पाली शहर से करीब 15 किलोमीटर दूर बोमादड़ा सीमा पर स्थित प्राचीन पूनागर माताजी मंदिर में नवरात्रा महोत्सव के दौरान श्रद्धालुओं के लिए विशेष व्यवस्था की गई है। अब बुजुर्गों, दिव्यांगों और बच्चों को देवी मां के दर्शन नीचे भी सकेंगे। दरअसल, बुजुर्ग श्रद्धालुओं को पहाड़ी की सीढ़ियां चढ़ने में परेशानी होती थी, इसलिए मंदिर प्रबंधन की ओर से देवी मां के कक्ष पर सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। इन कैमरों को पहाड़ी के नीचे मुख्य द्वार के पास भैरूजी मंदिर के निकट नवनिर्मित बरामदे में लगाई गई LED से जोड़ा गया है, जहां श्रद्धालु ऑनलाइन दर्शन कर सकेंगे। 522 सीढ़ियां चढ़कर पहुंचते हैं मंदिर
अंतरराष्ट्रीय जूना अखाड़ा परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री एवं पूनागर माताजी मंदिर के महंत आनंदपुरी महाराज की प्रेरणा से यह पहल की गई है। मंदिर के संत भोलापुरी महाराज और पुजारी मदनपुरी महाराज ने बताया कि मंदिर करीब एक हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यहां पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को 522 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। ऐसे में बुजुर्गों और दिव्यांगों को दर्शन करने में कठिनाई होती है। नई व्यवस्था से ऐसे श्रद्धालु भी मंदिर के दर्शन कर सकेंगे। तीन दिन तक सुबह-शाम आरती का लाइव प्रसारण
नवरात्रा महोत्सव के तहत 18 से 20 अक्टूबर तक सुबह और शाम होने वाली आरती का लाइव प्रसारण भी एलईडी स्क्रीन पर किया जाएगा। महंत आनंदपुरी महाराज के अनुसार, बरामदे में टीवी के माध्यम से श्रद्धालु मां के दर्शन करने के साथ पूजा-अर्चना भी कर सकेंगे। अगले वर्ष से चैत्र नवरात्रा और शारदीय नवरात्रा के दौरान प्रतिदिन लाइव दर्शन की व्यवस्था संचालित करने की योजना है। अन्य दिनों में श्रद्धालु पहले की तरह पहाड़ी पर चढ़कर माता के दर्शन कर सकेंगे। शिखर पर मां चामुंडा, गुफा में मां कामाख्या देवी विराजित
पूनागर माताजी मंदिर अपनी प्राचीन धार्मिक मान्यताओं और आस्था के लिए प्रसिद्ध है। मंदिर में मां चामुंडा की प्रतिमा स्थापित है। मान्यता के अनुसार, स्थापना के समय से ही मंदिर में घी और तेल की दो अखंड ज्योत प्रज्वलित हैं। पहाड़ी की गुफा में मां कामाख्या देवी का मंदिर भी स्थित है, जहां नाभि पूजा की परंपरा बताई जाती है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि सूर्य की पहली किरण के साथ माता के दर्शन करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। मंदिर से जुड़ी एक लोककथा के अनुसार, एक गाय 25 सालों तक पहाड़ी पर माता के मंदिर के पास रही थी। उसकी मृत्यु के बाद वहीं समाधि बनाई गई, जहां आज भी श्रद्धालु पूजा करते हैं। मंदिर को संत-महात्माओं की तपोस्थली भी माना जाता है।

