राष्ट्रीय राजधानी की एक अदालत ने 2020 के दिल्ली दंगों के दौरान एक व्यक्ति पर जानलेवा हमला से जुड़े मामले में सात लोगों को हत्या और अन्य गंभीर आरोपों से मुक्त कर दिया, लेकिन उन्हें निषेधाज्ञा का उल्लंघन करने का दोषी ठहराया। अदालत ने कहा कि केवल एक पुलिसकर्मी की गवाही के आधार पर आरोपियों को जानलेवा हमले का दोषी ठहराना उचित नहीं होगा, क्योंकि उसकी गवाही की पुष्टि के लिए अन्य साक्ष्यों की जरूरत थी। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश प्रवीण सिंह ने सातों आरोपियों को हत्या, घातक हथियारों के साथ दंगा करने और विभिन्न समूहों के बीच वैमनस्य को बढ़ावा देने समेत अन्य आरोपों से बरी कर दिया।
हालांकि, अदालत ने उन्हें भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 188 के तहत निषेधाज्ञा का उल्लंघन करने का दोषी ठहराया। अदालत ने 15 अक्टूबर को दिए गए आदेश में कहा, “किसी भी गवाह की गवाही से ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिलता कि आरोपियों में से कोई भी किसी भी तरह का हथियार लेकर आया था।’’
यह मामला 25 फरवरी, 2020 को खजूरी चौक पर बब्बू नामक ऑटो-रिक्शा चालक पर हुए हमले से जुड़ा है। हमले के दो दिन बाद जीटीबी अस्पताल में उसकी मौत हो गई थी।
अदालत ने कुलदीप सिंह, हरजीत सिंह उर्फ हैप्पी, राहुल उर्फ अजय, सचिन रस्तोगी, भरत भूषण उर्फ लकी, संदीप उर्फ संजीव और धर्मेंद्र को दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 144 के तहत लगाए गए निषेधाज्ञा का उल्लंघन करने का दोषी ठहराया। अभियोजन पक्ष ने सहायक उपनिरीक्षक (एएसआई) अनिल कुमार की गवाही पर भरोसा किया, जिन्होंने दावा किया था कि उन्होंने हमले को अपनी आंखों से देखा था। हालांकि, प्रत्यक्षदर्शी बताए गए अन्य गवाहों ने अभियोजन पक्ष के दावों का समर्थन नहीं किया।
अदालत ने यह भी पाया कि अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए वीडियो की गुणवत्ता बेहद खराब थी और उसमें दिखाई देने वाले लोगों के चेहरे पहचाने नहीं जा सकते थे। न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि वीडियो में जिस व्यक्ति को पीटते हुए देखा जा सकता है, वह बब्बू ही था या आरोपियों ने उस पर जानलेवा हमला किया था। मामले में एक अन्य आरोपी सचिन गुप्ता उर्फ मोपी को संदेह का लाभ देते हुए सभी आरोपों से बरी कर दिया गया।
अदालत ने दोषियों को सजा सुनाए जाने के संबंध में दलीलें सुनने के लिए मामले को सूचीबद्ध कर दिया।

