भास्कर संवाददाता| रायसेन डिजिटल दौर में संवेदनशील जानकारी बैंक, टेलीकॉम कंपनियों, अलग-अलग डिजिटल प्लेटफॉर्म पर दर्ज है। इन संस्थानों की तकनीकी लापरवाही से डेटा सुरक्षा में चूक हुई। इसके बाद किसी उपभोक्ता के साथ साइबर धोखाधड़ी हुई। ऐसे मामलों में संबंधित संस्थान कानूनी तौर पर क्षतिपूर्ति देने के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं। आईटी एक्ट 2000 के तहत नियुक्त न्यायनिर्णायक अधिकारी ऐसे मामलों की सुनवाई करते हैं। पीड़ित को हर्जाना दिला सकते हैं। यह जानकारी MPSEDC ने ई-दक्ष केंद्र, रायसेन में दी। यहां साइबर डिस्प्यूट रेजोल्यूशन फ्रेमवर्क पर एक दिवसीय कार्यशाला हुई। इसमें विभागीय अधिकारी, कर्मचारी, पुलिस, शिक्षक, आम नागरिक शामिल हुए। साइबर अपराधों से बचाव समझाया गया। कानूनी अधिकार बताए गए। विवाद निपटारे की प्रक्रिया बताई गई। चालू सिम गलत हाथों में पहुंची तो खाली हो सकता है बैंक खाता : कार्यशाला के मुख्य वक्ता एवं मास्टर ट्रेनर यशदीप चतुर्वेदी अध्यक्ष, तन्वी सोशल सर्विसेज समिति ने बताया कि साइबर अपराधी तकनीक और सुरक्षा प्रणालियों के मामले में आम उपभोक्ताओं से 50 गुना अधिक अपडेट रहते हैं। उन्होंने कहा कि लोग जटिल पासवर्ड बनाकर खुद को सुरक्षित मान लेते हैं, जबकि ठग ओटीपी हासिल करने और खातों तक पहुंचने के कई उन्नत तरीके अपना रहे हैं। ऐसे में मोबाइल डिवाइस से ज्यादा सिम कार्ड की सुरक्षा पर ध्यान देना जरूरी है। केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के तहत साइबर विवादों के निपटारे के लिए न्यायनिर्णयन की व्यवस्था की गई है। मध्यप्रदेश में इस व्यवस्था को 2010 में भौतिक स्वरूप मिला। इसे फास्ट ट्रैक व्यवस्था के रूप में संचालित किया जाता है। नियमों के अनुसार मामलों का निराकरण अधिकतम छह महीने में किया जाना होता है। मध्यप्रदेश की इस विशेष न्यायिक व्यवस्था का अब तक का रिकॉर्ड भी कार्यशाला में साझा किया गया। इसके मुताबिक स्थापना से अब तक करीब 80 से 90 मामले पहुंचे हैं। इनमें से 60 मामलों में अंतिम फैसला सुनाया जा चुका है। दावा किया गया कि करीब 95% मामलों में फैसले पीड़ितों के पक्ष में आए और उन्हें क्षतिपूर्ति मिली। आईटी कोर्ट में शिकायत और अपील की यह है प्रक्रिया ₹5 करोड़ तक के मामले : कार्यशाला में बताया गया कि यह अदालत ₹5 करोड़ तक के साइबर फ्रॉड और डेटा चोरी से जुड़े मामलों की सुनवाई कर सकती है। बैंक और संबंधित संस्थानों को समन करने सहित इसे सिविल कोर्ट जैसी शक्तियां प्राप्त हैं। बिना वकील भी आवेदन : पीड़ित व्यक्ति निर्धारित प्रारूप में स्वयं आवेदन प्रस्तुत कर सकता है। इसके लिए वकील रखना अनिवार्य नहीं है। बैंक की लापरवाही पर क्षतिपूर्ति : यदि बैंक की तकनीकी चूक या लापरवाही के कारण सिम स्वैपिंग, फिशिंग अथवा अनधिकृत लेन-देन से खाते से राशि निकलती है, तो मामले के तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर बैंक को क्षतिपूर्ति देने के निर्देश दिए जा सकते हैं। साइबर ठगी होने पर तुरंत उठाएं ये कदम कार्रवाई : खाते से अनधिकृत लेन-देन पर तुरंत बैंक को सूचना देकर खाता सुरक्षित कराएं। हेल्पलाइन पर शिकायत : साइबर ठगी होने पर तुरंत 1930 पर कॉल करें या cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज कराएं। गोपनीयता बनाए रखें : निवेश में भारी मुनाफे के झांसे, डिजिटल अरेस्ट कॉल, फिशिंग लिंक और यूपीआई फ्रॉड से बचें। पासवर्ड, ओटीपी व बैंकिंग जानकारी साझा न करें। आईटी एक्ट और कानूनी उपचारों की दी जानकारी • धारा 46 क्षतिपूर्ति व अधिनिर्णयन : साइबर अपराध, अनधिकृत डेटा एक्सेस और आर्थिक नुकसान से जुड़े मामलों में आईटी एक्ट के तहत क्षतिपूर्ति की मांग की जा सकती है। धारा 70 एवं 72 सुरक्षा व गोपनीयता : संरक्षित कंप्यूटर प्रणालियों और गोपनीय जानकारी तक अनधिकृत पहुंच तथा उसके खुलासे से संबंधित कानूनी प्रावधानों की जानकारी दी गई। डिजिटल साक्ष्य का संरक्षण : इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की सत्यता बनाए रखना और डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखना साइबर अपराधों की जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण है।

