बाहुबली आनंद मोहन जदयू से खफा चल रहे हैं। उनकी पत्नी लवली आनंद जदयू से सांसद और बेटे चेतन आनंद इसी पार्टी से विधायक हैं। आनंद मोहन ने कहा है कि नीतीश कुमार को जिंदा दफन कर दिया गया है। कहीं पर भी नीतीश कुमार का चेहरा नहीं है। जदयू अब थैली वाली पार्टी हो गई है। जिसने थैली पहुंचाई वो मंत्री बना। आनंद मोहन ने कहा कि नीतीश कुमार की मजबूरी का फायदा उठाया जा रहा है। आज कौन लोग हैं चेतन आनंद को नवीनगर भेजते हैं, शफूर्दीन का गला काटते हैं? उन्होंने कहा कि, शपथ ग्रहण में नीतीश कुमार मौजूद थे। 85 एमएलए के साथ वे खड़े थे। लेकिन उनकी फोटो नहीं थी। आज जो सरकारी बोर्ड लगाया जा रहे हैं उसमें से डिप्टी सीएम का भी नाम गायब हो गया है। आनंद मोहन ने ये बातें सीतामढ़ी में कहीं। वो डुमरा रोड स्थित एक होटल के सभागार में आयोजित महाराणा प्रताप प्रतिमा स्थापना समारोह की तैयारी बैठक में शामिल होने पहुंचे थे। चेतन आनंद को मंत्री नहीं बनाए जाने पर आनंद मोहन ने कहा कि, कुछ लोग नैरिटिव सेट कर रहे हैं कि आनंद मोहन बेटे को पद दिलाने के लिए बौखला गया है। इन लोगों ने जेडीयू का बोरिया-बिस्तर नहीं समेटा है। पूरे एनडीए को डूबा रहे हैं। आज चुनाव हो जाए। आरा-बक्सर के एमएलसी चुनाव में थैली को करारा जवाब मिला है। दूसरा चुनाव फिर होने वाला है। लोग कहते हैं टाइगर अभी जिंदा है। सिंह इज किंग। देखते रहिए आप। पैसे का खेल हो रहा है। आनंद मोहन ने कहा कि नैरेटिव सेट किया जा रहा है कि आनंद मोहन बेटे के लिए बौखला गया है। नीतीश कुमार की मजबूरी का फायदा लेकर थैली की राजनीति धड़ल्ले से की जा रही है। उन्होंने कहा कि जो थैली पहुंचाया वह मंत्री बन गया। जब नीतीश कुमार सचेत थे तब इसी सीतामढ़ी का टिकट वापस करना पड़ा था। अब जानिए कौन हैं बाहुबली आनंद मोहन 26 जनवरी 1956, सहरसा के पनगछिया गांव में आनंद मोहन का जन्म एक राजपूत परिवार में हुआ। उनके दादा रामबहादुर सिंह स्वतंत्रता सेनानी रहे थे। इस कारण बचपन से ही घर में राजनीति, समाज शास्त्र और समाज सुधार के मुद्दों पर बात होती रहती थी। कम उम्र से ही वो सत्ता को चुनौती भी देने लगे थे। इसी दौरान सरकारें लगातार पिछड़ी जातियों को आगे बढ़ाने की बात कर रही थीं। आनंद मोहन इससे बहुत नाखुश थे। साल 1974, जेपी ने सरकार के खिलाफ आवाज उठानी शुरू कर दी थी। ‘सिंहासन खाली करो, जनता आती है…’ के नारे लगाते हुए जेपी के पीछे देशभर के युवा सड़कों पर उतर आए। इन्हीं युवाओं में शामिल थे 18 साल के आनंद मोहन सिंह। जेपी की ‘संपूर्ण क्रांति’ को उन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया और कॉलेज की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी। यही उनके राजनीतिक करियर की शुरुआत थी। इमरजेंसी के दौरान वो 2 साल जेल में भी रहे और बाहर आकर समाजवादी नेता और फ्रीडम फाइटर परमेश्वर कुमार को अपना राजनीतिक गुरु बना लिया। आरक्षण के विरोध से बने अगड़ी जाति के हीरो 1978 में कर्पूरी ठाकुर ने पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण का भी ऐलान कर दिया था। इससे नाराज आनंद मोहन ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई को काले झंडे दिखाए। दूसरी ओर कई कम्युनिस्ट संगठन ऊंची जातियों के जमींदारों और किसानों को निशाना बना रहे थे। ऐसे में आनंद मोहन ने ऊंची जातियों की सुरक्षा का जिम्मा ले लिया। राजेश सिंह की किताब बाहुबलीज ऑफ इंडियन पॉलिटिक्स के अनुसार आनंद मोहन ने समाजवादी क्रांतिकारी सेना बनाई और अगड़ी जाति के युवाओं को उसमें शामिल होने के लिए बुलाने लगे। इस सेना को आनंद मोहन की प्राइवेट आर्मी भी कहा जाने लगा। आनंद मोहन युवाओं से कहते, ‘आरक्षण की वजह से हमारे समाज में वैसी ही फूट पड़ रही है जैसे ब्रिटिश सरकार ने हिंदू और मुसलमानों के बीच डाली और देश पर कब्जा किया, इसलिए हमें आरक्षण के खिलाफ लड़ाई करनी होगी।’ ये सेना ऊंची जाति के खिलाफ बोलने वालों के साथ मारपीट करती और अपने स्तर पर ही न्याय करने लगी। आरक्षण की मांग करने वाले लोगों के घरों में सेना के लोग घुस जाते और मारपीट करते। ब्राह्मण लड़की का रेप करने वाले का सिर काटकर पूरे गांव में घुमवाया वरिष्ठ पत्रकार कन्हैया भैलारी बताते हैं, ‘उन दिनों मधेपुरा में एक सरकारी टीचर थे। उनकी बेटी के साथ कुछ गुंडों ने रेप किया और उसे चाकू मारकर फेंक दिया। लड़की ब्राह्मण परिवार से थी, इसलिए आनंद सिंह उसके फेवर में आ गए।’ आनंद मोहन ने अपनी सेना के लोगों से कहा, ‘ये काम जिसका भी है, उसकी गर्दन कंधे से अलग करनी जरूरी है। हर हाल में इनका पता लगाओ।’ समाजवादी क्रांतिकारी सेना ने पूरे गांव में पूछताछ शुरू कर दी। जैसे ही आरोपियों का पता चला, आनंद मोहन खुद करीब 50 लोगों के साथ वहां पहुंच गए। पहले तो आरोपियों को दबोचकर जमकर पीटा गया और आखिर में उनकी गर्दन धड़ से अलग कर दी गई। वो यहीं नहीं रुके। उनके कटे सिर तलवार की नोक पर पूरे गांव में घुमाए गए। स्थानीय लोगों के अनुसार, आनंद मोहन तलवार लहराते हुए चीख रहे थे- ‘अगड़ी जाति को परेशान करने वालों का अंजाम सबको पता चलना चाहिए।’ पहली बार आनंद मोहन का नाम आपराधिक मुकदमे में दर्ज हुआ। इसके बाद उनके खिलाफ कई और मुकदमे भी दर्ज हुए। अब पुलिस आनंद मोहन की तलाश में लग गई। ऐसे में, 1983 में वो आत्म-समर्पण के लिए सहरसा की अदालत में पहुंचे। वहां अगड़ी जाति के सैकड़ों लोग पहले से उनके समर्थन में इकट्ठा थे। वो समझ गए कि वो हीरो बन चुके हैं। 3 महीने बाद ही वो जेल से रिहा भी हो गए। पुलिस ने 25 हजार का इनाम रखा, सरेंडर कर जेल से विधायक बने आरक्षण का विरोध करने की वजह से आनंद मोहन सिंह राज्य सरकार के निशाने पर थे। उनके खिलाफ NSA यानी नेशनल सिक्योरिटी एक्ट, CCA यानी क्राइम कंट्रोल एक्ट और MISA यानी मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट में मामले दर्ज किए गए। लेकिन पुलिस के लिए उन तक पहुंचना मुश्किल था। उन्हें पकड़ने के लिए 1 हजार रुपए से लेकर 25 हजार रुपए तक के इनाम का भी ऐलान किया गया। 1990 में विधानसभा चुनाव होने थे। आनंद मोहन समझ गए थे कि आरक्षण के खिलाफ लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए विधानसभा पहुंचना होगा। ऐसे में उन्होंने चुनाव से पहले सरेंडर कर दिया और जेल में रहकर जनता दल के टिकट पर महिषी से चुनाव लड़ा। अगड़ों का समर्थन तो था ही, बाहुबल के दम पर इलाके के पिछड़ों के वोट भी आनंद मोहन को मिले। इस चुनाव में आनंद मोहन ने कांग्रेस के कैंडिडेट को 62 हजार वोटों से हराया। लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री बने। BBC की एक रिपोर्ट के मुताबिक, विधायक बनने के बाद आनंद मोहन घोड़े की सवारी करते, तो कभी बंदूकों के साथ तस्वीरें अखबारों में छपने लगीं। उन्हें पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का भी करीबी माना जाने लगा जो उनकी ही जाति के थे। मंडल कमीशन लागू हुआ तो जनता दल से नाता तोड़ा अगस्त 1990 में तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करने का आदेश दे दिया। इसके तहत केंद्र सरकार की नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में OBC कैटेगरी के लिए 27% आरक्षण लागू हो गया। इस ऐलान के साथ ही देश में भारी बवाल शुरू हो गया। चारों ओर, ‘वीपी सिंह, हाय-हाय’ ‘मंडल कमीशन, हाय-हाय’, ‘मंडल कमीशन वापस लो’ के नारे सुनाई देने लगे। कई जगह हिंसक प्रदर्शन हुए। कहीं आगजनी हुई तो कहीं पुलिस ने लाठीचार्ज किया। सीधे तौर पर बिहार दो धड़ों में बंट गया। एक ओर लालू थे जो पिछड़ों के हक और उन्हें आगे बढ़ाने की बात करते थे और दूसरी ओर आनंद मोहन थे जो इसके विरोध में थे। आनंद मोहन ने खुद को जनता दल से अलग कर लिया। इसी के साथ ऊंची जाति के लोग आनंद मोहन को अपना मसीहा मानने लगे। पिछड़ों के नेता पप्पू यादव से दुश्मनी छिड़ी, जमकर मारकाट हुई रौबदार मूंछें, सफेद सफारी सूट और संसद के अंदर भी आंखों पर काला चश्मा। ये आनंद मोहन की पहचान थी। उनके समर्थक माथे पर पट्टी बांधकर घूमते, जिस पर लिखा होता, ‘मैं ही आनंद मोहन हूं।’ दूसरी ओर पिछड़ी जातियों के एक नेता पप्पू यादव उभर रहे थे। उनके समर्थक सड़कों पर नारा लगाते, ‘द्वापर में किशन-कन्हैया, कलियुग में पप्पू भईया।’ जहां आनंद मोहन मंडल कमीशन का विरोध कर रहे थे, पप्पू यादव मंडल कमीशन के समर्थन में खड़े हुए थे। दोनों के बीच दुश्मनी छिड़ गई। BBC की एक रिपोर्ट के अनुसार, आनंद मोहन और पप्पू यादव के समर्थकों के बीच आए दिन झड़प होने लगी। कई बार गोलीबारी भी हुई। जब भी ये दोनों नेता कहीं जाते, तो इस बात पर मुकाबला होता कि किसका काफिला ज्यादा लंबा होगा। 1991 में मधेपुरा के उपचुनाव में जनता दल के बड़े नेता शरद यादव मैदान में थे। पप्पू यादव ने उनका समर्थन किया और आनंद मोहन ने विरोध। 7 नवंबर 1991 को आनंद मोहन अपने हथियारबंद हुजूम के साथ मधेपुरा से गुजर रहे थे। जब काफिला जानकी नगर से गुजरा तो अचानक उन पर फायरिंग शुरू हो गई। आनंद मोहन की ओर से भी जवाबी फायरिंग की गई। अंधाधुंध फायरिंग में आनंद मोहन के दो समर्थक मारे गए। आरोप पप्पू यादव पर लगा। आनंद मोहन के एक समर्थक के बयान पर पप्पू यादव और उनके 12 साथियों पर मुकदमा दर्ज कर लिया गया। खुद की पार्टी बनाई, पत्नी लवली को सांसद बनाया साल 1993, राजेश सिंह की किताब ‘बाहुबलीज ऑफ इंडियन पॉलिटिक्स’ के अनुसार, आनंद मोहन अब ऊंची जाति के लोगों के भगवान थे। युवा उनके एक इशारे पर सड़कों पर उतर आते। जब उनका काफिला सड़क से गुजरता तो उनके आगे-पीछे बुलेट पर सवार सैकड़ों नौजवान साथ चलते। सभी के हाथों में हथियार होते। उस समय लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री थे। सवर्ण मानते थे कि वो बैकवर्ड समर्थक हैं, मुसलमान समर्थक हैं। ऐसे में वो सभी आनंद मोहन के सपोर्ट के लिए एक हो गए। इसका फायदा उठाकर आनंद मोहन जनता दल से अलग हो गए और अपनी बिहार पीपुल्स पार्टी यानी BPP बनाई। अगले ही साल 1994 में वैशाली लोकसभा सीट पर उपचुनाव का ऐलान हुआ। आनंद मोहन ने अपनी पत्नी लवली आनंद को इस सीट से BPP के टिकट पर मैदान में उतारा। धुआंधार प्रचार किया गया। लवली आनंद और आनंद मोहन की सभाओं में हजारों की संख्या में भीड़ उमड़ने लगी। महज एक साल पुरानी पार्टी के चर्चे पूरे बिहार में थे। वैशाली की सीट से लवली आनंद ने जीत दर्ज की। अब तो BPP और आनंद मोहन का कद और बढ़ गया। एक न्यूज रिपोर्ट के अनुसार, उनका नाम अब लालू यादव के विकल्प के तौर पर लिया जाने लगा। इसके बाद आनंद मोहन साल 1996 में समता पार्टी के टिकट पर, फिर 1998 में राष्ट्रीय जनता दल के टिकट पर शिवहर से सांसद बने। अगड़ी जाति की भीड़ ने दलित IAS ऑफिसर की हत्या की बिहार पीपुल्स पार्टी ने 1995 में होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारी शुरू कर दी। इस दौरान पार्टी से जुड़ा कौशलेंद्र शुक्ला उर्फ छोटन शुक्ला मुजफ्फरपुर का डॉन था। छोटन प्राइवेट आर्मी के भी सदस्य थे। वो सवर्णों के बीच काफी लोकप्रिय थे इसलिए आनंद मोहन के खास बन गए। कई मौकों पर आनंद मोहन ने उन्हें अपना भाई कहकर भी संबोधित किया। 3 दिसंबर 1994 को रात के लगभग साढ़े आठ बजे थे। छोटन शुक्ला केसरिया से विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे। वो चुनाव प्रचार करके अपनी एंबेसडर गाड़ी से घर लौट रहे थे। गाड़ी में शुक्ला के अलावा चार और लोग भी थे। जैसे ही गाड़ी मुजफ्फरपुर के संजय सिनेमा से गुजरी, पुलिस की वर्दी पहने कुछ लोगों ने उन्हें रोका। छोटन शुक्ला ने वजह पूछने के लिए गाड़ी का शीशा नीचे ही किया था कि उन पर AK-47 से फायरिंग शुरू हो गई। सफेद एम्बैसडर छोटन शुक्ला और उनके साथियों के खून से लाल हो गई। अफवाह उड़ी कि इस हत्या में राज्य सरकार से जुड़े लोगों का हाथ है और प्रशासन ने उनकी मदद की है। गुस्साए आनंद मोहन ने शहर के बीचोंबीच से छोटन शुक्ला की शवयात्रा निकाली। इस दौरान IAS जी.कृष्णैय्या वहां से गुजरे। गुस्साई भीड़ ने उनकी हत्या कर दी। इस मामले में आनंद मोहन ही मुख्य आरोपी बने क्योंकि वो ही मंच से भीड़ को उकसा रहे थे। ‘बाहुबलीज ऑफ इंडियन पॉलिटिक्स’ किताब के अनुसार, ‘आनंद मोहन की असली ताकत यही थी कि वो अगड़ी जाति के हक की बात उठाते थे और आरक्षण का विरोध करते थे। वहीं IAS जी. कृष्णैय्या SC कम्युनिटी से आते थे। छोटन शुक्ला की हत्या से उनका कोई लेना-देना नहीं था। भीड़ को उनके खिलाफ सिर्फ उनकी जाति के कारण भड़काया गया था। यही घटना आनंद मोहन के गले का फंदा बनी जिसके चलते उन्हें जेल जाना पड़ा।’ चुनाव में नीतीश की पार्टी को पीछे छोड़ा, फिर उन्हीं से हाथ मिलाया 1995 के विधानसभा चुनाव में आनंद मोहन तीन जगह से लड़ने के बावजूद हार गए, लेकिन उनकी पार्टी BPP का प्रदर्शन नीतीश कुमार की समता पार्टी से बहुत बेहतर था। ‘बाहुबलीज ऑफ इंडियन पॉलिटिक्स’ किताब के अनुसार बिहार की जनता आनंद मोहन को लालू प्रसाद यादव को टक्कर देने वाले नेता के तौर पर देखने लगी थी। इसके बाद नीतीश कुमार किसी भी तरह आनंद मोहन को अपनी ओर करना चाहते थे। ऐसा करके वो सवर्णों को साधने की फिराक में थे। इसी के चलते साल 1996 में BPP नीतीश कुमार की समता पार्टी में मिल गई। आनंद मोहन ने 1996 का लोकसभा चुनाव जेल से ही समता पार्टी के टिकट पर लड़ा और जीत दर्ज की। इस दौरान उनका नारा था, ‘संधि नहीं अब रण होगा, संघर्ष महा-भीषण होगा…।’ 1998 में वो एक बार फिर सांसद बने, लेकिन इस बार JDU के टिकट पर। अगले ही साल यानी 1999 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी जॉइन कर ली, लेकिन इस साल वो चुनाव नहीं जीत सके। इसके बाद वो कांग्रेस के साथ आ गए। पहली बार सांसद रहे नेता को फांसी की सजा सुनाई गई साल 2007, IAS जी.कृष्णैय्या की हत्या के मामले में निचली अदालत ने आनंद मोहन को भीड़ को उकसाने के आरोप में दोषी करार दिया और उन्हें फांसी की सजा सुनाई। ये पहला मामला था जब देश में किसी सांसद और विधायक रह चुके नेता को फांसी की सजा सुनाई गई हो। हालांकि 2008 में पटना हाईकोर्ट ने आनंद मोहन की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया। 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने भी पटना हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। इस बार आनंद मोहन के पास जेल जाने के अलावा कोई चारा नहीं था। उन्होंने 2010 में अपनी पत्नी लवली आनंद को कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा चुनाव और 2014 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़वाया, लेकिन दोनों ही बार लवली आनंद हार गईं। 2020 में लालू यादव की पार्टी ने आनंद मोहन के बेटे चेतन आनंद को शिवहर विधानसभा सीट से टिकट दिया। चेतन आनंद ये चुनाव जीत गए और MLA बने। इसके बाद आनंद मोहन आसानी से जेल से बाहर आते रहे। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ऐसे भी कई मौके आए जब 6 महीने के अंदर उन्हें 3 बार पैरोल मिली। साल 2023 में वो अपने बेटे चेतन आनंद की सगाई में शामिल होने के लिए पैरोल पर बाहर आए। इस समारोह में बिहार की कई बड़ी हस्तियों ने हिस्सा लिया। नीतीश कुमार भी इस सगाई में पहुंचे थे। जेल मैनुअल में बदलाव किया गया, बाहर आया बाहुबली साल 2023, जनवरी का महीना। JDU के पार्टी इवेंट में नीतीश कुमार भाषण देने मंच पर पहुंचे, लेकिन वहां जुटी भीड़ आनंद मोहन की रिहाई की मांग करने लगी। इस पर नीतीश कुमार ने कहा, ‘आपको पता नहीं है, उनकी पत्नी से पूछ लीजिएगा कि हम क्या कोशिश कर रहे हैं। कुछ जानते ही नहीं हो, बिना बात के ही नारा लगा रहे हो। ये सबकी चिंता मत करो। हम लगे हुए है जी…। शांत रहो।’ इसके बाद से ही ये कयास शुरू हो गए कि आनंद मोहन रिहा हो सकते हैं, लेकिन इसमें एक कानून आड़े आ रहा था। दरअसल, बिहार प्रिजन मैनुअल 2012 नियम 481(i) के अनुसार समय से पहले रेपिस्ट, आतंकवादी और ऑन ड्यूटी सरकारी अफसर की हत्या करने वाले की रिहाई नहीं हो सकती थी। 10 अप्रैल 2023 को इस कानून में संशोधन किया गया। नीतीश सरकार ने मैनुअल में केवल ऑन ड्यूटी सरकारी अफसर की हत्या वाली लाइन को हटा दिया। इससे आनंद मोहन की जेल से रिहाई का रास्ता साफ हो गया। आखिरकार, 27 अप्रैल को आनंद मोहन जेल से बाहर आ गए। खुद को कलम का सिपाही मानते हैं आनंद मोहन एक इंटरव्यू में आनंद मोहन ने कहा, ‘लोग कहते हैं कि मैं हिंसा करता हूं, बाहुबल का इस्तेमाल करता हूं, लेकिन ऐसा नहीं है। मैंने हमेशा कलम को अपना हथियार बनाया है। 17 साल की उम्र में मैं ‘क्रांति दूत’ नाम के अखबार का संपादक था।’ जेल में रहते हुए ही आनंद मोहन ने ‘कैद में आजाद कदम’ नाम की किताब लिखी। इस किताब को संसद के ग्रंथालय में रखा गया है। इसके अलावा आनंद मोहन ने दशरथ मांझी के जीवन पर एक शॉर्ट स्टोरी भी लिखी है। एक रिपोर्ट के अनुसार, CBSE बोर्ड ने 8वीं क्लास के सिलेबस में इस शॉर्ट स्टोरी को शामिल किया है। आनंद मोहन चुनाव नहीं लड़ सकते हैं, लेकिन हाल ही में दिए एक बयान से वो चर्चा में आ गए। एक सामाजिक इवेंट के दौरान उन्होंने कहा, ‘बिहार के सत्ता के सिंहासन पर कौन बैठेगा, यह ‘भूरा बाल’ तय करेगा। अभी कोई चिराग पासवान से लड़ रहा है, कोई जीतन राम मांझी से। कोई नीतीश से तो कोई लालू से। पर अंत में ‘भूरा बाल’ वाले निर्णय करेंगे।’ बाहुबली आनंद मोहन जदयू से खफा चल रहे हैं। उनकी पत्नी लवली आनंद जदयू से सांसद और बेटे चेतन आनंद इसी पार्टी से विधायक हैं। आनंद मोहन ने कहा है कि नीतीश कुमार को जिंदा दफन कर दिया गया है। कहीं पर भी नीतीश कुमार का चेहरा नहीं है। जदयू अब थैली वाली पार्टी हो गई है। जिसने थैली पहुंचाई वो मंत्री बना। आनंद मोहन ने कहा कि नीतीश कुमार की मजबूरी का फायदा उठाया जा रहा है। आज कौन लोग हैं चेतन आनंद को नवीनगर भेजते हैं, शफूर्दीन का गला काटते हैं? उन्होंने कहा कि, शपथ ग्रहण में नीतीश कुमार मौजूद थे। 85 एमएलए के साथ वे खड़े थे। लेकिन उनकी फोटो नहीं थी। आज जो सरकारी बोर्ड लगाया जा रहे हैं उसमें से डिप्टी सीएम का भी नाम गायब हो गया है। आनंद मोहन ने ये बातें सीतामढ़ी में कहीं। वो डुमरा रोड स्थित एक होटल के सभागार में आयोजित महाराणा प्रताप प्रतिमा स्थापना समारोह की तैयारी बैठक में शामिल होने पहुंचे थे। चेतन आनंद को मंत्री नहीं बनाए जाने पर आनंद मोहन ने कहा कि, कुछ लोग नैरिटिव सेट कर रहे हैं कि आनंद मोहन बेटे को पद दिलाने के लिए बौखला गया है। इन लोगों ने जेडीयू का बोरिया-बिस्तर नहीं समेटा है। पूरे एनडीए को डूबा रहे हैं। आज चुनाव हो जाए। आरा-बक्सर के एमएलसी चुनाव में थैली को करारा जवाब मिला है। दूसरा चुनाव फिर होने वाला है। लोग कहते हैं टाइगर अभी जिंदा है। सिंह इज किंग। देखते रहिए आप। पैसे का खेल हो रहा है। आनंद मोहन ने कहा कि नैरेटिव सेट किया जा रहा है कि आनंद मोहन बेटे के लिए बौखला गया है। नीतीश कुमार की मजबूरी का फायदा लेकर थैली की राजनीति धड़ल्ले से की जा रही है। उन्होंने कहा कि जो थैली पहुंचाया वह मंत्री बन गया। जब नीतीश कुमार सचेत थे तब इसी सीतामढ़ी का टिकट वापस करना पड़ा था। अब जानिए कौन हैं बाहुबली आनंद मोहन 26 जनवरी 1956, सहरसा के पनगछिया गांव में आनंद मोहन का जन्म एक राजपूत परिवार में हुआ। उनके दादा रामबहादुर सिंह स्वतंत्रता सेनानी रहे थे। इस कारण बचपन से ही घर में राजनीति, समाज शास्त्र और समाज सुधार के मुद्दों पर बात होती रहती थी। कम उम्र से ही वो सत्ता को चुनौती भी देने लगे थे। इसी दौरान सरकारें लगातार पिछड़ी जातियों को आगे बढ़ाने की बात कर रही थीं। आनंद मोहन इससे बहुत नाखुश थे। साल 1974, जेपी ने सरकार के खिलाफ आवाज उठानी शुरू कर दी थी। ‘सिंहासन खाली करो, जनता आती है…’ के नारे लगाते हुए जेपी के पीछे देशभर के युवा सड़कों पर उतर आए। इन्हीं युवाओं में शामिल थे 18 साल के आनंद मोहन सिंह। जेपी की ‘संपूर्ण क्रांति’ को उन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया और कॉलेज की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी। यही उनके राजनीतिक करियर की शुरुआत थी। इमरजेंसी के दौरान वो 2 साल जेल में भी रहे और बाहर आकर समाजवादी नेता और फ्रीडम फाइटर परमेश्वर कुमार को अपना राजनीतिक गुरु बना लिया। आरक्षण के विरोध से बने अगड़ी जाति के हीरो 1978 में कर्पूरी ठाकुर ने पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण का भी ऐलान कर दिया था। इससे नाराज आनंद मोहन ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई को काले झंडे दिखाए। दूसरी ओर कई कम्युनिस्ट संगठन ऊंची जातियों के जमींदारों और किसानों को निशाना बना रहे थे। ऐसे में आनंद मोहन ने ऊंची जातियों की सुरक्षा का जिम्मा ले लिया। राजेश सिंह की किताब बाहुबलीज ऑफ इंडियन पॉलिटिक्स के अनुसार आनंद मोहन ने समाजवादी क्रांतिकारी सेना बनाई और अगड़ी जाति के युवाओं को उसमें शामिल होने के लिए बुलाने लगे। इस सेना को आनंद मोहन की प्राइवेट आर्मी भी कहा जाने लगा। आनंद मोहन युवाओं से कहते, ‘आरक्षण की वजह से हमारे समाज में वैसी ही फूट पड़ रही है जैसे ब्रिटिश सरकार ने हिंदू और मुसलमानों के बीच डाली और देश पर कब्जा किया, इसलिए हमें आरक्षण के खिलाफ लड़ाई करनी होगी।’ ये सेना ऊंची जाति के खिलाफ बोलने वालों के साथ मारपीट करती और अपने स्तर पर ही न्याय करने लगी। आरक्षण की मांग करने वाले लोगों के घरों में सेना के लोग घुस जाते और मारपीट करते। ब्राह्मण लड़की का रेप करने वाले का सिर काटकर पूरे गांव में घुमवाया वरिष्ठ पत्रकार कन्हैया भैलारी बताते हैं, ‘उन दिनों मधेपुरा में एक सरकारी टीचर थे। उनकी बेटी के साथ कुछ गुंडों ने रेप किया और उसे चाकू मारकर फेंक दिया। लड़की ब्राह्मण परिवार से थी, इसलिए आनंद सिंह उसके फेवर में आ गए।’ आनंद मोहन ने अपनी सेना के लोगों से कहा, ‘ये काम जिसका भी है, उसकी गर्दन कंधे से अलग करनी जरूरी है। हर हाल में इनका पता लगाओ।’ समाजवादी क्रांतिकारी सेना ने पूरे गांव में पूछताछ शुरू कर दी। जैसे ही आरोपियों का पता चला, आनंद मोहन खुद करीब 50 लोगों के साथ वहां पहुंच गए। पहले तो आरोपियों को दबोचकर जमकर पीटा गया और आखिर में उनकी गर्दन धड़ से अलग कर दी गई। वो यहीं नहीं रुके। उनके कटे सिर तलवार की नोक पर पूरे गांव में घुमाए गए। स्थानीय लोगों के अनुसार, आनंद मोहन तलवार लहराते हुए चीख रहे थे- ‘अगड़ी जाति को परेशान करने वालों का अंजाम सबको पता चलना चाहिए।’ पहली बार आनंद मोहन का नाम आपराधिक मुकदमे में दर्ज हुआ। इसके बाद उनके खिलाफ कई और मुकदमे भी दर्ज हुए। अब पुलिस आनंद मोहन की तलाश में लग गई। ऐसे में, 1983 में वो आत्म-समर्पण के लिए सहरसा की अदालत में पहुंचे। वहां अगड़ी जाति के सैकड़ों लोग पहले से उनके समर्थन में इकट्ठा थे। वो समझ गए कि वो हीरो बन चुके हैं। 3 महीने बाद ही वो जेल से रिहा भी हो गए। पुलिस ने 25 हजार का इनाम रखा, सरेंडर कर जेल से विधायक बने आरक्षण का विरोध करने की वजह से आनंद मोहन सिंह राज्य सरकार के निशाने पर थे। उनके खिलाफ NSA यानी नेशनल सिक्योरिटी एक्ट, CCA यानी क्राइम कंट्रोल एक्ट और MISA यानी मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट में मामले दर्ज किए गए। लेकिन पुलिस के लिए उन तक पहुंचना मुश्किल था। उन्हें पकड़ने के लिए 1 हजार रुपए से लेकर 25 हजार रुपए तक के इनाम का भी ऐलान किया गया। 1990 में विधानसभा चुनाव होने थे। आनंद मोहन समझ गए थे कि आरक्षण के खिलाफ लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए विधानसभा पहुंचना होगा। ऐसे में उन्होंने चुनाव से पहले सरेंडर कर दिया और जेल में रहकर जनता दल के टिकट पर महिषी से चुनाव लड़ा। अगड़ों का समर्थन तो था ही, बाहुबल के दम पर इलाके के पिछड़ों के वोट भी आनंद मोहन को मिले। इस चुनाव में आनंद मोहन ने कांग्रेस के कैंडिडेट को 62 हजार वोटों से हराया। लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री बने। BBC की एक रिपोर्ट के मुताबिक, विधायक बनने के बाद आनंद मोहन घोड़े की सवारी करते, तो कभी बंदूकों के साथ तस्वीरें अखबारों में छपने लगीं। उन्हें पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का भी करीबी माना जाने लगा जो उनकी ही जाति के थे। मंडल कमीशन लागू हुआ तो जनता दल से नाता तोड़ा अगस्त 1990 में तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करने का आदेश दे दिया। इसके तहत केंद्र सरकार की नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में OBC कैटेगरी के लिए 27% आरक्षण लागू हो गया। इस ऐलान के साथ ही देश में भारी बवाल शुरू हो गया। चारों ओर, ‘वीपी सिंह, हाय-हाय’ ‘मंडल कमीशन, हाय-हाय’, ‘मंडल कमीशन वापस लो’ के नारे सुनाई देने लगे। कई जगह हिंसक प्रदर्शन हुए। कहीं आगजनी हुई तो कहीं पुलिस ने लाठीचार्ज किया। सीधे तौर पर बिहार दो धड़ों में बंट गया। एक ओर लालू थे जो पिछड़ों के हक और उन्हें आगे बढ़ाने की बात करते थे और दूसरी ओर आनंद मोहन थे जो इसके विरोध में थे। आनंद मोहन ने खुद को जनता दल से अलग कर लिया। इसी के साथ ऊंची जाति के लोग आनंद मोहन को अपना मसीहा मानने लगे। पिछड़ों के नेता पप्पू यादव से दुश्मनी छिड़ी, जमकर मारकाट हुई रौबदार मूंछें, सफेद सफारी सूट और संसद के अंदर भी आंखों पर काला चश्मा। ये आनंद मोहन की पहचान थी। उनके समर्थक माथे पर पट्टी बांधकर घूमते, जिस पर लिखा होता, ‘मैं ही आनंद मोहन हूं।’ दूसरी ओर पिछड़ी जातियों के एक नेता पप्पू यादव उभर रहे थे। उनके समर्थक सड़कों पर नारा लगाते, ‘द्वापर में किशन-कन्हैया, कलियुग में पप्पू भईया।’ जहां आनंद मोहन मंडल कमीशन का विरोध कर रहे थे, पप्पू यादव मंडल कमीशन के समर्थन में खड़े हुए थे। दोनों के बीच दुश्मनी छिड़ गई। BBC की एक रिपोर्ट के अनुसार, आनंद मोहन और पप्पू यादव के समर्थकों के बीच आए दिन झड़प होने लगी। कई बार गोलीबारी भी हुई। जब भी ये दोनों नेता कहीं जाते, तो इस बात पर मुकाबला होता कि किसका काफिला ज्यादा लंबा होगा। 1991 में मधेपुरा के उपचुनाव में जनता दल के बड़े नेता शरद यादव मैदान में थे। पप्पू यादव ने उनका समर्थन किया और आनंद मोहन ने विरोध। 7 नवंबर 1991 को आनंद मोहन अपने हथियारबंद हुजूम के साथ मधेपुरा से गुजर रहे थे। जब काफिला जानकी नगर से गुजरा तो अचानक उन पर फायरिंग शुरू हो गई। आनंद मोहन की ओर से भी जवाबी फायरिंग की गई। अंधाधुंध फायरिंग में आनंद मोहन के दो समर्थक मारे गए। आरोप पप्पू यादव पर लगा। आनंद मोहन के एक समर्थक के बयान पर पप्पू यादव और उनके 12 साथियों पर मुकदमा दर्ज कर लिया गया। खुद की पार्टी बनाई, पत्नी लवली को सांसद बनाया साल 1993, राजेश सिंह की किताब ‘बाहुबलीज ऑफ इंडियन पॉलिटिक्स’ के अनुसार, आनंद मोहन अब ऊंची जाति के लोगों के भगवान थे। युवा उनके एक इशारे पर सड़कों पर उतर आते। जब उनका काफिला सड़क से गुजरता तो उनके आगे-पीछे बुलेट पर सवार सैकड़ों नौजवान साथ चलते। सभी के हाथों में हथियार होते। उस समय लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री थे। सवर्ण मानते थे कि वो बैकवर्ड समर्थक हैं, मुसलमान समर्थक हैं। ऐसे में वो सभी आनंद मोहन के सपोर्ट के लिए एक हो गए। इसका फायदा उठाकर आनंद मोहन जनता दल से अलग हो गए और अपनी बिहार पीपुल्स पार्टी यानी BPP बनाई। अगले ही साल 1994 में वैशाली लोकसभा सीट पर उपचुनाव का ऐलान हुआ। आनंद मोहन ने अपनी पत्नी लवली आनंद को इस सीट से BPP के टिकट पर मैदान में उतारा। धुआंधार प्रचार किया गया। लवली आनंद और आनंद मोहन की सभाओं में हजारों की संख्या में भीड़ उमड़ने लगी। महज एक साल पुरानी पार्टी के चर्चे पूरे बिहार में थे। वैशाली की सीट से लवली आनंद ने जीत दर्ज की। अब तो BPP और आनंद मोहन का कद और बढ़ गया। एक न्यूज रिपोर्ट के अनुसार, उनका नाम अब लालू यादव के विकल्प के तौर पर लिया जाने लगा। इसके बाद आनंद मोहन साल 1996 में समता पार्टी के टिकट पर, फिर 1998 में राष्ट्रीय जनता दल के टिकट पर शिवहर से सांसद बने। अगड़ी जाति की भीड़ ने दलित IAS ऑफिसर की हत्या की बिहार पीपुल्स पार्टी ने 1995 में होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारी शुरू कर दी। इस दौरान पार्टी से जुड़ा कौशलेंद्र शुक्ला उर्फ छोटन शुक्ला मुजफ्फरपुर का डॉन था। छोटन प्राइवेट आर्मी के भी सदस्य थे। वो सवर्णों के बीच काफी लोकप्रिय थे इसलिए आनंद मोहन के खास बन गए। कई मौकों पर आनंद मोहन ने उन्हें अपना भाई कहकर भी संबोधित किया। 3 दिसंबर 1994 को रात के लगभग साढ़े आठ बजे थे। छोटन शुक्ला केसरिया से विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे। वो चुनाव प्रचार करके अपनी एंबेसडर गाड़ी से घर लौट रहे थे। गाड़ी में शुक्ला के अलावा चार और लोग भी थे। जैसे ही गाड़ी मुजफ्फरपुर के संजय सिनेमा से गुजरी, पुलिस की वर्दी पहने कुछ लोगों ने उन्हें रोका। छोटन शुक्ला ने वजह पूछने के लिए गाड़ी का शीशा नीचे ही किया था कि उन पर AK-47 से फायरिंग शुरू हो गई। सफेद एम्बैसडर छोटन शुक्ला और उनके साथियों के खून से लाल हो गई। अफवाह उड़ी कि इस हत्या में राज्य सरकार से जुड़े लोगों का हाथ है और प्रशासन ने उनकी मदद की है। गुस्साए आनंद मोहन ने शहर के बीचोंबीच से छोटन शुक्ला की शवयात्रा निकाली। इस दौरान IAS जी.कृष्णैय्या वहां से गुजरे। गुस्साई भीड़ ने उनकी हत्या कर दी। इस मामले में आनंद मोहन ही मुख्य आरोपी बने क्योंकि वो ही मंच से भीड़ को उकसा रहे थे। ‘बाहुबलीज ऑफ इंडियन पॉलिटिक्स’ किताब के अनुसार, ‘आनंद मोहन की असली ताकत यही थी कि वो अगड़ी जाति के हक की बात उठाते थे और आरक्षण का विरोध करते थे। वहीं IAS जी. कृष्णैय्या SC कम्युनिटी से आते थे। छोटन शुक्ला की हत्या से उनका कोई लेना-देना नहीं था। भीड़ को उनके खिलाफ सिर्फ उनकी जाति के कारण भड़काया गया था। यही घटना आनंद मोहन के गले का फंदा बनी जिसके चलते उन्हें जेल जाना पड़ा।’ चुनाव में नीतीश की पार्टी को पीछे छोड़ा, फिर उन्हीं से हाथ मिलाया 1995 के विधानसभा चुनाव में आनंद मोहन तीन जगह से लड़ने के बावजूद हार गए, लेकिन उनकी पार्टी BPP का प्रदर्शन नीतीश कुमार की समता पार्टी से बहुत बेहतर था। ‘बाहुबलीज ऑफ इंडियन पॉलिटिक्स’ किताब के अनुसार बिहार की जनता आनंद मोहन को लालू प्रसाद यादव को टक्कर देने वाले नेता के तौर पर देखने लगी थी। इसके बाद नीतीश कुमार किसी भी तरह आनंद मोहन को अपनी ओर करना चाहते थे। ऐसा करके वो सवर्णों को साधने की फिराक में थे। इसी के चलते साल 1996 में BPP नीतीश कुमार की समता पार्टी में मिल गई। आनंद मोहन ने 1996 का लोकसभा चुनाव जेल से ही समता पार्टी के टिकट पर लड़ा और जीत दर्ज की। इस दौरान उनका नारा था, ‘संधि नहीं अब रण होगा, संघर्ष महा-भीषण होगा…।’ 1998 में वो एक बार फिर सांसद बने, लेकिन इस बार JDU के टिकट पर। अगले ही साल यानी 1999 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी जॉइन कर ली, लेकिन इस साल वो चुनाव नहीं जीत सके। इसके बाद वो कांग्रेस के साथ आ गए। पहली बार सांसद रहे नेता को फांसी की सजा सुनाई गई साल 2007, IAS जी.कृष्णैय्या की हत्या के मामले में निचली अदालत ने आनंद मोहन को भीड़ को उकसाने के आरोप में दोषी करार दिया और उन्हें फांसी की सजा सुनाई। ये पहला मामला था जब देश में किसी सांसद और विधायक रह चुके नेता को फांसी की सजा सुनाई गई हो। हालांकि 2008 में पटना हाईकोर्ट ने आनंद मोहन की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया। 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने भी पटना हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। इस बार आनंद मोहन के पास जेल जाने के अलावा कोई चारा नहीं था। उन्होंने 2010 में अपनी पत्नी लवली आनंद को कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा चुनाव और 2014 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़वाया, लेकिन दोनों ही बार लवली आनंद हार गईं। 2020 में लालू यादव की पार्टी ने आनंद मोहन के बेटे चेतन आनंद को शिवहर विधानसभा सीट से टिकट दिया। चेतन आनंद ये चुनाव जीत गए और MLA बने। इसके बाद आनंद मोहन आसानी से जेल से बाहर आते रहे। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ऐसे भी कई मौके आए जब 6 महीने के अंदर उन्हें 3 बार पैरोल मिली। साल 2023 में वो अपने बेटे चेतन आनंद की सगाई में शामिल होने के लिए पैरोल पर बाहर आए। इस समारोह में बिहार की कई बड़ी हस्तियों ने हिस्सा लिया। नीतीश कुमार भी इस सगाई में पहुंचे थे। जेल मैनुअल में बदलाव किया गया, बाहर आया बाहुबली साल 2023, जनवरी का महीना। JDU के पार्टी इवेंट में नीतीश कुमार भाषण देने मंच पर पहुंचे, लेकिन वहां जुटी भीड़ आनंद मोहन की रिहाई की मांग करने लगी। इस पर नीतीश कुमार ने कहा, ‘आपको पता नहीं है, उनकी पत्नी से पूछ लीजिएगा कि हम क्या कोशिश कर रहे हैं। कुछ जानते ही नहीं हो, बिना बात के ही नारा लगा रहे हो। ये सबकी चिंता मत करो। हम लगे हुए है जी…। शांत रहो।’ इसके बाद से ही ये कयास शुरू हो गए कि आनंद मोहन रिहा हो सकते हैं, लेकिन इसमें एक कानून आड़े आ रहा था। दरअसल, बिहार प्रिजन मैनुअल 2012 नियम 481(i) के अनुसार समय से पहले रेपिस्ट, आतंकवादी और ऑन ड्यूटी सरकारी अफसर की हत्या करने वाले की रिहाई नहीं हो सकती थी। 10 अप्रैल 2023 को इस कानून में संशोधन किया गया। नीतीश सरकार ने मैनुअल में केवल ऑन ड्यूटी सरकारी अफसर की हत्या वाली लाइन को हटा दिया। इससे आनंद मोहन की जेल से रिहाई का रास्ता साफ हो गया। आखिरकार, 27 अप्रैल को आनंद मोहन जेल से बाहर आ गए। खुद को कलम का सिपाही मानते हैं आनंद मोहन एक इंटरव्यू में आनंद मोहन ने कहा, ‘लोग कहते हैं कि मैं हिंसा करता हूं, बाहुबल का इस्तेमाल करता हूं, लेकिन ऐसा नहीं है। मैंने हमेशा कलम को अपना हथियार बनाया है। 17 साल की उम्र में मैं ‘क्रांति दूत’ नाम के अखबार का संपादक था।’ जेल में रहते हुए ही आनंद मोहन ने ‘कैद में आजाद कदम’ नाम की किताब लिखी। इस किताब को संसद के ग्रंथालय में रखा गया है। इसके अलावा आनंद मोहन ने दशरथ मांझी के जीवन पर एक शॉर्ट स्टोरी भी लिखी है। एक रिपोर्ट के अनुसार, CBSE बोर्ड ने 8वीं क्लास के सिलेबस में इस शॉर्ट स्टोरी को शामिल किया है। आनंद मोहन चुनाव नहीं लड़ सकते हैं, लेकिन हाल ही में दिए एक बयान से वो चर्चा में आ गए। एक सामाजिक इवेंट के दौरान उन्होंने कहा, ‘बिहार के सत्ता के सिंहासन पर कौन बैठेगा, यह ‘भूरा बाल’ तय करेगा। अभी कोई चिराग पासवान से लड़ रहा है, कोई जीतन राम मांझी से। कोई नीतीश से तो कोई लालू से। पर अंत में ‘भूरा बाल’ वाले निर्णय करेंगे।’


