गोडावण के लिए नहीं उजाड़ेंगे लोमड़ियों की मांद:भास्कर एप की खबर का असर, वन विभाग ने बदला फैसला

गोडावण के लिए नहीं उजाड़ेंगे लोमड़ियों की मांद:भास्कर एप की खबर का असर, वन विभाग ने बदला फैसला

जैसलमेर के डेजर्ट नेशनल पार्क (DNP) में गोडावण संरक्षण को लेकर वन विभाग ने लोमड़ियों की मांद तोड़ने की योजना निरस्त कर दी है। दैनिक भास्कर ऐप पर गोडावण की मौत और उसके पास मिली लोमड़ी की मांद से जुड़ी खबर प्रकाशित होने के बाद इस कदम पर सवाल उठे थे। डेजर्ट नेशनल पार्क के एसीएफ अशोक सिंह के अनुसार, प्रकृति के नियमों में हस्तक्षेप किए बिना गोडावणों को जंगल में छोड़ने का अभियान जारी रहेगा। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि जंगली झुंड के साथ रहकर ये पक्षी प्राकृतिक माहौल में खुद को ढाल सकेंगे। मृत गोडावण से 100 मीटर दूर मिली थी लोमड़ी की मांद सम क्षेत्र में कैद में पाले गए चार गोडावणों को खुले जंगल में छोड़ा गया था। यह प्रोजेक्ट गोडावण (ग्रेट इंडियन बस्टर्ड यानी GIB) के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम था। केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने भी इस अभियान को हरी झंडी दिखाई थी। रिलीज के कुछ दिनों बाद 17 अक्टूबर को इनमें से एक युवा गोडावण मृत मिला। घटनास्थल की जांच के दौरान मृत पक्षी से करीब 100 मीटर दूर रेगिस्तानी लोमड़ी की मांद मिली। इसके बाद लोमड़ियों की मांद तोड़ने की संभावना को लेकर चर्चा शुरू हुई। दैनिक भास्कर ने इस मुद्दे पर विशेषज्ञों की राय के साथ सवाल उठाए। वन्यजीव प्रेमियों और पर्यावरणविदों ने भी चिंता जताई कि एक प्रजाति को बचाने के लिए दूसरी प्रजाति का ठिकाना उजाड़ना प्राकृतिक संतुलन के लिए नुकसानदेह हो सकता है। इसके बाद वन विभाग ने मांद तोड़ने की योजना निरस्त कर दी। डेजर्ट नेशनल पार्क के एसीएफ अशोक सिंह ने कहा कि प्रकृति और इकोसिस्टम में हस्तक्षेप किए बिना गोडावणों को जंगल में छोड़ने का अभियान जारी रहेगा। सऊदी अरब के हुबारा प्रोजेक्ट से ली जा रही सीख गोडावण संरक्षण के वैज्ञानिक सऊदी अरब में हुबारा बस्टर्ड के संरक्षण के लिए चलाए गए प्रोजेक्ट से भी सीख ले रहे हैं। वर्ष 1986 में शुरू किए गए इस संरक्षण प्रयास में शुरुआती दौर में पक्षियों को जंगल में छोड़ने पर काफी नुकसान हुआ। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 1991 से 2016 के बीच चले अभियान के शुरुआती चरण में पहले बैच के सभी पांच पक्षी शिकारियों का शिकार हो गए। दूसरे बैच में 12 में से तीन और तीसरे बैच में 14 में से पांच पक्षी ही जीवित बच सके। वहां रेड फॉक्स और जंगली बिल्लियों को हटाने की कोशिश भी की गई, लेकिन शिकार की दर में खास कमी नहीं आई। इसकी वजह यह थी कि स्टेप ईगल और ईगल आउल जैसे बड़े शिकारी पक्षी भी हुबारा के लिए खतरा बने हुए थे। बाद में चार महीने की उम्र के उड़ने में सक्षम पक्षियों को जंगल में छोड़ने पर नतीजों में सुधार हुआ। वर्ष 1994 तक उनकी सर्वाइवल रेट 50 प्रतिशत तक पहुंच गई। वर्ष 2016 तक वहां हुबारा की आबादी बढ़कर 300 से 400 के बीच पहुंच गई। इसी अनुभव से सीख लेते हुए भारत में प्रोजेक्ट GIB के वैज्ञानिकों ने छह महीने की उम्र के पक्षियों को जंगल में छोड़ने का फैसला किया है। छह महीने के गोडावणों को जंगल में छोड़ने की तैयारी प्रोजेक्ट GIB के लीड साइंटिस्ट डॉ. सुतीर्थ दत्ता के अनुसार, पहले चरण में छह महीने की उम्र वाले अधिकतम 10 गोडावणों को जंगल में छोड़ा जाएगा। इनकी वास्तविक संख्या पक्षियों की शारीरिक फिटनेस और स्वास्थ्य के आधार पर तय होगी। छह महीने की उम्र तक गोडावण अपने वयस्क आकार का करीब 70 से 75 प्रतिशत हिस्सा हासिल कर लेते हैं और उड़ने में सक्षम हो जाते हैं। साथ ही, इस उम्र में उनके नए माहौल में ढलने की संभावना भी रहती है। हालांकि, गोडावण जमीन पर रात गुजारते हैं। इस कारण रात में सक्रिय रहने वाली लोमड़ियों, जंगली बिल्लियों और आवारा कुत्तों के अलावा चील-बाज जैसे शिकारी पक्षियों से उन्हें खतरा रहता है। डॉ. दत्ता ने बताया कि छोड़े गए कैप्टिव-ब्रेड गोडावण कुछ ही दिनों में जंगल में रहने वाले गोडावणों के झुंड के साथ घूमते दिखे। इससे वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि वे जंगली झुंड के साथ रहकर और अपने प्राकृतिक व्यवहार के जरिए शिकारियों से बचने के तरीके सीख सकेंगे। विशेषज्ञ बोले- जंगल में जन्मे पक्षी भी सुरक्षित नहीं वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) के डायरेक्टर जीएस भारद्वाज के अनुसार, केवल कैद में पाले गए पक्षी ही शिकारियों का शिकार नहीं होते। जंगल में जन्मे पक्षी भी शिकारियों से पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। उनके मुताबिक, किसी भी प्रजाति को दोबारा प्राकृतिक आवास में बसाने के अभियान में शुरुआती चुनौतियां आ सकती हैं। इन अनुभवों से सीखकर संरक्षण की रणनीति में सुधार करना जरूरी है। वहीं, प्रशिक्षित वन्यजीव जीवविज्ञानी और IUCN-CEM के सदस्य सुमित डऊकिया का कहना है कि केवल पक्षियों की ब्रीडिंग पर ध्यान देने से संरक्षण का उद्देश्य पूरा नहीं होगा। कैद में पाले गए पक्षियों को ऐसे शिकारी से बचने की ट्रेनिंग देना मुश्किल है, जिसे उन्होंने पहले कभी देखा ही नहीं है। इसलिए कैप्टिव ब्रीडिंग के साथ उनके प्राकृतिक आवास को बेहतर बनाना भी जरूरी है। सम और रामदेवरा के केंद्रों में 97 गोडावण वर्तमान में सम और रामदेवरा स्थित प्रोजेक्ट GIB केंद्रों में कुल 97 गोडावण हैं। इनमें 40 पक्षी जंगल से अंडे लाकर तैयार किए गए हैं, जबकि 57 कृत्रिम ब्रीडिंग के जरिए पैदा हुए हैं। इनमें से 86 पक्षियों को कैप्टिव रीप्रोडक्शन यानी प्रजनन के लिए रखा गया है। प्रोजेक्ट के आंकड़ों के अनुसार, 2025 में ब्रीडिंग प्रोग्राम से 24 जीवित चूजे मिले थे। वर्ष 2026 में यह संख्या बढ़कर 29 हो गई। डॉ. सुतीर्थ दत्ता के अनुसार, आने वाले वर्षों में हर साल करीब 30 गोडावणों को जंगल में छोड़ने की योजना है। यदि शुरुआती दौर में 30 से 35 प्रतिशत पक्षी भी जीवित रहने में सफल होते हैं, तो इससे देश में बची जंगली गोडावण आबादी को बढ़ाने में मदद मिल सकती है। फिलहाल जंगली गोडावणों की संख्या करीब 130 बताई गई है।

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