रोजी-रोटी के लिए महानंदा नदी पार करती है महिला:किशनगंज में 3 साल से पुल अधूरा, किनारे से लकड़ियां, घास और बांस जुटाती हैं

रोजी-रोटी के लिए महानंदा नदी पार करती है महिला:किशनगंज में 3 साल से पुल अधूरा, किनारे से लकड़ियां, घास और बांस जुटाती हैं

किशनगंज के ठाकुरगंज प्रखंड के भंकरद्वारी गांव की टुल्ली देवी की जिंदगी संघर्ष की मिसाल है। परिवार का पेट पालने के लिए वह हर दिन सिर पर लकड़ियों का भारी गट्ठर उठाकर करीब 700 मीटर चौड़ी महानंदा नदी पार करती हैं। गले तक गहरे पानी में उतरकर नदी पार करने वाली टुल्ली देवी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने चार सदस्यों के परिवार के लिए दो वक्त के भोजन का इंतजाम करना है। रोजगार का दूसरा साधन नहीं होने के कारण टुल्ली देवी पोठिया प्रखंड की ओर नदी किनारे से लकड़ियां, घास और बांस जुटाती हैं। इसके बाद जान जोखिम में डालकर नदी पार करते हुए अपने गांव लौटती हैं। जब उनसे पूछा जाता है कि इतनी गहरी नदी पार करने में डर नहीं लगता, तो उनका जवाब उनकी मजबूरी बयां करता है। ग्रामीणों को आवागमन में होती है परेशानी उनका कहना है कि अगर वह डरकर घर बैठ जाएंगी, तो बच्चों का पेट कैसे भरेगा और घर में भात कैसे पकेगा। भंकर द्वारी गांव के पास महानंदा नदी पर पुल नहीं होने से ग्रामीणों को आवागमन में काफी परेशानी होती है। किशनगंज शहर और एमजीएम मेडिकल कॉलेज पहुंचने के लिए ग्रामीणों को ठाकुरगंज या पोवाखाली की ओर लंबा रास्ता तय करना पड़ता है। इसके बाद किशनगंज पहुंचने के लिए भी दूरी तय करनी पड़ती है। इस तरह करीब 70 किलोमीटर का चक्कर लगाना पड़ता है, जबकि पुल बनने पर जिला मुख्यालय की दूरी लगभग 15 किलोमीटर रह जाने की बात कही जा रही है। ग्रामीणों की परेशानी दूर करने के लिए करीब तीन साल पहले महानंदा नदी पर पुल निर्माण का काम शुरू हुआ था। सुरक्षित आवागमन की सुविधा से वंचित हालांकि, कुछ समय बाद ही निर्माण कार्य ठप पड़ गया। पुल अधूरा रहने से ग्रामीण आज भी सुरक्षित आवागमन की सुविधा से वंचित हैं। लोगों को उम्मीद है कि जल्द निर्माण कार्य दोबारा शुरू होगा और उन्हें लंबा रास्ता तय करने से राहत मिलेगी। टुल्ली देवी का संघर्ष सिर्फ गरीबी की कहानी नहीं, बल्कि ग्रामीण इलाकों में बुनियादी सुविधाओं की कमी को भी सामने लाता है। एक ओर पुल अधूरा पड़ा है, वहीं दूसरी ओर रोजी-रोटी के लिए उन्हें खतरनाक नदी पार करनी पड़ती है। किशनगंज के ठाकुरगंज प्रखंड के भंकरद्वारी गांव की टुल्ली देवी की जिंदगी संघर्ष की मिसाल है। परिवार का पेट पालने के लिए वह हर दिन सिर पर लकड़ियों का भारी गट्ठर उठाकर करीब 700 मीटर चौड़ी महानंदा नदी पार करती हैं। गले तक गहरे पानी में उतरकर नदी पार करने वाली टुल्ली देवी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने चार सदस्यों के परिवार के लिए दो वक्त के भोजन का इंतजाम करना है। रोजगार का दूसरा साधन नहीं होने के कारण टुल्ली देवी पोठिया प्रखंड की ओर नदी किनारे से लकड़ियां, घास और बांस जुटाती हैं। इसके बाद जान जोखिम में डालकर नदी पार करते हुए अपने गांव लौटती हैं। जब उनसे पूछा जाता है कि इतनी गहरी नदी पार करने में डर नहीं लगता, तो उनका जवाब उनकी मजबूरी बयां करता है। ग्रामीणों को आवागमन में होती है परेशानी उनका कहना है कि अगर वह डरकर घर बैठ जाएंगी, तो बच्चों का पेट कैसे भरेगा और घर में भात कैसे पकेगा। भंकर द्वारी गांव के पास महानंदा नदी पर पुल नहीं होने से ग्रामीणों को आवागमन में काफी परेशानी होती है। किशनगंज शहर और एमजीएम मेडिकल कॉलेज पहुंचने के लिए ग्रामीणों को ठाकुरगंज या पोवाखाली की ओर लंबा रास्ता तय करना पड़ता है। इसके बाद किशनगंज पहुंचने के लिए भी दूरी तय करनी पड़ती है। इस तरह करीब 70 किलोमीटर का चक्कर लगाना पड़ता है, जबकि पुल बनने पर जिला मुख्यालय की दूरी लगभग 15 किलोमीटर रह जाने की बात कही जा रही है। ग्रामीणों की परेशानी दूर करने के लिए करीब तीन साल पहले महानंदा नदी पर पुल निर्माण का काम शुरू हुआ था। सुरक्षित आवागमन की सुविधा से वंचित हालांकि, कुछ समय बाद ही निर्माण कार्य ठप पड़ गया। पुल अधूरा रहने से ग्रामीण आज भी सुरक्षित आवागमन की सुविधा से वंचित हैं। लोगों को उम्मीद है कि जल्द निर्माण कार्य दोबारा शुरू होगा और उन्हें लंबा रास्ता तय करने से राहत मिलेगी। टुल्ली देवी का संघर्ष सिर्फ गरीबी की कहानी नहीं, बल्कि ग्रामीण इलाकों में बुनियादी सुविधाओं की कमी को भी सामने लाता है। एक ओर पुल अधूरा पड़ा है, वहीं दूसरी ओर रोजी-रोटी के लिए उन्हें खतरनाक नदी पार करनी पड़ती है।  

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