बेगूसराय जिले का बखरी नवरात्र पर तांत्रिक साधना और सिद्धियों का केंद्र बन गया है। तांत्रिकों के बीच बिहार का कामाख्या नाम से प्रसिद्ध बखरी की पावन भूमि और प्रख्यात शाबर मंत्र साधक बहुरा मामा का यह स्थल नवरात्र के दौरान तंत्र साधकों से गुलजार रहा। महाअष्टमी की रात पुराने दुर्गा स्थान में विभिन्न जिलों से पहुंचे साधकों की भीड़ उमड़ पड़ी। यहां माता की विशेष पूजा-अर्चना के बाद साधक अपनी साधना को सिद्धि में बदलने के लिए लीन नजर आए। स्थानीय लोगों और बुजुर्गों के अनुसार बखरी के इस पुराने दुर्गा स्थान का इतिहास करीब 500 से 600 वर्ष पुराना है। साक्षात शक्ति का स्वरूप माना जाता है मान्यताओं के अनुसार मुगल काल में परमार वंश के राजा थान सिंह और मान सिंह द्वारा इस ऐतिहासिक मंदिर की स्थापना की गई थी। भगवती माता की प्रतिमा और परंपरा को दूर-दराज से लाकर यहां स्थापित किए थे। शुरुआत में यह स्थान एक साधारण झोपड़ी में हुआ करता था। लेकिन समय के साथ यह तंत्र साधना का एक जीवंत विश्वविद्यालय बन गया। मंदिर की इस प्राचीन और गूढ़ परंपरा को संजोने में प्रख्यात शाबर मंत्र साधक बहुरा मामा का अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। बहुरा मामा को साक्षात शक्ति का स्वरूप माना जाता है। उनसे जुड़ी कई अलौकिक लोक-कथाएं आज भी प्रचलित हैं। बखरी के संबंध में कहा जाता था कि इस क्षेत्र की बकरी और लकड़ी भी तंत्र शक्तियों के प्रभाव में आ जाया करती थी। रहस्यमयी और अनूठी प्रक्रिया तंत्र साधना की सिद्धि जांचने की प्रक्रिया अत्यंत रहस्यमयी और अनूठी है। महाअष्टमी की रात मंदिर परिसर स्थित बलि प्रदान स्थल पर विशेष पूजा-अर्चना के बाद चाटी (चाकरी) चलाई जाती है। साधक बलि स्थल से चाटी लेकर मुख्य प्रतिमा की ओर बढ़ते हैं। मान्यता है कि जिस साधक की चाटी चलते हुए मंदिर की मुख्य प्रतिमा तक पहुंच जाती है, उसकी वर्षों की साधना सफल और सिद्ध मानी जाती है। यदि चाटी रास्ते में ही रुक जाती है या मुख्य प्रतिमा तक नहीं पहुंच पाती, तो साधक की तंत्र साधना अधूरी मानी जाती है। बाहर से आते हैं शोधकर्ता स्थानीय रंजीत कुमार का कहना है कि यह सब माता भगवती की असीम कृपा और आशीर्वाद से ही संभव होता है। जो भी साधक सच्ची श्रद्धा और निष्ठा के साथ सिद्धि की कामना लेकर चाटी चलाते हैं, उनकी साधना पूरी होती है। बखरी के इस सिद्ध पीठ की प्रामाणिकता और तंत्र शक्तियों की परीक्षा लेने के लिए कई बार बाहर से लोग और शोधकर्ता भी आते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस स्थान की शक्ति और सिद्धि की कोई भी व्यक्ति निष्पक्ष होकर जांच कर सकता है। आज के आधुनिक दौर में भी तंत्र-मंत्र और साधना के प्रति लोगों का अगाध विश्वास जीवंत बना हुआ है। मंदिर में उमड़ती है भीड़ इस अद्भुत और रहस्यमयी परंपरा को देखने के लिए युवाओं, महिलाओं और बुजुर्गों की भारी भीड़ मंदिर परिसर में उमड़ती है। भीड़ को नियंत्रित करने और धार्मिक अनुष्ठानों को सुचारू रूप से संपन्न कराने के लिए आयोजन समिति और स्थानीय प्रशासन को काफी मशक्कत करनी पड़ती है। नवरात्र के प्रथम दिन से ही शुरू होने वाला यह तंत्र साधकों का महाजुटान बखरी को तांत्रिक साधना के नक्शे पर एक अद्वितीय स्थान दिलाता है। बेगूसराय जिले का बखरी नवरात्र पर तांत्रिक साधना और सिद्धियों का केंद्र बन गया है। तांत्रिकों के बीच बिहार का कामाख्या नाम से प्रसिद्ध बखरी की पावन भूमि और प्रख्यात शाबर मंत्र साधक बहुरा मामा का यह स्थल नवरात्र के दौरान तंत्र साधकों से गुलजार रहा। महाअष्टमी की रात पुराने दुर्गा स्थान में विभिन्न जिलों से पहुंचे साधकों की भीड़ उमड़ पड़ी। यहां माता की विशेष पूजा-अर्चना के बाद साधक अपनी साधना को सिद्धि में बदलने के लिए लीन नजर आए। स्थानीय लोगों और बुजुर्गों के अनुसार बखरी के इस पुराने दुर्गा स्थान का इतिहास करीब 500 से 600 वर्ष पुराना है। साक्षात शक्ति का स्वरूप माना जाता है मान्यताओं के अनुसार मुगल काल में परमार वंश के राजा थान सिंह और मान सिंह द्वारा इस ऐतिहासिक मंदिर की स्थापना की गई थी। भगवती माता की प्रतिमा और परंपरा को दूर-दराज से लाकर यहां स्थापित किए थे। शुरुआत में यह स्थान एक साधारण झोपड़ी में हुआ करता था। लेकिन समय के साथ यह तंत्र साधना का एक जीवंत विश्वविद्यालय बन गया। मंदिर की इस प्राचीन और गूढ़ परंपरा को संजोने में प्रख्यात शाबर मंत्र साधक बहुरा मामा का अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। बहुरा मामा को साक्षात शक्ति का स्वरूप माना जाता है। उनसे जुड़ी कई अलौकिक लोक-कथाएं आज भी प्रचलित हैं। बखरी के संबंध में कहा जाता था कि इस क्षेत्र की बकरी और लकड़ी भी तंत्र शक्तियों के प्रभाव में आ जाया करती थी। रहस्यमयी और अनूठी प्रक्रिया तंत्र साधना की सिद्धि जांचने की प्रक्रिया अत्यंत रहस्यमयी और अनूठी है। महाअष्टमी की रात मंदिर परिसर स्थित बलि प्रदान स्थल पर विशेष पूजा-अर्चना के बाद चाटी (चाकरी) चलाई जाती है। साधक बलि स्थल से चाटी लेकर मुख्य प्रतिमा की ओर बढ़ते हैं। मान्यता है कि जिस साधक की चाटी चलते हुए मंदिर की मुख्य प्रतिमा तक पहुंच जाती है, उसकी वर्षों की साधना सफल और सिद्ध मानी जाती है। यदि चाटी रास्ते में ही रुक जाती है या मुख्य प्रतिमा तक नहीं पहुंच पाती, तो साधक की तंत्र साधना अधूरी मानी जाती है। बाहर से आते हैं शोधकर्ता स्थानीय रंजीत कुमार का कहना है कि यह सब माता भगवती की असीम कृपा और आशीर्वाद से ही संभव होता है। जो भी साधक सच्ची श्रद्धा और निष्ठा के साथ सिद्धि की कामना लेकर चाटी चलाते हैं, उनकी साधना पूरी होती है। बखरी के इस सिद्ध पीठ की प्रामाणिकता और तंत्र शक्तियों की परीक्षा लेने के लिए कई बार बाहर से लोग और शोधकर्ता भी आते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस स्थान की शक्ति और सिद्धि की कोई भी व्यक्ति निष्पक्ष होकर जांच कर सकता है। आज के आधुनिक दौर में भी तंत्र-मंत्र और साधना के प्रति लोगों का अगाध विश्वास जीवंत बना हुआ है। मंदिर में उमड़ती है भीड़ इस अद्भुत और रहस्यमयी परंपरा को देखने के लिए युवाओं, महिलाओं और बुजुर्गों की भारी भीड़ मंदिर परिसर में उमड़ती है। भीड़ को नियंत्रित करने और धार्मिक अनुष्ठानों को सुचारू रूप से संपन्न कराने के लिए आयोजन समिति और स्थानीय प्रशासन को काफी मशक्कत करनी पड़ती है। नवरात्र के प्रथम दिन से ही शुरू होने वाला यह तंत्र साधकों का महाजुटान बखरी को तांत्रिक साधना के नक्शे पर एक अद्वितीय स्थान दिलाता है।

