कोडरमा के किसान मडुआ की खेती से बढ़ा रहे आय:कम लागत और कम पानी में, व्यापारी घर आकर खरीद रहे 50 रुपए किलो

कोडरमा के किसान मडुआ की खेती से बढ़ा रहे आय:कम लागत और कम पानी में, व्यापारी घर आकर खरीद रहे 50 रुपए किलो

कोडरमा जिले के चंदवारा प्रखंड के जामुखड़ी, पथलगढ़ा और हरिनो गांव के किसान अब मडुआ (रागी) की खेती कर रहे हैं। पारंपरिक फसलों में जोखिम और कम लाभ के कारण, यह उनके लिए आय बढ़ाने का नया जरिया बन रहा है। मडुआ की खेती कम पानी में भी अच्छी पैदावार देती है। धान के मुकाबले इसमें सिंचाई बहुत कम लगती है। रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर भी कम खर्च होता है, जिससे लागत बहुत कम रहती है। हरिनो के सुरेश यादव और जामुखड़ी के नान्हो यादव जैसे किसान प्रति एकड़ 8 से 10 क्विंटल उत्पादन कर रहे हैं। मडुआ बेचने में किसानों को परेशानी नहीं होती। व्यापारी खुद गांवों तक आकर 40 से 50 रुपए प्रति किलो में मडुआ खरीद रहे हैं। ग्रामीण भी सीधे किसानों से इसे खरीदते हैं। इससे किसानों को मंडी नहीं जाना पड़ता और परिवहन खर्च भी बचता है। कम लागत में ज्यादा मुनाफा
किसान नान्हो यादव के अनुसार मड़ुआ की खेती में कम मेहनत के साथ-साथ लागत भी काफी कम है। इसकी 1 क्विंटल उपज के लिए महज 1 किलो मड़ुआ के पौधे लगाने होते हैं। उन्होंने बताया कि वे बाजार से अगर एक किलो मड़ुआ के दाने लाते हैं, जिसकी कीमत महज 35-40 रुपए होती है, उससे किसान अपनी खेत में 1 क्विंटल मड़ुआ की पैदावार कर लेते हैं। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि 40 रुपए की लागत और थोड़ी मेहनत से किसान को 4-5 हजार रुपए का फायदा हो जाता है। ​मडुआ केवल आर्थिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य के लिहाज से भी एक ‘सुपरफूड’ माना जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होता है, जिससे रक्त में शर्करा का स्तर नियंत्रित रहता है। ​इसमें प्रचुर मात्रा में फाइबर, कैल्शियम, आयरन और एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं, जो उच्च रक्तचाप और पाचन संबंधी समस्याओं को दूर रखते हैं। ​स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता के कारण अब शहरी बाजारों में मडुआ के आटे के साथ-साथ इसके बिस्किट, टोस्ट, कुकीज और नमकीन जैसे मूल्य-संवर्धित (वैल्यू-एडेड) उत्पादों की मांग में भारी उछाल आया है।
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​वर्तमान में धान और गेहूं की तुलना में कुल मांग कम होने के कारण किसान इसे सीमित रकबे में एक वैकल्पिक फसल के रूप में ही लगा रहे हैं। हालांकि, इसको लेकर देशभर में चल रहे अभियानों और पोषण युक्त आहार की बढ़ती खपत ने नई संभावनाएं खोली हैं। किसानों का मानना है कि जैसे-जैसे बाजार में इसकी मांग और प्रसंस्कृत उत्पादों का दायरा बढ़ेगा, वे आने वाले समय में इसका रकबा बढ़ाकर बड़े पैमाने पर उत्पादन करेंगे। कोडरमा जिले के चंदवारा प्रखंड के जामुखड़ी, पथलगढ़ा और हरिनो गांव के किसान अब मडुआ (रागी) की खेती कर रहे हैं। पारंपरिक फसलों में जोखिम और कम लाभ के कारण, यह उनके लिए आय बढ़ाने का नया जरिया बन रहा है। मडुआ की खेती कम पानी में भी अच्छी पैदावार देती है। धान के मुकाबले इसमें सिंचाई बहुत कम लगती है। रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर भी कम खर्च होता है, जिससे लागत बहुत कम रहती है। हरिनो के सुरेश यादव और जामुखड़ी के नान्हो यादव जैसे किसान प्रति एकड़ 8 से 10 क्विंटल उत्पादन कर रहे हैं। मडुआ बेचने में किसानों को परेशानी नहीं होती। व्यापारी खुद गांवों तक आकर 40 से 50 रुपए प्रति किलो में मडुआ खरीद रहे हैं। ग्रामीण भी सीधे किसानों से इसे खरीदते हैं। इससे किसानों को मंडी नहीं जाना पड़ता और परिवहन खर्च भी बचता है। कम लागत में ज्यादा मुनाफा
किसान नान्हो यादव के अनुसार मड़ुआ की खेती में कम मेहनत के साथ-साथ लागत भी काफी कम है। इसकी 1 क्विंटल उपज के लिए महज 1 किलो मड़ुआ के पौधे लगाने होते हैं। उन्होंने बताया कि वे बाजार से अगर एक किलो मड़ुआ के दाने लाते हैं, जिसकी कीमत महज 35-40 रुपए होती है, उससे किसान अपनी खेत में 1 क्विंटल मड़ुआ की पैदावार कर लेते हैं। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि 40 रुपए की लागत और थोड़ी मेहनत से किसान को 4-5 हजार रुपए का फायदा हो जाता है। ​मडुआ केवल आर्थिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य के लिहाज से भी एक ‘सुपरफूड’ माना जाता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होता है, जिससे रक्त में शर्करा का स्तर नियंत्रित रहता है। ​इसमें प्रचुर मात्रा में फाइबर, कैल्शियम, आयरन और एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं, जो उच्च रक्तचाप और पाचन संबंधी समस्याओं को दूर रखते हैं। ​स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता के कारण अब शहरी बाजारों में मडुआ के आटे के साथ-साथ इसके बिस्किट, टोस्ट, कुकीज और नमकीन जैसे मूल्य-संवर्धित (वैल्यू-एडेड) उत्पादों की मांग में भारी उछाल आया है।
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​वर्तमान में धान और गेहूं की तुलना में कुल मांग कम होने के कारण किसान इसे सीमित रकबे में एक वैकल्पिक फसल के रूप में ही लगा रहे हैं। हालांकि, इसको लेकर देशभर में चल रहे अभियानों और पोषण युक्त आहार की बढ़ती खपत ने नई संभावनाएं खोली हैं। किसानों का मानना है कि जैसे-जैसे बाजार में इसकी मांग और प्रसंस्कृत उत्पादों का दायरा बढ़ेगा, वे आने वाले समय में इसका रकबा बढ़ाकर बड़े पैमाने पर उत्पादन करेंगे।  

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