मध्य प्रदेश में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग के गरीब पट्टेदारों की जमीनों पर अवैध कब्जे और बेदखली के मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने सख्त रुख अपनाया है। शुक्रवार को कोर्ट ने स्थानीय प्रशासन और पुलिस के कामकाज पर नाराजगी जताते हुए कहा कि प्रशासन धनबल, बाहुबल और राजनीतिक ताकत वाले रसूखदारों का समर्थन कर रहा है और गरीबों की सुरक्षा करने में नाकाम रहा है। हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पुलिस की ओर से दर्ज FIR के तरीके पर सवाल उठाए और गुना एसपी (SP) तथा OIC (प्रभारी अधिकारी) को फटकार लगाई। मामला क्या है? मामला SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम और मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता की धारा 170-बी के तहत दलितों की जमीनों पर अवैध कब्जे और उन्हें वापस दिलाने से जुड़ा है। अदालत ने पाया कि जमीनों पर अवैध कब्जे और बटाई के नाम पर धोखाधड़ी के सैकड़ों मामले सामने आने के बावजूद पुलिस कार्रवाई करने से कतरा रही है। 133 मामलों में जमीन वापसी के दावों के बावजूद पुलिस ने केवल 14 FIR दर्ज कीं। इनमें एक-एक FIR में 96-96 आरोपियों के मामलों को एक साथ जोड़ दिया गया। SP गुना ने नहीं दिया जवाब अदालत में उपस्थित गुना की पुलिस अधीक्षक हितिका वसल से अर्जी (IA 14764/2026) के पैराग्राफ 5 और 6 में बटाई और गलत कब्जे की परिभाषा से जुड़े बयानों की सत्यता पर जवाब मांगा गया। बार-बार पूछे जाने के बावजूद उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। पुलिस और OIC में खींचतान SP ने बाद में दलील दी कि यह अर्जी पुलिस विभाग को विश्वास में लिए बिना OIC (प्रभारी सहायक श्रम आयुक्त आशीष कुमार तिवारी) के आग्रह पर दाखिल की गई थी। सरकारी वकील ने क्या कहा? राज्य सरकार के वकील ने कहा कि उन्होंने OIC को ऐसी अर्जी दाखिल नहीं करने की सलाह दी थी, क्योंकि पिछले अदालती आदेश में कोई अवैधता नहीं थी। हालांकि, OIC के आग्रह पर अर्जी दाखिल करनी पड़ी। OIC से व्यक्तिगत हलफनामा मांगा कोर्ट ने अर्जी के पीछे की मंशा पर सवाल उठाते हुए ग्वालियर संभाग के सहायक श्रम आयुक्त एवं OIC आशीष कुमार तिवारी को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। उन्हें बताना होगा कि अर्जी के पैराग्राफ 5 और 6 में दिए गए बयान किसके कहने पर और क्यों दिए गए। एक FIR में 96 आरोपी क्यों? कोर्ट ने टिप्पणी की कि बेदखली का हर कृत्य एक अलग अपराध है। ऐसे में, जब पीड़ित अलग-अलग हैं, तो कई अपराधों को एक ही FIR में क्यों जोड़ा गया? BNSS की धारा 242 पर जवाब कोर्ट ने राज्य सरकार के वकील को एक सप्ताह का समय देते हुए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 242 के तहत यह स्पष्ट करने को कहा कि क्या अलग-अलग समय पर अलग-अलग पीड़ितों के खिलाफ हुए अपराधों की संयुक्त FIR दर्ज करना कानूनन सही है। केस डायरियां देखने से इनकार गुना SP ने बताया कि 14 FIR दर्ज की गई हैं और 60 दिनों में जांच पूरी कर चालान पेश कर दिया जाएगा। हालांकि, कोर्ट ने जांच की निगरानी को लेकर किसी भी विवाद से बचने के लिए सीलबंद लिफाफे में पेश केस डायरियों को देखने से इनकार कर दिया। FIR दर्ज करने पर जोर कोर्ट ने कहा कि ललिता कुमारी और पृथ्वी राज चौहान के फैसलों के मुताबिक, संज्ञेय अपराध के मामलों में FIR दर्ज करने के संबंध में कानूनी प्रावधानों का पालन करना जरूरी है। प्रशासन को अपनी नाकामी छिपाने के लिए कानूनी दांव-पेच का सहारा नहीं लेना चाहिए। हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी अदालत ने स्थानीय प्रशासन के रवैये पर नाराजगी जताते हुए कहा कि गरीब पट्टेदारों के हितों की अनदेखी की जा रही है और धनबल तथा बाहुबल वाले रसूखदारों को संरक्षण दिया जा रहा है। अदालत के दबाव में उठाए जा रहे कदम भी आधे-अधूरे मन से और अनिच्छापूर्वक उठाए जा रहे हैं। एक सप्ताह बाद अगली सुनवाई मामले की अगली सुनवाई एक सप्ताह बाद होगी। इसमें राज्य सरकार और पुलिस विभाग को एक FIR में 96 आरोपियों को शामिल करने के मामले में कानूनी पक्ष स्पष्ट करना होगा। वहीं, OIC को अपने व्यक्तिगत हलफनामे में अर्जी दाखिल करने के कारणों की जानकारी देनी होगी।

