मिर्जापुर में रबी सीजन में किसानों को उन्नत खेती के लिए प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के दक्षिणी परिसर स्थित कृषि विज्ञान केंद्र, बरकछा में सरसों, मटर और मसूर की उन्नतिशील प्रजातियों के बीज बिक्री के लिए उपलब्ध कराए गए हैं। किसान केंद्र से बीज खरीदकर समय से बुवाई कर सकते हैं। वैज्ञानिक विधियों को अपनाकर बेहतर उत्पादन और आमदनी बढ़ाने का प्रयास कर सकते हैं। कृषि विज्ञान केंद्र के अध्यक्ष प्रो. श्रीराम सिंह ने बताया कि सरसों की बृजराज, सुरेखा और आरएच-1424 प्रजातियों के बीज उपलब्ध हैं। इनकी फसल लगभग 125 से 130 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। उन्होंने बताया कि अनुकूल परिस्थितियों में वैज्ञानिक अनुशंसाओं के अनुसार खेती करने पर औसतन 10 से 12 क्विंटल प्रति एकड़ तक उपज मिल सकती है। समय पर बुवाई और संतुलित उर्वरक जरूरी प्रो. सिंह ने बताया कि सरसों की अच्छी पैदावार के लिए समय से बुवाई, बीज उपचार, कतारों में बुवाई और संतुलित उर्वरकों का प्रयोग जरूरी है। उन्होंने प्रति हेक्टेयर 25 से 30 किलोग्राम सल्फर के उपयोग की सलाह भी दी। किसानों को मिट्टी की जांच और स्थानीय कृषि अनुशंसाओं के अनुसार उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए, ताकि फसल की पोषण संबंधी जरूरतें पूरी हो सकें। मटर और मसूर की प्रजातियां भी उपलब्ध कृषि विज्ञान केंद्र में मटर की आईपीएफडी 13-2, आईपीएफडी 19-1 और आईपीएफडी 19-3 प्रजातियों के बीज भी उपलब्ध हैं। इसके अलावा मसूर की आईपीएल 315 प्रजाति के बीज बिक्री के लिए रखे गए हैं। केंद्र के अनुसार, दलहनी और तिलहनी फसलों को खेती में शामिल करना किसानों के लिए लाभकारी विकल्प हो सकता है। फसल विविधीकरण से मिट्टी की उर्वरा शक्ति बनाए रखने में मदद प्रो. श्रीराम सिंह ने कहा कि फसल चक्र में दलहनी और तिलहनी फसलों को शामिल करने से किसानों को अतिरिक्त लाभ मिल सकता है। दलहनी फसलें जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण के माध्यम से मिट्टी की उर्वरा शक्ति बनाए रखने में मदद करती हैं। वहीं, फसल विविधीकरण से खेती के जोखिम कम करने और उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करने का अवसर मिलता है। उन्होंने किसानों से अपील की कि बीज, बुवाई की विधि, उर्वरक प्रबंधन और फसल की देखभाल से जुड़ी जानकारी के लिए किसी भी कार्यदिवस में कृषि विज्ञान केंद्र, बरकछा पहुंचकर संपर्क करें।

