भारत की क्लीन एनर्जी ट्रांजिशन की रेस में एक ऐसा मोड़ आया है जिसने राजस्थान के नीति निर्माताओं को सोचने पर मजबूर कर दिया है। सालों से अक्षय ऊर्जा (Renewable Energy) के क्षेत्र में निर्विवाद राजा रहा राजस्थान अब दूसरे पायदान पर खिसक गया है। केंद्रीय नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) द्वारा जारी 31 मार्च 2026 तक के ताजा आंकड़ों ने स्पष्ट कर दिया है कि पड़ोसी राज्य गुजरात ने राजस्थान को बेहद मामूली अंतर से पीछे छोड़ दिया है।
आंकड़ों का खेल: मामूली अंतर, बड़ी चुनौती
गुजरात और राजस्थान के बीच की यह जंग अब 21वीं सदी की ‘एनर्जी वॉर’ में तब्दील हो गई है।
- गुजरात की छलांग: गुजरात ने पिछले एक साल में करीब 13,785 मेगावाट की नई क्षमता जोड़कर कुल 47,178 मेगावाट का आंकड़ा छू लिया है।
- राजस्थान की स्थिति: राजस्थान 47,020 मेगावाट की स्थापित क्षमता के साथ अब दूसरे स्थान पर है। दोनों राज्यों के बीच महज 158 मेगावाट का फासला है।

राजस्थान का ‘सोलर’ किला अभी भी अभेद्य
भले ही कुल क्षमता में गुजरात आगे निकल गया हो, लेकिन सूरज की रोशनी के मामले में राजस्थान का कोई सानी नहीं है।
- सोलर में बादशाहत: राजस्थान अभी भी 41,012 मेगावाट सौर ऊर्जा क्षमता के साथ देश में पहले स्थान पर है।
- गुजरात की ताकत: गुजरात का जोर विंड एनर्जी (पवन ऊर्जा) और रूफटॉप सोलर पर ज्यादा है। गुजरात की 29,303 मेगावाट सौर ऊर्जा के मुकाबले राजस्थान की सौर क्षमता काफी अधिक है।
आखिर राजस्थान कहाँ पीछे छूटा?

विशेषज्ञों का मानना है कि गुजरात की जीत के पीछे उसकी ‘मल्टी-मॉडल’ रणनीति है।
- विंड एनर्जी का सहारा: गुजरात के पास 15,642 मेगावाट पवन ऊर्जा की बड़ी ताकत है, जबकि राजस्थान इस क्षेत्र में अपनी रफ्तार धीमी कर चुका है।
- रूफटॉप सोलर का ‘गुजरात मॉडल’: छतों पर सौर पैनल लगाने के मामले में गुजरात 6,881 मेगावाट के साथ देश का नेतृत्व कर रहा है। पीएम सूर्य घर योजना का लाभ उठाने में भी गुजरात सबसे आगे रहा।
- सपोर्ट इकोसिस्टम: गुजरात ने न केवल बिजली उत्पादन किया, बल्कि सौर पैनल और पवन चक्की बनाने वाली मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स का एक मजबूत ढांचा खड़ा कर लिया है।
मध्य पूर्व का संकट और राजस्थान के लिए सबक
गुजरात ऊर्जा विकास निगम लिमिटेड (GUVNL) की एमडी शालिनी अग्रवाल के अनुसार, मध्य पूर्व में चल रहे संघर्षों के कारण ऊर्जा संकट गहराया है, लेकिन अक्षय ऊर्जा ने राज्यों को ‘लचीलापन’ दिया है। राजस्थान के लिए सबक यह है कि केवल सौर ऊर्जा पर निर्भर रहने के बजाय उसे विंड, हाइड्रो और बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) में भी तेजी से निवेश करना होगा।
2030 का लक्ष्य: राजस्थान बनाम गुजरात

भारत ने 2030 तक 500 गीगावाट (GW) का लक्ष्य रखा है। गुजरात ने अपना लक्ष्य 100 गीगावाट तय किया है और वह अपनी आधी यात्रा (47 GW) पूरी कर चुका है। राजस्थान के पास भी विशाल रेगिस्तानी जमीन है, लेकिन गुजरात के पास निवेश और इंफ्रास्ट्रक्चर की जो गति है, उसने राजस्थान के लिए ‘खतरे की घंटी’ बजा दी है।
क्या राजस्थान दोबारा छीन पाएगा बादशाहत?
अक्षय ऊर्जा की यह रेस अभी खत्म नहीं हुई है। राजस्थान के पास आने वाले महीनों में कई मेगा सोलर पार्क चालू होने वाले हैं। क्या राजस्थान अपनी विशाल परियोजनाओं के दम पर अगले तिमाही आंकड़ों में गुजरात को फिर से पीछे छोड़ पाएगा? या फिर गुजरात का ‘विंड और सोलर’ का कॉम्बो उसे स्थायी रूप से नंबर 1 बनाए रखेगा? आने वाला समय बताएगा कि ‘म्हारो राजस्थान’ अपनी खोई हुई चमक कैसे वापस पाता है।


