बठिंडा में आम आदमी पार्टी ने मौड़ हलके के विधायक सुखबीर सिंह माइसरखाना को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाकर भले ही अपने स्तर पर विवाद को थामने की कोशिश की हो, लेकिन कार्रवाई के बाद राजनीतिक सवाल और गहरे हो गए हैं। माइसरखाना अब अपने अगले कदम के लिए हलके के लोगों और समर्थकों से राय लेने में जुट गए है। बताया जा रहा है कि रविवार को उन्होंने अपने समर्थकों के साथ बैठक करनी शुरू कर दी है। उनका कहना है कि विचार-विमर्श के बाद ही फैसला करेंगे। साथ ही उन्होंने संकेत दिए हैं कि आने वाले दिनों में सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला जा सकता है। ऐसे में विवाद अब एक विधायक की नाराजगी से आगे बढ़कर आप की अंदरूनी राजनीति और सरकार की कार्यप्रणाली पर बहस का मुद्दा बन गया है। अब फैसले से पहले समर्थकों से राय
पार्टी कार्रवाई के बाद माइसरखाना के अगले राजनीतिक कदम पर सबकी नजर है। विधायक ने स्पष्ट किया है कि वह जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं लेंगे। पहले अपने समर्थकों और हलके के लोगों से विचार-विमर्श करेंगे और उसके बाद अगला कदम उठाएंगे। उनके इस रुख ने मौड़ की राजनीति में संभावनाओं को बढ़ा दिया है। यदि वे आने वाले दिनों में सरकार के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोलते हैं, तो मामला सिर्फ पार्टी संगठन तक सीमित नहीं रहेगा।
मौड़ के फैसले पर टिकी निगाहें
फिलहाल माइसरखाना ने न तो किसी विपक्षी दल में जाने की घोषणा की है और न ही अपनी अगली राजनीतिक रणनीति सार्वजनिक की है। उन्होंने इतना जरूर कहा है कि समर्थकों और हलके के लोगों से विचार-विमर्श के बाद अगला कदम उठाएंगे। उनके रुख से यह साफ है कि मामला अभी खत्म नहीं हुआ है। यदि वे सरकार के खिलाफ खुलकर राजनीतिक मोर्चा खोलते हैं, तो इसका असर मौड़ विधानसभा क्षेत्र तक सीमित रहने के बजाय बठिंडा और मालवा की सियासत पर भी पड़ सकता है। अब राजनीतिक नजरें इस बात पर टिकी हैं कि माइसरखाना की अगली बैठक के बाद सामने आने वाला फैसला कितना बड़ा सियासी संदेश देता है। स्कूलों से शुरू हुआ विवाद पार्टी तक पहुंचा
माइसरखाना ने अपने हलके के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी और दूसरी समस्याओं को लेकर सवाल उठाए थे। सामने आए वीडियो में वे इन मुद्दों पर भावुक नजर आए। उन्होंने दावा किया था कि हलके की समस्याओं को लेकर मंत्रियों और अधिकारियों से संपर्क करने के बावजूद अपेक्षित सुनवाई नहीं हुई। माइसरखाना ने अफसरशाही की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए थे। उनका कहना था कि विधायक होने के बावजूद लोगों की समस्याओं का समाधान करवाने में दिक्कत आ रही है। इसके बाद उनके बयान को पार्टी नेतृत्व के खिलाफ असहमति के तौर पर देखा गया। शिक्षकों की कमी का मुद्दा उठाना राजनीतिक तौर पर बन गया संवेदनशील मामला
सरकार शिक्षा क्षेत्र में सुधार और स्कूल ऑफ एमिनेंस जैसी योजनाओं को अपनी प्रमुख उपलब्धियों के रूप में पेश करती रही है। ऐसे में उसी पार्टी के विधायक का सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी का मुद्दा उठाना राजनीतिक तौर पर संवेदनशील मामला बन गया। दूसरी ओर, माइसरखाना के आरोप विधायकों और अफसरशाही के बीच तालमेल के सवाल को भी सामने लाते हैं। यदि निर्वाचित प्रतिनिधि अपने हलके की समस्याओं को लेकर अधिकारियों तक पहुंच नहीं बना पा रहे हैं, तो यह सरकार के जमीनी कामकाज को लेकर विपक्ष को भी हमला करने का मौका देता है।

