सिरसा के कुत्ताबढ़ निवासी फौजी सुखचैन सिंह की शहादत के बाद सरकार एवं प्रशासन द्वारा ढुलमिल रवैये के कारण परिवार में नाराजगी कम नहीं हो पाई है। फौजी सुखचैन की शहादत पर गांव ही नहीं आसपास गांवों के हजारों लोग शोक जताने उनके गांव पहुंचे थे और उनकी शहादत को नमन किया था। एक कारण ये भी हैं कि सुखचैन सिंह शहीद होने वाले गांव के इकलौते जवान थे।
परिवार में ममेरे भाई जसपाल सिंह ने दैनिक भास्कर एप की टीम से बातचीत में बताया, सुखचैन सिंह करीब पांच पहले छुट्टी पर आया था। उस समय अपने छोटे भाई सरबजीत सिंह और छोटी बहन हरजिंदर कौर की शादी करवाई और छुट्टी पूरी कर वापस राजौरी में ड्यूटी पर गया था। इसकी कुछ फोटोज-वीडियो भी सामने आई है, जिसमें सुखचैन सिंह ने अंतिम बार परिवार के साथ खुशियां मनाते हुए दिख रहे हैं।
ये परिवार के लिए अंतिम खुशियां बनकर रह गई। उनकी मां शौक में गमगीन है और पत्नी निर्मल कौर धैर्य रखे हुए है और बेटा आकाशदीप उम्र में कम होने के कारण उसे ये तक नहीं पता कि पिता शहीद हो गए। जसपाल बोले, सुखचैन के ममेरे भाई भूपेंद्र सिंह की नवंबर में शादी तय होनी है। ऐसे में बेटे के जन्मदिन और मामा के लड़के की शादी के लिए ही वह कुछ दिन बाद छुट्टी पर आना था। राज्य सरकार से ज्यादा नाराजगी
शहीद के परिवार में हरियाणा सरकार के प्रति ज्यादा नाराजगी है। उनकी मांग है कि हरियाणा सरकार द्वारा भी शहीद के परिवार को एक करोड़ आर्थिक मदद और उनके छोटे भाई को सरकारी नौकरी दी जाए। ये भी आरोप लगाए कि बाद में कोई किसी की नहीं सुनता। परिवार को परेशानी उठानी पड़ती है। ये मांग परिवार व ग्रामीणों ने अंतिम यात्रा के समय भी उठाई थी।
उस समय सरकार का कोई नुमाइंदा नहीं पहुंचा था और ग्रामीणों ने उनके साथ होने की बात कहकर अंतिम यात्रा को बाद में शुरू करवाया था। हालांकि, सेना अधिकारियों द्वारा शहीद का दर्जा देने, एक करोड़ आर्थिक मदद व नौकरी देने का आश्वासन दिया है। मगर परिवार सरकार से भी अतिरिक्त मदद की मांग कर रहा है, ताकि उनका परिवार गुजारा कर सके। परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर
शहीद सुखचैन सिंह के परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर है। उनके पास जमीन भी नहीं है और घर भी हाल ही में ठीक-ठाक बनाया है और आंगन कच्चा है। सुखचैन की सात साल की उम्र में पिता बलविंद्र सिंह का साया छीन गया और मां ने बच्चों को पढ़ाया-लिखाया। सुखचैन पढ़-लिखकर 18 साल की उम्र में सेना में भर्ती हुआ और परिवार की जिम्मेदारी संभाली। फुटबॉल का खिलाड़ी था सुखचैन
ग्रामीणों के अनुसार, सुखचैन सिंह फुटबॉल के उम्मदा खिलाड़ी थे और उन्होंने खेल की मेंबरशिप ली हुई थी। वे बच्चों व युवाओं के लिए प्रेरणास्त्रोत थे। इसीलिए गांव ने प्रशासन से गांव का नाम शहीद सुखचैन सिंह के नाम रखने सहित तीन मांगें रखी है। ग्रामीणों ने किया था चुनाव का बहिष्कार
इससे पहले कुत्ताबढ़ गांव में घग्घर नदी पर पुल बनाए जाने की मांग को लेकर ग्रामीणों द्वारा कठोर फैसला लिया गया था। ग्रामीणों द्वारा चुनाव का बहिष्कार किया गया था। ऐसे में सरकार की ओर से भाजपा प्रत्याशी सुनीता दुग्गल ने गांव में पहुंचकर पुल का निर्माण करवाने का आश्वासन दिया था। तब जाकर घग्गर पुल का काम शुरू हुआ। इसके बाद ग्रामीणों ने मतदान किया था।
इसके बावजूद आज भी पुल का पूरा नहीं हुआ है। पुल और इसके आसपास का रोड बनना अधर में लटका पड़ा है। इससे ग्रामीण और यहां से गुजरने वाले वाहन चालक परेशान है। रोड पर बिखरे पत्थर-रोड़ो से एक्सीडेंट होने का भी डर रहता है।

