आगरा खंड शिक्षक MLC चुनाव में डा. आकाश अग्रवाल के सपा में शामिल होने से मुकाबला दिलचस्प हो गया है। पिछले चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में भाजपा उम्मीदवार को हराकर विधान परिषद पहुंचे आकाश अग्रवाल अब सपा के टिकट पर चुनाव लड़ेंगे। ऐसे में भाजपा के सामने अपनी सीट पर मजबूत चुनौती पेश करने की परीक्षा होगी।
भाजपा इस बार स्नातक के साथ-साथ शिक्षक MLC पर कब्जा करने के लिए पूरा जोर लगा रही है। इसके लिए संगठन अभी से तैयारियों में जुट गया है।
बता दें कि 2020 के शिक्षक MLC चुनाव में सपा प्रत्याशी हवेंद्र चौधरी 6वें स्थान पर रहे थे। जबकि भाजपा प्रत्याशी डा. दिनेश चंद्र वशिष्ठ दूसरे नंबर पर थे।
अब विस्तार से पढ़िये…
2020 में निर्दलीय शिक्षक MLC बनकर भाजपा-सपा को झटका देने वाले डा. आकाश अग्रवाल ने एक बार फिर से झटका दे दिया है। भाजपा से उम्मीद टूटने पर सपा में शामिल हुए आकाश अग्रवाल ने आगरा खंड शिक्षक चुनाव में हलचढ़ बढ़ा दी है। उनके इस दांव से सपा खेमे में जहां उत्साह का माहौल है वहीं, भाजपाई खेमे में चिंता की लकीरें थोड़ी बढ़ गई हैं। हालांकि, पिछले चुनाव में आकाश की जीत का आधार बने शिक्षक मतदाताओं का समर्थन इस बार किस हद तक उनके साथ रहता है, यह चुनाव का सबसे अहम सवाल होगा। 2020 में आकाश ने भाजपा को दी थी शिकस्त
आगरा खंड शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के पिछले चुनाव में भाजपा ने डॉ. दिनेश चंद्र वशिष्ठ को मैदान में उतारा था, जबकि डॉ. आकाश अग्रवाल निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़े थे। मतगणना के बाद आकाश अग्रवाल ने भाजपा प्रत्याशी को 2,376 मतों से हराकर जीत दर्ज की थी।
2020 के चुनाव का परिणाम जीत का अंतर
2020 के शिक्षक MLC चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी डा. आकाश अग्रवाल ने भाजपा प्रत्याशी डा. दिनेश चंद्र वशिष्ठ को 2,376 वोट से हराया था। आकाश के सपा में आने से क्या बदलेगा? 1. सपा को मिलेगा जाना-पहचाना चेहरा आकाश अग्रवाल पहले से इस सीट के निर्वाचित एमएलसी हैं। उनके चुनावी अनुभव और शिक्षक मतदाताओं के बीच बने संपर्क का लाभ सपा को मिल सकता है। पार्टी को अब नए चेहरे के बजाय एक ऐसे प्रत्याशी के साथ उतरने का मौका मिला है, जो पिछला चुनाव जीत चुका है। 2. भाजपा के सामने पुराना प्रदर्शन दोहराने की चुनौती भाजपा ने इस बार आगरा खंड शिक्षक सीट से इंजीनियर हरिकिशोर तिवारी को प्रत्याशी बनाया है। 2020 में पार्टी को इस सीट पर हार का सामना करना पड़ा था। अब संगठन के सामने अपने प्रत्याशी के पक्ष में शिक्षक मतदाताओं को एकजुट करने की चुनौती होगी। 3. व्यक्तिगत समर्थन बनाम पार्टी संगठन आकाश की पिछली जीत निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर हुई थी। अब वे सपा के चुनाव चिह्न और संगठनात्मक समर्थन के साथ मैदान में होंगे। सवाल यह है कि उनके व्यक्तिगत समर्थक कितने सक्रिय रहते हैं और सपा का परंपरागत मतदाता वर्ग उन्हें कितना अतिरिक्त समर्थन देता है। 4. भाजपा को संगठन की ताकत का मिलेगा इम्तिहान भाजपा के पास बूथ स्तर तक संगठन और चुनाव प्रबंधन की ताकत है। पार्टी इस ताकत को शिक्षक मतदाताओं तक कितनी प्रभावी ढंग से पहुंचाती है, यह परिणाम को प्रभावित कर सकता है। वहीं, आकाश अग्रवाल के लिए अपनी पिछली जीत को सपा के उम्मीदवार के रूप में दोहराना बड़ी कसौटी होगी। भाजपा और सपा की स्थिति क्या रहेगी?
मौजूदा परिस्थितियों में आकाश अग्रवाल के सपा में आने से मुकाबला पहले से ज्यादा रोचक नजर आता है। सपा को अनुभवी और पहले से चुनाव जीत चुके प्रत्याशी का लाभ मिल सकता है, जबकि भाजपा को अपने संगठन और प्रत्याशी की व्यक्तिगत स्वीकार्यता के सहारे चुनौती देनी होगी। चुनाव में इन मुद्दों पर रहेगी नजर

