पाकुड़ के 250 साल पुराने सिंहवाहिनी मंदिर में दुर्गा पूजा:भक्तों की भीड़ उमड़ी, राजशाही काल से होती है पूजा; 1947 में बदली तांत्रिक से वैष्णवी रीति

पाकुड़ के 250 साल पुराने सिंहवाहिनी मंदिर में दुर्गा पूजा:भक्तों की भीड़ उमड़ी, राजशाही काल से होती है पूजा; 1947 में बदली तांत्रिक से वैष्णवी रीति

पाकुड़ जिले में दुर्गापूजा का उल्लास छाया हुआ है। सोमवार को अष्टमी के बाद महानवमी की पूजा भी हुई। इस दौरान शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक के दुर्गा मंदिरों और पूजा पंडालों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी। शहर के राजा पाड़ा स्थित ऐतिहासिक सिंहवाहिनी मंदिर में भी बड़ी संख्या में भक्त पहुंचे। श्रद्धालुओं ने मां को डाला अर्पित किया और पुष्पांजलि देकर सुख-समृद्धि की कामना की। सुबह से ही मंदिरों और पंडालों में भक्तों के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया था। लोगों ने स्नान-ध्यान कर पूजा-अर्चना की। जिले के विभिन्न इलाकों में पूजा को लेकर उत्साह देखा गया। हिरणपुर, महेशपुर समेत कई प्रखंडों के दुर्गा मंदिरों में पाठा की बलि भी दी गई। 250 साल पुराना है सिंहवाहिनी मंदिर का इतिहास राजा पाड़ा स्थित सिंहवाहिनी मंदिर का ऐतिहासिक महत्व है। यहां करीब 250 वर्षों से मां की पूजा-अर्चना होती आ रही है। मंदिर में अष्टधातु की प्रतिमा स्थापित है। इसका निर्माण पाकुड़ राज स्टेट के राजा पृथ्वी चंद्र शाही ने करवाया था। वर्ष 1947 से पहले यहां तांत्रिक विधि से पूजा होती थी। बाद में महारानी ज्योतिर्मयी देवी ने इस परंपरा को बंद करवाकर वैष्णवी रीति से पूजा शुरू कराई। मंदिर परिसर में काल भैरव की प्रतिमा, कई शिवलिंग और एक बड़ा सफेद शिवलिंग भी स्थापित है। महानवमी पर यहां चाल कुम्हड़ा की बलि देने की परंपरा आज भी निभाई जाती है। इस ऐतिहासिक मंदिर में दर्शन के लिए झारखंड के अलावा कई राज्यों से श्रद्धालु पहुंचते हैं। पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ पहुंचते हैं आदिवासी समाज के लोग सिंहवाहिनी मंदिर में नवमी और दशमी के अवसर पर आदिवासी समाज के लोग बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। वे पारंपरिक अस्त्र-शस्त्र और वाद्य यंत्र लेकर मंदिर आते हैं। मां के दर्शन के बाद पारंपरिक नृत्य भी करते हैं। इससे पूजा के दौरान पारंपरिक संस्कृति की झलक देखने को मिलती है। वहीं, शहर के बड़ी अलीगंज स्थित हरतक्कीतल्ला में इस वर्ष भव्य पूजा पंडाल बनाया गया है। यहां आकर्षक प्रतिमा स्थापित की गई है। अष्टमी के दिन पंडाल में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। बड़ी संख्या में लोगों ने मां को डाला अर्पित किया और पूजा-अर्चना की। पूजा समिति के अध्यक्ष विद्यासागर महतो और सदस्य आशीष गोस्वामी ने बताया कि यहां वर्षों से मां दुर्गा की पूजा होती आ रही है। इस वर्ष भी पूरे उत्साह और धूमधाम से पूजा की जा रही है। सुरक्षा को लेकर पुलिस प्रशासन अलर्ट कोलकाता में हुई घटना के बाद पाकुड़ जिले में पूजा के दौरान सुरक्षा व्यवस्था को लेकर पुलिस प्रशासन सतर्क है। अष्टमी के अवसर पर सभी पूजा पंडालों में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए। श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए प्रशासन की ओर से निगरानी रखी गई। जिले के विभिन्न पूजा स्थलों पर भक्तों ने मां दुर्गा के दर्शन किए और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की। शहर के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में भी पूजा को लेकर उत्साह बना हुआ है। ऐतिहासिक मंदिरों की परंपराओं, आकर्षक पंडालों और श्रद्धालुओं की भागीदारी से पाकुड़ में दुर्गोत्सव का माहौल भक्तिमय बना हुआ है। पाकुड़ जिले में दुर्गापूजा का उल्लास छाया हुआ है। सोमवार को अष्टमी के बाद महानवमी की पूजा भी हुई। इस दौरान शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक के दुर्गा मंदिरों और पूजा पंडालों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी। शहर के राजा पाड़ा स्थित ऐतिहासिक सिंहवाहिनी मंदिर में भी बड़ी संख्या में भक्त पहुंचे। श्रद्धालुओं ने मां को डाला अर्पित किया और पुष्पांजलि देकर सुख-समृद्धि की कामना की। सुबह से ही मंदिरों और पंडालों में भक्तों के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया था। लोगों ने स्नान-ध्यान कर पूजा-अर्चना की। जिले के विभिन्न इलाकों में पूजा को लेकर उत्साह देखा गया। हिरणपुर, महेशपुर समेत कई प्रखंडों के दुर्गा मंदिरों में पाठा की बलि भी दी गई। 250 साल पुराना है सिंहवाहिनी मंदिर का इतिहास राजा पाड़ा स्थित सिंहवाहिनी मंदिर का ऐतिहासिक महत्व है। यहां करीब 250 वर्षों से मां की पूजा-अर्चना होती आ रही है। मंदिर में अष्टधातु की प्रतिमा स्थापित है। इसका निर्माण पाकुड़ राज स्टेट के राजा पृथ्वी चंद्र शाही ने करवाया था। वर्ष 1947 से पहले यहां तांत्रिक विधि से पूजा होती थी। बाद में महारानी ज्योतिर्मयी देवी ने इस परंपरा को बंद करवाकर वैष्णवी रीति से पूजा शुरू कराई। मंदिर परिसर में काल भैरव की प्रतिमा, कई शिवलिंग और एक बड़ा सफेद शिवलिंग भी स्थापित है। महानवमी पर यहां चाल कुम्हड़ा की बलि देने की परंपरा आज भी निभाई जाती है। इस ऐतिहासिक मंदिर में दर्शन के लिए झारखंड के अलावा कई राज्यों से श्रद्धालु पहुंचते हैं। पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ पहुंचते हैं आदिवासी समाज के लोग सिंहवाहिनी मंदिर में नवमी और दशमी के अवसर पर आदिवासी समाज के लोग बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। वे पारंपरिक अस्त्र-शस्त्र और वाद्य यंत्र लेकर मंदिर आते हैं। मां के दर्शन के बाद पारंपरिक नृत्य भी करते हैं। इससे पूजा के दौरान पारंपरिक संस्कृति की झलक देखने को मिलती है। वहीं, शहर के बड़ी अलीगंज स्थित हरतक्कीतल्ला में इस वर्ष भव्य पूजा पंडाल बनाया गया है। यहां आकर्षक प्रतिमा स्थापित की गई है। अष्टमी के दिन पंडाल में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। बड़ी संख्या में लोगों ने मां को डाला अर्पित किया और पूजा-अर्चना की। पूजा समिति के अध्यक्ष विद्यासागर महतो और सदस्य आशीष गोस्वामी ने बताया कि यहां वर्षों से मां दुर्गा की पूजा होती आ रही है। इस वर्ष भी पूरे उत्साह और धूमधाम से पूजा की जा रही है। सुरक्षा को लेकर पुलिस प्रशासन अलर्ट कोलकाता में हुई घटना के बाद पाकुड़ जिले में पूजा के दौरान सुरक्षा व्यवस्था को लेकर पुलिस प्रशासन सतर्क है। अष्टमी के अवसर पर सभी पूजा पंडालों में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए। श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए प्रशासन की ओर से निगरानी रखी गई। जिले के विभिन्न पूजा स्थलों पर भक्तों ने मां दुर्गा के दर्शन किए और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की। शहर के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में भी पूजा को लेकर उत्साह बना हुआ है। ऐतिहासिक मंदिरों की परंपराओं, आकर्षक पंडालों और श्रद्धालुओं की भागीदारी से पाकुड़ में दुर्गोत्सव का माहौल भक्तिमय बना हुआ है।  

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