बक्सर जिले के चौसा नगर पंचायत स्थित अमर नवयुवक छात्र संघ दुर्गा पूजा समिति की ओर से आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के अंतिम दिन वृंदावन से पधारी कथावाचक सुदीक्षा कृष्णा जी द्वारा सुदामा चरित्र का भावपूर्ण प्रसंग सुनकर श्रद्धालु भावुक हो उठे। कथा के दौरान स्थानीय कलाकारों ने झांकी के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण और उनके परम मित्र सुदामा के मिलन का सजीव मंचन किया। कलाकारों की प्रस्तुति ने श्रद्धालुओं की खूब वाहवाही बटोरी। कथा में बताया गया कि किस तरह गरीबी से जूझ रहे सुदामा अपने मित्र भगवान श्रीकृष्ण से मिलने द्वारका पहुंचते हैं। साधारण वेशभूषा में पहुंचे सुदामा को द्वारपाल पहचान नहीं पाते और उन्हें महल के अंदर जाने से रोक देते हैं। जब द्वारपाल भगवान श्रीकृष्ण को बताते हैं कि सुदामा नाम का एक गरीब व्यक्ति उनसे मिलने आया है और खुद को उनका मित्र बता रहा है, तो कृष्ण अपने बालसखा का नाम सुनते ही भावुक हो उठते हैं। मित्र का नाम सुनते ही नंगे पांव दौड़े श्रीकृष्ण सुदामा के आने की खबर सुनते ही भगवान श्रीकृष्ण राजमहल से नंगे पांव अपने मित्र से मिलने दौड़ पड़ते हैं। अपने बचपन के मित्र को सामने देखकर वे उन्हें गले लगा लेते हैं। इसके बाद सुदामा को महल में ले जाकर उनका आदर-सत्कार करते हैं। भगवान कृष्ण और सुदामा के इस मिलन के दृश्य को स्थानीय कलाकारों ने झांकी के माध्यम से जीवंत कर दिया। कथा के इस प्रसंग ने मित्रता, प्रेम, समर्पण और निस्वार्थ भाव का संदेश दिया। झांकी में भगवान श्रीकृष्ण का अपने गरीब मित्र के प्रति प्रेम देखकर श्रद्धालु भावुक हो गए। पूरे आयोजन के दौरान श्रद्धालु भक्ति में लीन नजर आए। भागवत कथा के समापन दिवस पर सुदामा चरित्र की प्रस्तुति ने यह संदेश दिया कि सच्ची मित्रता में अमीरी-गरीबी और ऊंच-नीच का कोई स्थान नहीं होता। सच्चा मित्र वही है, जो कठिन परिस्थितियों में भी अपने रिश्ते और प्रेम को नहीं भूलता। बक्सर जिले के चौसा नगर पंचायत स्थित अमर नवयुवक छात्र संघ दुर्गा पूजा समिति की ओर से आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के अंतिम दिन वृंदावन से पधारी कथावाचक सुदीक्षा कृष्णा जी द्वारा सुदामा चरित्र का भावपूर्ण प्रसंग सुनकर श्रद्धालु भावुक हो उठे। कथा के दौरान स्थानीय कलाकारों ने झांकी के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण और उनके परम मित्र सुदामा के मिलन का सजीव मंचन किया। कलाकारों की प्रस्तुति ने श्रद्धालुओं की खूब वाहवाही बटोरी। कथा में बताया गया कि किस तरह गरीबी से जूझ रहे सुदामा अपने मित्र भगवान श्रीकृष्ण से मिलने द्वारका पहुंचते हैं। साधारण वेशभूषा में पहुंचे सुदामा को द्वारपाल पहचान नहीं पाते और उन्हें महल के अंदर जाने से रोक देते हैं। जब द्वारपाल भगवान श्रीकृष्ण को बताते हैं कि सुदामा नाम का एक गरीब व्यक्ति उनसे मिलने आया है और खुद को उनका मित्र बता रहा है, तो कृष्ण अपने बालसखा का नाम सुनते ही भावुक हो उठते हैं। मित्र का नाम सुनते ही नंगे पांव दौड़े श्रीकृष्ण सुदामा के आने की खबर सुनते ही भगवान श्रीकृष्ण राजमहल से नंगे पांव अपने मित्र से मिलने दौड़ पड़ते हैं। अपने बचपन के मित्र को सामने देखकर वे उन्हें गले लगा लेते हैं। इसके बाद सुदामा को महल में ले जाकर उनका आदर-सत्कार करते हैं। भगवान कृष्ण और सुदामा के इस मिलन के दृश्य को स्थानीय कलाकारों ने झांकी के माध्यम से जीवंत कर दिया। कथा के इस प्रसंग ने मित्रता, प्रेम, समर्पण और निस्वार्थ भाव का संदेश दिया। झांकी में भगवान श्रीकृष्ण का अपने गरीब मित्र के प्रति प्रेम देखकर श्रद्धालु भावुक हो गए। पूरे आयोजन के दौरान श्रद्धालु भक्ति में लीन नजर आए। भागवत कथा के समापन दिवस पर सुदामा चरित्र की प्रस्तुति ने यह संदेश दिया कि सच्ची मित्रता में अमीरी-गरीबी और ऊंच-नीच का कोई स्थान नहीं होता। सच्चा मित्र वही है, जो कठिन परिस्थितियों में भी अपने रिश्ते और प्रेम को नहीं भूलता।

