बांका के रजौन प्रखंड अंतर्गत पुनसिया बस्ती में स्थित करीब 221 वर्ष पुराना दुर्गा मंदिर श्रद्धा और विश्वास का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। इस प्राचीन मंदिर की ख्याति बांका जिले के अलावा आसपास के क्षेत्रों में भी फैली हुई है। यहां मां दुर्गा के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए हर वर्ष हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं। विशेष रूप से संतान सुख की कामना करने वाले दंपतियों की इस मंदिर के प्रति गहरी आस्था है । स्थानीय मान्यता है कि सच्चे मन से मांगी गई मन्नत मां दुर्गा अवश्य पूरी करती हैं। यहां बुधवार को प्रतिमा का विसर्जन किया जाएगा। पुत्र प्राप्ति को लेकर दूरदराज के लोग यहां मन्नते मांगने आते हैं। संतान प्राप्ति की कामना के साथ श्रद्धालु करते है आराधना गांव के बुजुर्गों के अनुसार,सप्तमी और अष्टमी के दिन कई श्रद्धालु मां दुर्गा के समक्ष बैठकर संतान प्राप्ति की कामना के साथ आराधना करते हैं। ऐसी मान्यता है कि मां दुर्गा स्वप्न में दर्शन देकर निःसंतान महिलाओं को संतान सुख का आशीर्वाद देती हैं। इसी विश्वास के साथ दूर-दराज के क्षेत्रों से श्रद्धालु गंगा स्नान करने के बाद मंदिर पहुंचते हैं और दिन-रात मां की भक्ति में लीन रहते हैं।मनोकामना पूरी होने पर नवमी के दिन श्रद्धालुओं द्वारा बलि देने की परंपरा भी वर्षों से चली आ रही है। बेटे प्राप्ति की कामना से मंदिर का कराया था निर्माण मंदिर के इतिहास के अनुसार, वर्ष 1805 में जवाहर मंडल ने बेटे प्राप्ति की कामना से इस दुर्गा मंदिर का निर्माण कराया था। स्थानीय लोगों का कहना है कि मंदिर निर्माण के कुछ समय बाद उन्हें बेटे रत्न की प्राप्ति हुई। इसके बाद से ही यह मंदिर सिद्धपीठ के रूप में प्रसिद्ध हो गया। तभी से यहां मां दुर्गा के प्रति श्रद्धालुओं की आस्था लगातार बढ़ती गई। मंदिर की एक विशेष परंपरा आज भी कायम है। प्रतिमा विसर्जन के दौरान मंडल परिवार की महिलाएं मां दुर्गा को खोइछा अर्पित करती हैं। इस परंपरा का निर्वहन परिवार की महिलाएं वर्षों से करती आ रही हैं। दुर्गा पूजा के अवसर पर मंदिर परिसर में भव्य मेले का आयोजन किया जाता है। इसमें हजारों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचकर मां दुर्गा की पूजा-अर्चना करते हैं। पूजा कमेटी के सदस्य और स्थानीय प्रशासन श्रद्धालुओं की सुविधा तथा सुरक्षा व्यवस्था को लेकर मुस्तैद रहते हैं। मंदिर के पुजारी सह मेढ़पति कार्तिक मंडल के अनुसार, इस प्राचीन स्थल के प्रति लोगों की अटूट आस्था है। श्रद्धालु पूरी श्रद्धा से मां के दरबार में अपनी मनोकामना लेकर पहुंचते हैं। करीब 221 वर्षों से यह मंदिर धार्मिक परंपराओं और लोकविश्वास का प्रतीक बना हुआ है। बांका के रजौन प्रखंड अंतर्गत पुनसिया बस्ती में स्थित करीब 221 वर्ष पुराना दुर्गा मंदिर श्रद्धा और विश्वास का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। इस प्राचीन मंदिर की ख्याति बांका जिले के अलावा आसपास के क्षेत्रों में भी फैली हुई है। यहां मां दुर्गा के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए हर वर्ष हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं। विशेष रूप से संतान सुख की कामना करने वाले दंपतियों की इस मंदिर के प्रति गहरी आस्था है । स्थानीय मान्यता है कि सच्चे मन से मांगी गई मन्नत मां दुर्गा अवश्य पूरी करती हैं। यहां बुधवार को प्रतिमा का विसर्जन किया जाएगा। पुत्र प्राप्ति को लेकर दूरदराज के लोग यहां मन्नते मांगने आते हैं। संतान प्राप्ति की कामना के साथ श्रद्धालु करते है आराधना गांव के बुजुर्गों के अनुसार,सप्तमी और अष्टमी के दिन कई श्रद्धालु मां दुर्गा के समक्ष बैठकर संतान प्राप्ति की कामना के साथ आराधना करते हैं। ऐसी मान्यता है कि मां दुर्गा स्वप्न में दर्शन देकर निःसंतान महिलाओं को संतान सुख का आशीर्वाद देती हैं। इसी विश्वास के साथ दूर-दराज के क्षेत्रों से श्रद्धालु गंगा स्नान करने के बाद मंदिर पहुंचते हैं और दिन-रात मां की भक्ति में लीन रहते हैं।मनोकामना पूरी होने पर नवमी के दिन श्रद्धालुओं द्वारा बलि देने की परंपरा भी वर्षों से चली आ रही है। बेटे प्राप्ति की कामना से मंदिर का कराया था निर्माण मंदिर के इतिहास के अनुसार, वर्ष 1805 में जवाहर मंडल ने बेटे प्राप्ति की कामना से इस दुर्गा मंदिर का निर्माण कराया था। स्थानीय लोगों का कहना है कि मंदिर निर्माण के कुछ समय बाद उन्हें बेटे रत्न की प्राप्ति हुई। इसके बाद से ही यह मंदिर सिद्धपीठ के रूप में प्रसिद्ध हो गया। तभी से यहां मां दुर्गा के प्रति श्रद्धालुओं की आस्था लगातार बढ़ती गई। मंदिर की एक विशेष परंपरा आज भी कायम है। प्रतिमा विसर्जन के दौरान मंडल परिवार की महिलाएं मां दुर्गा को खोइछा अर्पित करती हैं। इस परंपरा का निर्वहन परिवार की महिलाएं वर्षों से करती आ रही हैं। दुर्गा पूजा के अवसर पर मंदिर परिसर में भव्य मेले का आयोजन किया जाता है। इसमें हजारों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचकर मां दुर्गा की पूजा-अर्चना करते हैं। पूजा कमेटी के सदस्य और स्थानीय प्रशासन श्रद्धालुओं की सुविधा तथा सुरक्षा व्यवस्था को लेकर मुस्तैद रहते हैं। मंदिर के पुजारी सह मेढ़पति कार्तिक मंडल के अनुसार, इस प्राचीन स्थल के प्रति लोगों की अटूट आस्था है। श्रद्धालु पूरी श्रद्धा से मां के दरबार में अपनी मनोकामना लेकर पहुंचते हैं। करीब 221 वर्षों से यह मंदिर धार्मिक परंपराओं और लोकविश्वास का प्रतीक बना हुआ है।

