शहर में सिंगल यूज प्लास्टिक पर नगर निगम का एक्शन शून्य हो चुका है। पॉलीथिन बैग्स और पैकिंग थर्मोकोल का धड़ल्ले से इस्तेमाल जारी है। निगम ने पॉलीथिन की बिक्री व इस्तेमाल पर 154 चालान काटने के बाद साल भर से अभियान बंद कर रखा है। दिल्ली और नोएडा से हो रही निर्बाध सप्लाई के कारण रोजाना हजारों किलो पॉलीथिन जालंधर पहुंच रहा है। नगर निगम, इंडस्ट्री विभाग और पीपीसीबी की संयुक्त टीम न होने से सप्लाई चेन नहीं टूट सकी है। जालंधर में रोजाना पैदा होने वाले 450 मीट्रिक टन सॉलिड वेस्ट में 25 फीसदी हिस्सा सिंगल यूज प्लास्टिक का है, जो खाली प्लॉटों, सड़कों और डंपों पर जमा हो रहा है। ट्रेडर्स फोरम के बलजीत सिंह के अनुसार, गलनशील प्लास्टिक और कपड़े/कागज के बैग महंगे व आसानी से उपलब्ध नहीं हैं। वहीं सीनियर डिप्टी मेयर बलबीर बिट्टू का कहना है कि एनजीटी के नए आदेशों पर अफसरों से मंथन किया जाएगा। एनजीटी के निर्देश ‘एक्शन अगेंस्ट प्लास्टिक’ संगठन की याचिका पर सुनवाई करते हुए एनजीटी ने नगर निगम, पीपीसीबी और सीपीसीबी की संयुक्त कमेटी बनाकर अवैध प्लास्टिक यूनिट्स को बंद करने और जुर्माना लगाने के निर्देश दिए हैं। एजीएपीपी की डॉ. पल्लवी खन्ना, डॉ. नवनीत भुल्लर और बागेश्वर सिंह भी प्रतिबंध को प्रभावी बनाने में जुटे हैं। रीसाइकलिंग बंद, कबाड़ी भी नहीं उठाते, जिससे वातावरण को नुकसान हो रहा रिटायर्ड जॉइंट कमिश्नर एडवोकेट अशोक बजाज ने बताया कि पैकेजिंग कंपनियों द्वारा प्लास्टिक वापस लेने का नियम जमीनी स्तर पर फेल रहा है। 100 माइक्रोन से कम मोटाई वाले पॉलीथिन, स्ट्रॉ, प्लेट्स व कप पूरी तरह प्रतिबंधित हैं। रीसाइकलिंग बंद होने से कबाड़ी भी इसे नहीं उठा रहे हैं, जिससे वातावरण को गंभीर नुकसान पहुंच रहा है। सस्ते विकल्प न मिलने से जनता भी इसे इस्तेमाल करने को मजबूर है। कमजोर मॉनिटरिंग: प्रतिबंधित पॉलीथिन बेचने वालों के चालान नहीं कट रहे। रिकवरी और जुर्माने की प्रक्रिया बेहद सुस्त है। वैकल्पिक व्यवस्था की कमी: रिसाइकिल्ड पेपर बैग, कपड़े या जूट के थैलों का उत्पादन काफी कम है। इनके लिए शॉपिंग मॉल 20 से 25 रुपये तक वसूल रहे हैं। सप्लाई चेन पर पूरी तरह रोक न लगना: पॉलीथिन बनाने वाली मुख्य इकाइयों और अवैध फैक्ट्रियों पर एक्शन नहीं हो रहा। जनता में जागरूकता की कमी: रोजमर्रा के कामों में सुविधा की आदत के कारण प्रतिबंध केवल कागजों तक सीमित रह गया है।

