इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 2027 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार या भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के टिकट पर चुनाव लड़ने के इच्छुक हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए नंदलाल राय की दोषसिद्धि और सजा पर रोक लगा दी। राय को 2017 के हत्या के एक मामले में दोषी ठहराया गया था। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की पीठ ने राय की ओर से दायर आपराधिक अपील पर सुनवाई करते हुए यह आदेश जारी किया।
राय को वाराणसी के सिगरा थाने में दर्ज हत्या के एक मामले में सत्र न्यायालय ने दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी। अदालत ने पाया कि दोषी ठहराए जाने से पहले राय एक राजनेता और भाजपा के सक्रिय कार्यकर्ता थे। अदालत ने कहा, “एक आम व्यक्ति के आजीविका के अधिकार को ध्यान में रखते हुए, जो किसी राजनेता के चुनाव लड़ने के अधिकार से कम महत्वपूर्ण नहीं है, अपीलकर्ता की दोषसिद्धि और सजा पर रोक लगाई जानी चाहिए ताकि वह अपील पर अंतिम निर्णय आने तक अपना जीवनयापन कर सके।”
उच्च न्यायालय ने पांच अक्टूबर को दिए अपने फैसले में अफजाल अंसारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार मामले में उच्चतम न्यायालय के 2023 के फैसले का भी संदर्भ दिया।
उच्चतम न्यायालय ने अंसारी के मामले में कहा था कि जनप्रतिनिधियों का अपने मतदाताओं के प्रति विशेष दायित्व होता है और दोषसिद्धि पर रोक नहीं लगने की स्थिति में उनके चुनाव लड़ने का अवसर समाप्त हो सकता है। अपीलकर्ता ने दोषसिद्धि पर रोक लगाने का अनुरोध करते हुए दलील दी थी कि प्राथमिकी में उसका नाम नहीं था और प्राथमिकी दर्ज होने के 17 दिन बाद मामले में उसकी कथित संलिप्तता का खुलासा किया गया। यह मामला राम जन्मभूमि आंदोलन के सक्रिय कार्यकर्ता प्रमोद कुमार निगम की हत्या से जुड़ा है।
राय का संबंध गैंगस्टर से राजनेता बने मुख्तार अंसारी से बताया गया है। राय पर मामूली विवाद में निगम की हत्या करने का आरोप है। सुनवाई के दौरान राय के वकील ने दलील दी कि निगम राजनीतिक रूप से सक्रिय थे और राय को संदेह व अटकलों के आधार पर मामले में फंसाया गया है।
उच्च न्यायालय ने संबंधित पक्षों को सुनने और मामले की परिस्थितियों पर विचार करने के बाद कहा कि अपील लंबित रहने के दौरान राय की दोषसिद्धि और सजा पर रोक लगाई जानी उचित है।

