EWS छात्रों को यूनिफॉर्म के बदले मिलती रहेगी नकद राशि, Delhi High Court ने नीति को ठहराया सही

EWS छात्रों को यूनिफॉर्म के बदले मिलती रहेगी नकद राशि, Delhi High Court ने नीति को ठहराया सही

दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) और वंचित समूहों के छात्रों को स्कूल यूनिफॉर्म देने के बजाय नकद सहायता देने का सरकार का फैसला “पूरी तरह से मनमाना, सनकी या स्वेच्छाचारी” नहीं कहा जा सकता। कोर्ट ने इस नीति को सही ठहराने वाले अपने पहले के फैसले को चुनौती देने वाली एक पुनर्विचार याचिका (रिव्यू पिटिशन) को खारिज कर दिया। जस्टिस सुब्रमणियम प्रसाद और जस्टिस रेनू भटनागर की बेंच ने कहा कि अदालतें आमतौर पर नीतिगत फैसलों में दखल नहीं देतीं, जब तक कि वे इतने मनमाने, सनकी या स्वेच्छाचारी न हों कि अदालत की अंतरात्मा को ही झकझोर दें। बेंच ने कहा कि यह पुनर्विचार याचिका असल में पूरे मामले पर फिर से बहस करने की एक कोशिश थी, जो कि पुनर्विचार अधिकार क्षेत्र (रिव्यू ज्यूरिसडिक्शन) के सीमित दायरे से बाहर है। 

इसे भी पढ़ें: Madras High Court का फैसला, तमिल की मांग पर आपराधिक केस चलाना कानून का दुरुपयोग

अदालत को अपने पिछले फैसले में कोई स्पष्ट गलती नहीं मिली, और न ही उसे ऐसा कोई तथ्य मिला जिस पर उसने दिल्ली सरकार की उस नीति को स्वीकार करने से पहले विचार न किया हो, जिसके तहत पात्र छात्रों को यूनिफॉर्म खरीदने के लिए पर्याप्त राशि दी जानी है। यह फैसला 12 अक्टूबर को ‘जस्टिस फॉर ऑल’ नामक संगठन द्वारा दायर एक पुनर्विचार याचिका (रिव्यू पिटीशन) पर सुनाया गया। इस संगठन ने अदालत के 23 जनवरी, 2026 के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें ‘बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम, 2009’ को लागू करने के संबंध में अदालत के पहले के निर्देशों में बदलाव किया गया था। मूल याचिका में उन कानूनी प्रावधानों को लागू करने की मांग की गई थी, जिनके तहत दिल्ली के मान्यता प्राप्त (सहायता प्राप्त और बिना सहायता प्राप्त) निजी स्कूलों में EWS और वंचित समूहों के तहत दाखिला लेने वाले छात्रों को मुफ्त पाठ्यपुस्तकें, यूनिफॉर्म और अन्य अध्ययन सामग्री मिलनी चाहिए। यह विवाद तब शुरू हुआ जब दिल्ली सरकार ने 10 जून, 2025 को एक नीति बनाई, जिसके तहत यूनिफॉर्म सीधे उपलब्ध कराने के बजाय उनके लिए आर्थिक सहायता देने का निर्णय लिया गया। इस नीति के पीछे का तर्क देते हुए सरकार ने कहा था कि यूनिफॉर्म खरीदना और बांटना एक जटिल प्रक्रिया है, जिससे शिक्षा विभाग और स्कूलों पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। 

इसे भी पढ़ें: Aamir Shaukeen को त्रिपुरा के युवक से नस्लीय दुर्व्यवहार मामले में एक दिन की न्यायिक हिरासत

सरकार ने यह भी बताया कि ‘गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस’ (GeM) के जरिए टेंडर प्रक्रिया पूरी करने में आमतौर पर लगभग छह महीने लग जाते हैं, और अलग-अलग स्कूलों की यूनिफॉर्म के डिजाइन, रंग और विनिर्देश (स्पेसिफिकेशन) भी अलग-अलग होते हैं। इस नीति को स्वीकार करते हुए, उच्च न्यायालय ने इस साल जनवरी में अपने 13 अप्रैल, 2023 के आदेश में बदलाव किया और सरकार को निर्देश दिया कि वह यह सुनिश्चित करे कि छात्रों को नीति के अनुसार यूनिफॉर्म के लिए पर्याप्त राशि मिले। इस फैसले को चुनौती देते हुए ‘जस्टिस फॉर ऑल’ ने तर्क दिया कि उन्हें जवाब दाखिल करने का मौका नहीं दिया गया और यह नीति RTE अधिनियम के प्रावधानों के खिलाफ है। प्रक्रिया संबंधी इस आपत्ति को खारिज करते हुए, पीठ ने कहा कि पुनर्विचार याचिका दायर होने के बाद याचिकाकर्ता को पर्याप्त समय दिया गया था। उनके वकील अदालत में पेश हुए थे, उन्होंने पूरे मामले पर बहस की थी और जवाब दाखिल करने के लिए कोई अतिरिक्त समय नहीं मांगा था। इसलिए, अदालत ने इस दावे को खारिज कर दिया कि पिछली पुनर्विचार कार्यवाही की ठीक से सुनवाई नहीं हुई थी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *