9 विमानों से आसमान में बनाते हैं डायमंड:सूर्य किरण के पायलट बोले- उड़ान में भरोसा सबसे जरूरी, 1996 में बनी थी एरोबैटिक टीम

9 विमानों से आसमान में बनाते हैं डायमंड:सूर्य किरण के पायलट बोले- उड़ान में भरोसा सबसे जरूरी, 1996 में बनी थी एरोबैटिक टीम

वाराणसी के आसमान में एयर शो का जलवा पूरे देश के साथ दुनिया में भी चर्चा का विषय बना हुआ है। एक गैर-महानगर में आयोजित देश के बड़े एयर शो में सारंग हेलीकॉप्टर और सूर्य किरण टीम के करतब, कलाबाजी और तेजी से एक-दूसरे के पास से निकलने वाले विमानों को देखने के लिए लोग आखिरी प्रस्तुति तक रुक रहे हैं। सूर्य किरण टीम में ब्रिटेन में बने हॉक एमके-132 विमान इस्तेमाल किए जाते हैं, जिनका निर्माण अब भारत में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) भी कर रही है। इन विमानों की कलाबाजी और आपसी तालमेल को देखकर लोग इनके बारे में जानकारी ले रहे हैं। ऐसे में एशिया की इकलौती नौ विमानों वाली एरोबैटिक डिस्प्ले टीम के स्क्वाड्रन लीडर भावेश शर्मा से दैनिक भास्कर ने बात की। उनसे जाना कि सूर्य किरण के विमानों की खासियत क्या है, इन्हें उड़ाते समय किन सावधानियों का ध्यान रखना पड़ता है और इस टीम का पायलट बनने के लिए युवाओं को क्या करना होगा। पढ़िए रिपोर्ट… सूर्य किरण एयर डिस्प्ले टीम की 5 तस्वीरें… एशिया की इकलौती नौ विमानों वाली एरोबैटिक डिस्प्ले टीम काशी के आसमान में भारतीय वायुसेना के 94 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में एयर शो आयोजित किया जा रहा है। इसके अंतिम दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह वायुसेना का शौर्य और पराक्रम देखेंगे। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी मौजूद रहेंगे। एयर शो की शुरुआत और समापन में अहम भूमिका निभाने वाली सूर्य किरण एरोबैटिक्स टीम के स्क्वाड्रन लीडर भावेश शर्मा से दैनिक भास्कर ने बातचीत की। भावेश टीम में पांचवें नंबर की पोजिशन पर उड़ान भरते हैं। वे बाईं ओर सबसे बाहरी विमान उड़ाते हुए टीम के सिग्नेचर ‘नाइन डायमंड फॉर्मेशन’ में अहम भूमिका निभाते हैं। उन्होंने बताया कि सूर्य किरण एशिया की इकलौती नौ विमानों वाली एरोबैटिक डिस्प्ले टीम है। दुनिया में भी ऐसी बहुत कम टीमें हैं, जो नौ विमानों के साथ हवाई प्रदर्शन करती हैं। टीम का उद्देश्य देश के युवाओं को भारतीय वायुसेना ही नहीं, बल्कि पूरी भारतीय सशस्त्र सेना में शामिल होने के लिए प्रेरित करना है। स्क्वाड्रन लीडर भावेश शर्मा ने बताया कि सूर्य किरण एरोबैटिक्स टीम एशिया की इकलौती नौ विमानों वाली एरोबैटिक डिस्प्ले टीम है। अटूट भरोसे के साथ उड़ान भरते हैं पायलट स्क्वाड्रन लीडर भावेश शर्मा ने बताया कि सूर्य किरण के प्रदर्शन में उड़ान की सटीकता, विमानों के बीच तालमेल और एक-दूसरे पर अटूट भरोसा सबसे अहम है। जब विमान एक-दूसरे से बेहद कम दूरी पर उड़ान भरते हैं, तब पायलटों के बीच विश्वास और अनुशासन बहुत जरूरी होता है। टीम अपने प्रदर्शन के जरिए भारतीय वायुसेना की पेशेवर दक्षता भी दिखाती है। ये सभी खूबियां सिर्फ लड़ाकू विमानों की उड़ान में ही नहीं, बल्कि हर तरह की सैन्य उड़ान में जरूरी होती हैं। हैदराबाद में होती है पायलटों की शुरुआती ट्रेनिंग भावेश शर्मा ने बताया कि सूर्य किरण टीम में शामिल होने के लिए सबसे पहले भारतीय वायुसेना का लड़ाकू विमान पायलट बनना जरूरी है। इसके लिए पायलटों को चरणबद्ध प्रशिक्षण दिया जाता है। शुरुआती प्रशिक्षण के दो चरण हैदराबाद स्थित एयर फोर्स एकेडमी में पूरे होते हैं। इसके बाद तीसरे चरण में पायलट अपनी विशेषज्ञता के अनुसार प्रशिक्षण लेते हैं। इसी प्रक्रिया के तहत लड़ाकू विमान उड़ाने वाले पायलट आगे चलकर सूर्य किरण टीम का हिस्सा बन सकते हैं। लड़ाकू विमान पायलट उड़ाते हैं हॉक एमके-132 भावेश शर्मा ने बताया कि भारतीय वायुसेना में पायलटों को तीन स्ट्रीम में बांटा जाता है—लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर और परिवहन विमान। शुरुआती दो चरणों का प्रशिक्षण पूरा करने के बाद पायलट अपनी स्ट्रीम के अनुसार आगे की ट्रेनिंग लेते हैं। लड़ाकू विमान स्ट्रीम के तीसरे चरण में पायलट हॉक एमके-132 विमान उड़ाते हैं। यह एक उन्नत जेट ट्रेनर विमान है, जिसे लड़ाकू विमानों को उड़ाने की ट्रेनिंग देने के लिए तैयार किया गया है। सूर्य किरण टीम भी इसी विमान से हवाई करतब दिखाती है। अब भारत में एचएएल बना रही हॉक एमके-132 स्क्वाड्रन लीडर भावेश शर्मा ने बताया कि सूर्य किरण टीम में इस्तेमाल होने वाला हॉक एमके-132 मूल रूप से ब्रिटेन में विकसित विमान है। अब हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) भारत में भी इसका निर्माण कर रही है। यह देश के रक्षा उत्पादन और स्वदेशी तकनीक को बढ़ावा देने की दिशा में अहम कदम है। 1996 में हुई थी सूर्य किरण टीम की शुरुआत भारतीय वायुसेना की सूर्य किरण एरोबैटिक्स टीम का गठन वर्ष 1996 में हुआ था। यह भारतीय वायुसेना की 52वीं स्क्वाड्रन का हिस्सा है। शुरुआत में वर्ष 2011 तक टीम कर्नाटक के बीदर एयरफोर्स स्टेशन से उड़ान भरती थी। उस समय हवाई करतब दिखाने के लिए एचएएल के एचजेटी-16 किरण एमके-2 ट्रेनर विमानों का इस्तेमाल किया जाता था। एक साथ नौ विमानों से हैरतअंगेज फॉर्मेशन बनाने के लिए यह टीम दुनिया भर में पहचानी जाती है। 2011 में निलंबित हुई, 2017 में हॉक विमानों के साथ वापसी सूर्य किरण टीम को फरवरी 2011 में कुछ समय के लिए निलंबित कर दिया गया था। करीब छह साल बाद, वर्ष 2017 में हॉक एमके-132 विमानों के साथ टीम को दोबारा शुरू किया गया। हॉक एमके-132 एक उन्नत ट्रेनर विमान है। जरूरत के मुताबिक इसके सैन्य संस्करण में हथियार भी लगाए जा सकते हैं। हॉक एमके-132 विमान की प्रमुख खासियतें

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