कोसी नदी के अतिरिक्त बाढ़ के पानी को सीमांचल के खेतों तक पहुंचाकर सिंचाई में इस्तेमाल करने वाली कोसी-मेची इंट्रा-स्टेट लिंक परियोजना अब जमीन पर उतरने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है। परियोजना के तहत किशनगंज जिले में नहर निर्माण के लिए 571 एकड़ भूमि चिह्नित कर ली गई है। इसमें 552 एकड़ रैयती भूमि का अधिग्रहण होगा, जबकि 19 एकड़ सरकारी जमीन परियोजना में शामिल की जाएगी। प्रशासन ने भूमि संबंधी प्रारंभिक तैयारियां पूरी कर ली हैं। परियोजना पूरी होने के बाद किशनगंज जिले में 39,548 हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई सुविधा से जोड़ने का लक्ष्य है। इसका सबसे बड़ा लाभ टेढ़ागाछ, दिघलबैंक, बहादुरगंज और कोचाधामन प्रखंड के किसानों को मिलने की उम्मीद है। बहादुरगंज में सबसे ज्यादा 454 एकड़ जमीन किशनगंज में लिंक नहर के लिए सबसे ज्यादा भूमि बहादुरगंज अंचल में चिह्नित की गई है। यहां कुल 454 एकड़ जमीन परियोजना में ली जाएगी। इसमें 13 एकड़ सरकारी भूमि है। इसके अलावा टेढ़ागाछ में 99 एकड़ जमीन चिह्नित है, जिसमें 3 एकड़ सरकारी भूमि शामिल है। वहीं ठाकुरगंज में 17 एकड़ जमीन ली जाएगी, जिसमें 2 एकड़ सरकारी जमीन है। 117.50 किमी लंबी लिंक नहर, माखनपुर के पास मेची में मिलेगी कोसी-मेची लिंक परियोजना के तहत कुल 117.50 किलोमीटर लंबी लिंक नहर विकसित की जाएगी। इसका अंतिम छोर किशनगंज जिले के माखनपुर गांव के समीप मेची नदी में होगा। मानसून के दौरान कोसी नदी में आने वाले अतिरिक्त पानी को नियंत्रित नहर प्रणाली के जरिए महानंदा बेसिन की ओर डायवर्ट किया जाएगा। कोसी से छोड़ा गया पानी लिंक नहर के रास्ते किशनगंज पहुंचेगा और मेची नदी में मिलने के बाद महानंदा नदी तंत्र का हिस्सा बनेगा। दो चरणों में पूरा होगा काम परियोजना को दो प्रमुख हिस्सों में बांटा गया है। पहले चरण में वीरपुर बराज से फारबिसगंज तक पूर्वी कोसी मुख्य नहर (ईकेएमसी) के 41.30 किलोमीटर हिस्से का जीर्णोद्धार और क्षमता विस्तार किया जाएगा। दूसरे चरण में फारबिसगंज से किशनगंज के माखनपुर तक 76.20 किलोमीटर नई नहर बनाई जाएगी। परियोजना के तहत पूर्वी कोसी मुख्य नहर की जल वहन क्षमता भी बढ़ाई जाएगी। इसे 15 हजार क्यूसेक से बढ़ाकर 20 हजार क्यूसेक करने की योजना है। इससे सीमांचल तक अधिक मात्रा में पानी पहुंचाया जा सकेगा। बाढ़ का पानी खेतों के लिए बनेगा सिंचाई का साधन इस परियोजना का उद्देश्य सिर्फ सिंचाई सुविधा बढ़ाना नहीं है। मानसून में कोसी नदी में आने वाले अतिरिक्त बाढ़ के पानी को नियंत्रित तरीके से दूसरी नदी प्रणाली में डायवर्ट कर कोसी बेसिन पर बाढ़ का दबाव कम करना भी इसका प्रमुख लक्ष्य है। परियोजना के तहत करीब 2,050 मिलियन क्यूबिक मीटर अतिरिक्त बाढ़ के पानी को डायवर्ट करने का लक्ष्य है। यानी जिस पानी से कोसी क्षेत्र में बाढ़ का दबाव बढ़ता है, उसी पानी को नहर के जरिए सीमांचल के खेतों तक पहुंचाकर सिंचाई में इस्तेमाल किया जाएगा। चार मुख्य शाखा नहर और छह वितरणी नेटवर्क बनेंगे खेतों तक पानी पहुंचाने के लिए लिंक परियोजना के तहत चार मुख्य शाखा नहरों के साथ छह वितरणी (डिस्ट्रीब्यूटरी) नेटवर्क विकसित किए जाएंगे। इससे बारिश पर निर्भर खेती करने वाले किसानों को सालभर सिंचाई के लिए पानी मिलने की उम्मीद है। सिंचाई सुविधा बढ़ने से फसल उत्पादन और खेती की उत्पादकता में भी सुधार होने की संभावना है। चार जिलों के 2.14 लाख हेक्टेयर से ज्यादा खेतों को लाभ पूरी परियोजना का लाभ सिर्फ किशनगंज तक सीमित नहीं रहेगा। लक्ष्य के अनुसार अररिया, पूर्णिया, किशनगंज और कटिहार के कुल 2.14 लाख हेक्टेयर से अधिक कृषि क्षेत्र को सिंचाई सुविधा से जोड़ने की योजना है। किशनगंज में टेढ़ागाछ, दिघलबैंक, बहादुरगंज और कोचाधामन प्रखंडों को इसका प्रमुख लाभ मिलने की उम्मीद है। इन इलाकों में बड़ी संख्या में किसान अब भी खेती के लिए बारिश और स्थानीय जलस्रोतों पर निर्भर हैं। 6,282 करोड़ की परियोजना, मार्च 2029 तक पूरा करने का लक्ष्य कोसी-मेची लिंक परियोजना को प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम (AIBP) में शामिल किया गया है। परियोजना की कुल अनुमानित लागत 6,282.32 करोड़ रुपए है। इसमें केंद्र सरकार की ओर से 3,652.56 करोड़ रुपए का वित्तीय अंशदान दिया जा रहा है। सरकार ने परियोजना को मार्च 2029 तक पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। जमीन अधिग्रहण बढ़ा तो किसानों की उम्मीद भी बढ़ी किशनगंज में नहर के लिए भूमि चिह्नित होने और अधिग्रहण की प्रक्रिया आगे बढ़ने से परियोजना के धरातल पर आने की उम्मीद बढ़ी है। परियोजना पूरी होने के बाद एक ओर कोसी के अतिरिक्त पानी का प्रबंधन बेहतर तरीके से हो सकेगा, वहीं दूसरी ओर सीमांचल के किसानों को सिंचाई के लिए स्थायी जलस्रोत मिलने की संभावना है। यानी परियोजना का मूल उद्देश्य कोसी के बाढ़ के अतिरिक्त पानी को नियंत्रित कर उसे सीमांचल के खेतों तक पहुंचाना है, ताकि बाढ़ का दबाव कम हो और वही पानी खेती के काम आ सके। कोसी नदी के अतिरिक्त बाढ़ के पानी को सीमांचल के खेतों तक पहुंचाकर सिंचाई में इस्तेमाल करने वाली कोसी-मेची इंट्रा-स्टेट लिंक परियोजना अब जमीन पर उतरने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है। परियोजना के तहत किशनगंज जिले में नहर निर्माण के लिए 571 एकड़ भूमि चिह्नित कर ली गई है। इसमें 552 एकड़ रैयती भूमि का अधिग्रहण होगा, जबकि 19 एकड़ सरकारी जमीन परियोजना में शामिल की जाएगी। प्रशासन ने भूमि संबंधी प्रारंभिक तैयारियां पूरी कर ली हैं। परियोजना पूरी होने के बाद किशनगंज जिले में 39,548 हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई सुविधा से जोड़ने का लक्ष्य है। इसका सबसे बड़ा लाभ टेढ़ागाछ, दिघलबैंक, बहादुरगंज और कोचाधामन प्रखंड के किसानों को मिलने की उम्मीद है। बहादुरगंज में सबसे ज्यादा 454 एकड़ जमीन किशनगंज में लिंक नहर के लिए सबसे ज्यादा भूमि बहादुरगंज अंचल में चिह्नित की गई है। यहां कुल 454 एकड़ जमीन परियोजना में ली जाएगी। इसमें 13 एकड़ सरकारी भूमि है। इसके अलावा टेढ़ागाछ में 99 एकड़ जमीन चिह्नित है, जिसमें 3 एकड़ सरकारी भूमि शामिल है। वहीं ठाकुरगंज में 17 एकड़ जमीन ली जाएगी, जिसमें 2 एकड़ सरकारी जमीन है। 117.50 किमी लंबी लिंक नहर, माखनपुर के पास मेची में मिलेगी कोसी-मेची लिंक परियोजना के तहत कुल 117.50 किलोमीटर लंबी लिंक नहर विकसित की जाएगी। इसका अंतिम छोर किशनगंज जिले के माखनपुर गांव के समीप मेची नदी में होगा। मानसून के दौरान कोसी नदी में आने वाले अतिरिक्त पानी को नियंत्रित नहर प्रणाली के जरिए महानंदा बेसिन की ओर डायवर्ट किया जाएगा। कोसी से छोड़ा गया पानी लिंक नहर के रास्ते किशनगंज पहुंचेगा और मेची नदी में मिलने के बाद महानंदा नदी तंत्र का हिस्सा बनेगा। दो चरणों में पूरा होगा काम परियोजना को दो प्रमुख हिस्सों में बांटा गया है। पहले चरण में वीरपुर बराज से फारबिसगंज तक पूर्वी कोसी मुख्य नहर (ईकेएमसी) के 41.30 किलोमीटर हिस्से का जीर्णोद्धार और क्षमता विस्तार किया जाएगा। दूसरे चरण में फारबिसगंज से किशनगंज के माखनपुर तक 76.20 किलोमीटर नई नहर बनाई जाएगी। परियोजना के तहत पूर्वी कोसी मुख्य नहर की जल वहन क्षमता भी बढ़ाई जाएगी। इसे 15 हजार क्यूसेक से बढ़ाकर 20 हजार क्यूसेक करने की योजना है। इससे सीमांचल तक अधिक मात्रा में पानी पहुंचाया जा सकेगा। बाढ़ का पानी खेतों के लिए बनेगा सिंचाई का साधन इस परियोजना का उद्देश्य सिर्फ सिंचाई सुविधा बढ़ाना नहीं है। मानसून में कोसी नदी में आने वाले अतिरिक्त बाढ़ के पानी को नियंत्रित तरीके से दूसरी नदी प्रणाली में डायवर्ट कर कोसी बेसिन पर बाढ़ का दबाव कम करना भी इसका प्रमुख लक्ष्य है। परियोजना के तहत करीब 2,050 मिलियन क्यूबिक मीटर अतिरिक्त बाढ़ के पानी को डायवर्ट करने का लक्ष्य है। यानी जिस पानी से कोसी क्षेत्र में बाढ़ का दबाव बढ़ता है, उसी पानी को नहर के जरिए सीमांचल के खेतों तक पहुंचाकर सिंचाई में इस्तेमाल किया जाएगा। चार मुख्य शाखा नहर और छह वितरणी नेटवर्क बनेंगे खेतों तक पानी पहुंचाने के लिए लिंक परियोजना के तहत चार मुख्य शाखा नहरों के साथ छह वितरणी (डिस्ट्रीब्यूटरी) नेटवर्क विकसित किए जाएंगे। इससे बारिश पर निर्भर खेती करने वाले किसानों को सालभर सिंचाई के लिए पानी मिलने की उम्मीद है। सिंचाई सुविधा बढ़ने से फसल उत्पादन और खेती की उत्पादकता में भी सुधार होने की संभावना है। चार जिलों के 2.14 लाख हेक्टेयर से ज्यादा खेतों को लाभ पूरी परियोजना का लाभ सिर्फ किशनगंज तक सीमित नहीं रहेगा। लक्ष्य के अनुसार अररिया, पूर्णिया, किशनगंज और कटिहार के कुल 2.14 लाख हेक्टेयर से अधिक कृषि क्षेत्र को सिंचाई सुविधा से जोड़ने की योजना है। किशनगंज में टेढ़ागाछ, दिघलबैंक, बहादुरगंज और कोचाधामन प्रखंडों को इसका प्रमुख लाभ मिलने की उम्मीद है। इन इलाकों में बड़ी संख्या में किसान अब भी खेती के लिए बारिश और स्थानीय जलस्रोतों पर निर्भर हैं। 6,282 करोड़ की परियोजना, मार्च 2029 तक पूरा करने का लक्ष्य कोसी-मेची लिंक परियोजना को प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम (AIBP) में शामिल किया गया है। परियोजना की कुल अनुमानित लागत 6,282.32 करोड़ रुपए है। इसमें केंद्र सरकार की ओर से 3,652.56 करोड़ रुपए का वित्तीय अंशदान दिया जा रहा है। सरकार ने परियोजना को मार्च 2029 तक पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। जमीन अधिग्रहण बढ़ा तो किसानों की उम्मीद भी बढ़ी किशनगंज में नहर के लिए भूमि चिह्नित होने और अधिग्रहण की प्रक्रिया आगे बढ़ने से परियोजना के धरातल पर आने की उम्मीद बढ़ी है। परियोजना पूरी होने के बाद एक ओर कोसी के अतिरिक्त पानी का प्रबंधन बेहतर तरीके से हो सकेगा, वहीं दूसरी ओर सीमांचल के किसानों को सिंचाई के लिए स्थायी जलस्रोत मिलने की संभावना है। यानी परियोजना का मूल उद्देश्य कोसी के बाढ़ के अतिरिक्त पानी को नियंत्रित कर उसे सीमांचल के खेतों तक पहुंचाना है, ताकि बाढ़ का दबाव कम हो और वही पानी खेती के काम आ सके।

