान’ का है। सीधी सी बात है कि व्यवसाय की सफलता पूरी तरह से ग्राहकों पर ही निर्भर करती है। आमतौर पर भारतीय बैंकिंग प्रणाली में इस ध्येय वाक्य पर निष्ठा से काम तब होता दिखता है जब ग्राहक किसी बैंक या दूसरी वित्तीय संस्था का जमाकर्ता हो। कर्जदार से लोन रिकवरी के लिए बैंक व फाइनेंस कंपनियां जिस तरह के हथकंडे अपनाती रही हैं, उसमें बैंकिंग व्यवस्था का दूसरा ही चेहरा सामने आता है।

रिकवरी एजेंटों के माध्यम से या सीधे बैंक से ही कर्जदारों को धमकाने के अंदाज में कर्ज चुकाने की ताकीद की जाए, उसके नाते-रिश्तेदारों तक फोन खडख़ड़ाकर छवि बिगाडऩे का काम होने लगे तो कर्जदार की मन:स्थिति का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआइ) अब लोन रिकवरी के नाम पर ग्राहकों को मानसिक रूप से प्रताडि़त करने व उन्हें सोशल मीडिया पर बदनाम करने वाले रिकवरी एजेंटों व बैंककर्मियों पर नकेल कसने की तैयारी कर रहा है। यह जरूरत इसलिए भी है क्योंकि कर्जदारों को धमकी, गाली-गलौज और सामाजिक अपमान का शिकार बनाना बैंक और दूसरी फाइनेंस कंपनियों की फितरत सी बन गई है।

इसे वित्तीय अनुशासन का मामला नहीं, बल्कि मानवाधिकारों का उल्लंघन कहा जाएगा। बैंकिंग संस्थाएं जब अपने एजेंटों को खुली छूट देती हैं, तो वे ग्राहकों के साथ ऐसे पेश आते हैं मानो ऋण लेना कोई अपराध हो। सोशल मीडिया शेमिंग और दूर-दूर के रिश्तेदारों तक कर्ज की खबरें पहुंचा दी जाती हैं। हाल ही एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने भी यह तल्ख टिप्पणी की थी कि बड़े उद्योगपतियों को भारी कर्ज देेने में बैंक नरमी बरतते हैं जबकि छोटे ऋण के लिए आम आदमी को परेशान किया जाता है। कुछ मामलों में तो यह उत्पीडऩ की सीमा तक पहुंच जाता है। कोर्ट ने कर्ज देने व उसे वसूलने की प्रक्रियाओं को अधिक आसान व निष्पक्ष बनाने की जरूरत भी बताई थी। आरबीआइ ने नए नियमों का जो ड्राफ्ट तैयार किया है उसके अनुसार ग्राहक, उसके गारंटर या नजदीकी लोगों को शारीरिक या मानसिक रूप से प्रताडि़त करने, गुमनाम नंबरों से धमकी भरे फोन करने व सोशल मीडिया पर उनकी रिकॉर्डिंग या ब्यौरा डालने को गैरकानूनी माना जाएगा और ऐसा करने पर संबंधित बैंक व वित्तीय संस्थानों को जुर्माना भुगतना पड़ेगा। आरबीआइ का यह देर से उठाया गया सही कदम कहा जाएगा।

जरूरत आगामी अक्टूबर से लागू होने वाले नए नियम-कायदों को सख्ती से अमल में लाने की रहेगी। सही मायने में भारतीय बैंकिंग प्रणाली की नींव लाभ और वसूली पर नहीं बल्कि विश्वास और ग्राहकों की गरिमा बनाए रखने पर खड़ी है। नियमों की पालना ठीक से हुई तो बैंकों और फाइनेंस कंपनियों की कार्यसंस्कृति ग्राहक को भगवान मानने वाली स्वत: ही हो जाएगी।

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