इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रदेश में फोरेंसिक लैब की बदहाली पर नाराजगी जताते हुए मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप करने का आग्रह किया है। न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने एटा निवासी दुष्कर्म व हत्या आरोपित मनोज को जमानत देते हुए कहा है कि आदेश की प्रति मुख्य सचिव को भेजी जाए जो इसे मुख्यमंत्री के संज्ञान में लाएंगे।
कोर्ट ने कहा कि वैज्ञानिक सबूत के अभाव में आरोपित को जेल में रखना उचित नहीं है। कहा, दुष्कर्म हत्या जैसे जघन्य अपराध में भी वैज्ञानिक सबूत न मिलने के कारण आरोपित को भारी मन से जमानत देनी पड़ रही है। जानिये क्या है मामला मुकदमे से जुड़े तथ्य यह हैं कि मामला थाना सकेत में दर्ज है। गोबर फेंकने गई महिला की लाश 18 नवंबर 2025 को नदी किनारे लाश मिली थी। अज्ञात के खिलाफ अगले दिन यानी 19 नवंबर 2025 को एफआइआर दर्ज हुई। बाद में चश्मदीद सतेंद्र के बयान पर मनोज को आरोपित बनाया गया। पुलिस ने मृतका की घड़ी बरामद होने का दावा किया।
जमानत अर्जी पर दोनों पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने कहा कि सतेंद्र ने आरोपित को नदी की तरफ जाते-आते देखा था, लेकिन एफआइआर में नाम नहीं था। बाद में दिए बयान से अभियोजन कहानी संदिग्ध लगती है। सिर्फ घड़ी की बरामदगी दुष्कर्म व हत्या में संलिप्तता साबित करने के लिए काफी नहीं है। सबसे अहम बात 14मई 2026 की एफएसएल रिपोर्ट रही।
इसके मुताबिक आरोपित का डीएनए मृतका के वजाइनल स्वैब से मैच नहीं करता, क्योंकि प्रोफाइल ही पूरा नहीं बना था। कोर्ट ने इसे जांच की सबसे बड़ी खामी बताया। कोर्ट ने मेवालाल प्रजापति केस का हवाला देते हुए कहा कि उप्र एफएसएल निदेशक ने बताया है कि ज्यादातर लैब में स्टाफ की कमी है। साथ ही हाई-एंड मशीन नहीं हैं। डीएनए प्रोफाइल नहीं बन पा रहे हैं। कोर्ट ने कहा पुरानी मशीन और अधूरी व्यवस्था के लिए सिर्फ राज्य सरकार जिम्मेदार है।


