छह दशक से कुंदगोल में गूंज रही बाबा रामदेव की आस्था, राजस्थान के संगमरमर की प्रतिमा और भाद्रपद शुक्ल दशमी पर ध्वजा चढ़ाने की परंपरा

छह दशक से कुंदगोल में गूंज रही बाबा रामदेव की आस्था, राजस्थान के संगमरमर की प्रतिमा और भाद्रपद शुक्ल दशमी पर ध्वजा चढ़ाने की परंपरा

छह दशक पहले हुआ मंदिर का निर्माण

बताया जाता है कि मंदिर का निर्माण करीब छह दशक पहले राजस्थान मूल के बालोतरा जिले के सिवाना निवासी मिसरीमल राजाजी ओस्तवाल परिवार की ओर से करवाया गया था। तब से यहां बाबा रामदेव की पूजा-अर्चना की परंपरा निरंतर चली आ रही है। मंदिर में स्थापित बाबा रामदेव की करीब तीन फीट ऊंची प्रतिमा राजस्थान के संगमरमर से निर्मित है। मंदिर परिसर में बाबा रामदेव से संबंधित अन्य प्रतिमाओं के साथ लाछा बाई और सुगना बाई की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं।

लाछा गुजरी से जुड़ी है लोकआस्था

राजस्थान की लोकपरंपरा में बाबा रामदेव को रामसा पीर के रूप में श्रद्धा से स्मरण किया जाता है। बाबा रामदेव की लोककथाओं में लाछा गुजरी का विशेष उल्लेख मिलता है। लोकमान्यता के अनुसार लाछा गुजरी बाबा रामदेव की अनन्य भक्त थीं। उनकी भक्ति से जुड़ी अनेक लोककथाएं राजस्थान में प्रचलित हैं। मंदिर परिसर में स्थापित प्रतिमाएं इसी लोकआस्था और परंपरा से जुड़ी धार्मिक भावना को दर्शाती हैं।

भाद्रपद शुक्ल दशमी पर चढ़ती है ध्वजा

मंदिर में हर वर्ष भाद्रपद शुक्ल दशमी के अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना के साथ ध्वजा चढ़ाने की परंपरा है। यह ध्वजा मूथा वागमल भूराजी परिवार की ओर से चढ़ाई जाती है। ध्वजा चढ़ाने के अवसर पर मूथा वागमल भूराजी चैरिटेबल ट्रस्ट की ओर से श्रद्धालुओं के लिए प्रसाद की व्यवस्था की जाती है। ट्रस्ट की ओर से अन्य धार्मिक और सामाजिक अवसरों पर भी समय-समय पर सहयोग किया जाता है।

शिवानन्द मठ के मार्गदर्शन में मंदिर की देखरेख

वर्तमान में मंदिर की देखरेख कुंदगोल के शिवानन्द मठ के मलया महास्वामी और शिवानन्द स्वामी के मार्गदर्शन में की जा रही है। कुंदगोल में राजस्थान मूल के कुछ परिवार वर्तमान में भी निवास करते हैं और मंदिर की धार्मिक गतिविधियों में सहभागिता निभाते हैं। मंदिर में आसपास के श्रद्धालुओं के साथ स्कूली बच्चे भी दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

बालिकाओं के छात्रावास से भी जुड़ा मंदिर

मंदिर के पास करीब 30 वर्ष पहले बालिकाओं के लिए छात्रावास का निर्माण भी किया गया था। वर्तमान में इसमें करीब 70 बालिकाएं रह रही हैं। इससे मंदिर की गतिविधियां केवल धार्मिक क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सामाजिक सरोकारों से भी जुड़ी हुई हैं।

श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र

मलया महास्वामी, शिवानन्द मठ, कुंदगोल ने बताया, बाबा रामदेव का यह मंदिर लंबे समय से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है। यहां नियमित पूजा-पाठ और धार्मिक आयोजनों के माध्यम से परंपरा निरंतर आगे बढ़ रही है।

धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ा मंदिर

शिवानन्द स्वामी, शिवानन्द मठ, कुंदगोल ने कहा, कुंदगोल में बाबा रामदेव की भक्ति के साथ राजस्थान की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा भी जुड़ी हुई है। मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव होता है।

आसपास के लोगों की भी सहभागिता

रमेश बाफना मोकलसर, चेयरमैन, मूथा वागमल भूराजी चैरिटेबल ट्रस्ट ने बताया, बाबा रामदेव सभी के आराध्य हैं और उनके प्रति श्रद्धालुओं की गहरी आस्था है। मंदिर में होने वाले धार्मिक आयोजनों से आसपास के लोगों की भी सहभागिता बनी रहती है।

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