रामनगर की विश्व प्रसिद्ध रामलीला में रविवार को वनगमन के बाद निषादराज प्रसंग का मंचन हुआ। लीला देखने पहुंचे दर्शकों में कुछ ऐसे भी थे, जिनका रामलीला से रिश्ता एक-दो साल नहीं, बल्कि पीढ़ियों पुराना है। भैरवनाथ के राम बाबू 1960 से लगातार रामलीला देखने आ रहे हैं। कहते हैं- “हम रामलीला देखने नहीं आते, हमें तो भगवान बुलाते हैं।” कभी गंगा पार कर नाव से और कई बार पैदल पहुंचने वाले राम बाबू अब उम्र बढ़ने के बाद बच्चों की बाइक से रामनगर आते हैं। मुगलसराय के नंदलाल सिंह भी करीब 50 साल से हर साल यहां पहुंच रहे हैं। रामनगर की रामलीला में दर्शकों को नेमी कहा जाता है, यानी वो लोग जो पीढ़ियों से रामलीला देखने आ रहे हैं यह नियमित दर्शक होते हैं और इनके पूर्वज और यह सदियों से रामलीला देखने आते हैं। 1960 से एक भी साल नहीं छूटी रामलीला भैरवनाथ निवासी राम बाबू बताते हैं कि वह 1960 से लगातार रामनगर की रामलीला देखने आ रहे हैं। ऐसा कोई साल नहीं रहा जब उन्होंने रामलीला न देखी हो। जब शरीर में ताकत थी तो पैदल आते थे। गंगा पार कर नाव से भी रामलीला देखने पहुंचे हैं। अब उम्र बढ़ गई है तो बच्चे बाइक से लेकर आते हैं। उनके लिए यह सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि जीवन की सबसे बड़ी अनुभूति है। वह कहते हैं, “हम क्या आते हैं, हमें तो भगवान बुलाते हैं। यहां आकर जीवन का सबसे बड़ा सुख और सबसे अच्छी अनुभूति होती है। जीवन का सुख चाहिए तो एक बार यहां जरूर आना चाहिए।” जंगल से बस्ती तक बदल गया रामनगर, लीला आज भी वैसी ही राम बाबू बताते हैं कि उनके बचपन और आज के रामनगर में काफी अंतर आ गया है। पहले यहां जंगल हुआ करता था, अब बस्तियां बस गई हैं। पहले भीड़ कम होती थी, अब बहुत ज्यादा लोग पहुंचते हैं। लेकिन रामलीला की शैली आज भी नहीं बदली है। “यहां राजा का सम्मान भी दिखता है, लीला भगवान खुद करवाते हैं” राम बाबू के लिए रामनगर की रामलीला की खासियत सिर्फ इसका पुराना होना नहीं है। वह कहते हैं कि यहां कई ऐसी चीजें देखने को मिलती हैं, जो दूसरी जगहों पर नहीं दिखतीं। उनके अनुसार यहां राजा का सम्मान देखने को मिलता है। वे कहते हैं कि रामलीला को स्वयं विश्वनाथ करवाते हैं और काशी के राजा भी विश्वनाथ के स्वरूप माने जाते हैं। उनके शब्दों में, “काशी में तीन राजा हैं- एक काशी विश्वनाथ, एक काशी नरेश और तीसरे कालू डोम।” वह कहते हैं, “यहां जो चमत्कार मैंने देखा है, वह कहीं और नहीं देखा।” 50 साल से हर साल खींच लाता है रामलीला का प्रेम मुगलसराय नयनताबाद से आए नंदलाल सिंह करीब 50 साल से रामनगर की रामलीला देखने आ रहे हैं। उनका कहना है कि हर साल उन्हें यहां भगवान का प्रेम खींच लाता है। नंदलाल के मुताबिक पहले की तुलना में अब दर्शकों की संख्या बहुत बढ़ गई है। उनके अनुसार यह बदलाव रामलीला के प्रति लोगों की बढ़ती आस्था को भी दिखाता है। “यह मेला नहीं, रामलीला है” नंदलाल कहते हैं कि रामनगर की रामलीला को सिर्फ मेला समझना सही नहीं है। “यहां लीला होती है, यह मेला नहीं है। यह रामलीला है।” वे कहते हैं कि लीला देखने वाला सिर्फ घूमने नहीं आता, बल्कि उसके साथ चलता है, कथा को समझता है, उससे ज्ञान लेता है और आगे दूसरों तक पहुंचाता है। हर चौपाई के साथ आगे बढ़ती है लीला नंदलाल बताते हैं कि रामलीला के दौरान रामायण के प्रसंगों और चौपाइयों के साथ लीला आगे बढ़ती है। एक-एक चौपाई के भाव का मंचन किया जाता है। यही वजह है कि दर्शक सिर्फ सामने होने वाली प्रस्तुति नहीं देखते, बल्कि कथा के हर भाव से खुद को जोड़ते हैं। बचपन के बाद सालों बाद लौटे, बोले- लीला स्थल वही लेकिन दायरा बदला पड़ाव से आए महेंद्र केसरी भी बचपन में रामनगर की रामलीला देखने आए थे। अब कई साल बाद वह दोबारा लीला देखने पहुंचे। उन्होंने बचपन के रामनगर को याद करते हुए बताया कि उस समय यहां बहुत हरियाली हुआ करती थी। अब निर्माण और बढ़ती आबादी के कारण माहौल बदल गया है। उनके मुताबिक इससे लीला स्थल का विस्तार पहले की तुलना में कुछ सीमित महसूस होता है, हालांकि लीला स्थल और उसकी मूल परंपरा आज भी वही है। टीवी पर रामलीला देखते हैं, यहां रामलीला को जीते हैं महेंद्र केसरी रामनगर की रामलीला को टीवी पर दिखाई जाने वाली रामलीला से अलग मानते हैं। उनके अनुसार टीवी पर दर्शक स्क्रीन के सामने बैठकर प्रसंग देखते हैं, जबकि रामनगर में लोग लीला के साथ चलते हैं और खुद को उस प्रसंग का हिस्सा महसूस करते हैं। वह कहते हैं कि यहां “हम उस चीज को जीते हैं जो हो रही है। हम रामजी के साथ-साथ उनकी कथा को जीते हैं। इसलिए यह हमें ज्यादा जोड़ती है।” आज का वनवास के बाद निषादराज से भेंट आज की लीला में भगवान राम के वनगमन के बाद निषादराज गुह से भेंट और गंगा पार कराने से जुड़ा प्रसंग केंद्र में रहा। अयोध्या छोड़कर वन की ओर निकले राम, सीता और लक्ष्मण के मार्ग में निषादराज से मुलाकात होती है। निषादराज राम के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं और उनके साथ आत्मीयता से पेश आते हैं। इसके बाद राम के गंगा पार जाने का प्रसंग आता है।

