बिहार में बड़ी संख्या में अल्ट्रासाउंड केंद्र बिना रजिस्ट्रेशन के संचालित हो रहे हैं। राज्य स्वास्थ्य समिति, बिहार से सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मिली जानकारी में इसका खुलासा हुआ है। RTI से मिली जानकारी के मुताबिक, राज्य के 10 जिलों में कुल 1963 अल्ट्रासाउंड केंद्रों में से 775 बिना रजिस्ट्रेशन के चल रहे हैं। इन 10 जिलों में केवल 1188 अल्ट्रासाउंड केंद्रों का ही PC-PNDC एक्ट के तहत रजिस्ट्रेशन है। सबसे गंभीर स्थिति राजधानी पटना की है। जिले में कुल 556 अल्ट्रासाउंड केंद्र हैं, जिनमें 180 बिना रजिस्ट्रेशन के चल रहे हैं। यानी पटना में करीब 32% केंद्रों का रजिस्ट्रेशन नहीं है। बिहार के 10 जिलों की यह स्थिति अल्ट्रासाउंड केंद्र खोलने के लिए अनिवार्य रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया के उल्लंघन को दर्शाती है। पटना में हर तीन में से एक अल्ट्रासाउंड केंद्र अवैध RTI के आंकड़ों के मुताबिक, पटना में 376 अल्ट्रासाउंड केंद्र निबंधित हैं, जबकि 180 केंद्र बिना रजिस्ट्रेशन के चल रहे हैं। यानी करीब हर तीन केंद्रों में से एक अल्ट्रासाउंड केंद्र अवैध रूप से चल रहा है। बिना निबंधन वाले केंद्रों की संख्या केवल शहरी इलाकों तक सीमित नहीं है। RTI के आंकड़ों से यह भी सामने आया है कि बिना निबंधन वाले अधिकांश अल्ट्रासाउंड केंद्र प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) के आसपास संचालित हो रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में अल्ट्रासाउंड सुविधा की कमी के कारण मरीजों को अक्सर इन निजी केंद्रों का सहारा लेना पड़ता है। ऐसे में मरीज और उनके परिजन अक्सर रजिस्ट्रेशन की जांच किए बिना ही अल्ट्रासाउंड करा लेते हैं। इन केंद्रों पर मरीजों से मनमानी राशि वसूलने और गलत या संदिग्ध रिपोर्ट देने के आरोप भी लगते हैं, जिससे इलाज के दौरान मरीजों को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। सरकारी अस्पतालों में मशीनें हैं, रेडियोलॉजिस्ट नहीं एक तरफ बड़ी संख्या में निजी अल्ट्रासाउंड केंद्र बिना निबंधन चल रहे हैं। वहीं, दूसरी ओर सरकारी अस्पतालों में मशीनें उपलब्ध होने के बावजूद मरीजों को जांच के लिए बाहर जाना पड़ रहा है। न्यू गार्डिनर रोड अस्पताल, गर्दनीबाग अस्पताल और दानापुर अस्पताल में अल्ट्रासाउंड मशीनें उपलब्ध हैं, लेकिन रेडियोलॉजिस्ट की कमी के कारण नियमित जांच की सुविधा शुरू नहीं हो सकी है। बिना रजिस्ट्रेशन वाले केंद्रों पर होगी कार्रवाई पटना के सिविल सर्जन योगेंद्र प्रसाद मंडल ने कहा, ‘बिना रजिस्ट्रेशन अल्ट्रासाउंड केंद्र चलाना नियमों के खिलाफ है। स्वास्थ्य विभाग को मरीजों और उनके परिजनों की ओर से ऐसे केंद्रों की जानकारी और शिकायतें मिली हैं।’ बिहार के 10 जिलों में 775 अल्ट्रासाउंड केंद्र अवैध RTI से मिली जानकारी के मुताबिक, दस जिलों में से पूर्वी चंपारण में 130 और पश्चिमी चंपारण में 90 केंद्र बिना निबंधन के चल रहे हैं। मधुबनी और दरभंगा में 70-70, रोहतास में 55, सारण और पूर्णिया में 50-50, गोपालगंज में 45, बक्सर में 35 ऐसे केंद्र हैं। ऐसे करें रजिस्टर्ड अल्ट्रासाउंड केंद्र की पहचान अल्ट्रासाउंड कराने से पहले मरीज और परिजनों को कुछ बातों की जांच जरूर करनी चाहिए— 180 केंद्रों की जांच पर उठे सवाल? पटना जैसे बड़े जिले में 556 अल्ट्रासाउंड केंद्रों में से 180 का बिना निबंधन संचालन स्वास्थ्य व्यवस्था और पीसी-पीएनडीटी कानून के पालन पर गंभीर सवाल खड़े करता है। खासकर उन इलाकों में, जहां सरकारी अस्पतालों में अल्ट्रासाउंड की सुविधा उपलब्ध नहीं है, वहां मरीज निजी केंद्रों पर निर्भर हैं। ऐसे में स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वह केंद्रों के रजिस्ट्रेशन की नियमित जांच करे और बिना रजिस्टर्ड संचालित केंद्रों पर समय रहते कार्रवाई सुनिश्चित करे। बिहार में बड़ी संख्या में अल्ट्रासाउंड केंद्र बिना रजिस्ट्रेशन के संचालित हो रहे हैं। राज्य स्वास्थ्य समिति, बिहार से सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मिली जानकारी में इसका खुलासा हुआ है। RTI से मिली जानकारी के मुताबिक, राज्य के 10 जिलों में कुल 1963 अल्ट्रासाउंड केंद्रों में से 775 बिना रजिस्ट्रेशन के चल रहे हैं। इन 10 जिलों में केवल 1188 अल्ट्रासाउंड केंद्रों का ही PC-PNDC एक्ट के तहत रजिस्ट्रेशन है। सबसे गंभीर स्थिति राजधानी पटना की है। जिले में कुल 556 अल्ट्रासाउंड केंद्र हैं, जिनमें 180 बिना रजिस्ट्रेशन के चल रहे हैं। यानी पटना में करीब 32% केंद्रों का रजिस्ट्रेशन नहीं है। बिहार के 10 जिलों की यह स्थिति अल्ट्रासाउंड केंद्र खोलने के लिए अनिवार्य रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया के उल्लंघन को दर्शाती है। पटना में हर तीन में से एक अल्ट्रासाउंड केंद्र अवैध RTI के आंकड़ों के मुताबिक, पटना में 376 अल्ट्रासाउंड केंद्र निबंधित हैं, जबकि 180 केंद्र बिना रजिस्ट्रेशन के चल रहे हैं। यानी करीब हर तीन केंद्रों में से एक अल्ट्रासाउंड केंद्र अवैध रूप से चल रहा है। बिना निबंधन वाले केंद्रों की संख्या केवल शहरी इलाकों तक सीमित नहीं है। RTI के आंकड़ों से यह भी सामने आया है कि बिना निबंधन वाले अधिकांश अल्ट्रासाउंड केंद्र प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) के आसपास संचालित हो रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में अल्ट्रासाउंड सुविधा की कमी के कारण मरीजों को अक्सर इन निजी केंद्रों का सहारा लेना पड़ता है। ऐसे में मरीज और उनके परिजन अक्सर रजिस्ट्रेशन की जांच किए बिना ही अल्ट्रासाउंड करा लेते हैं। इन केंद्रों पर मरीजों से मनमानी राशि वसूलने और गलत या संदिग्ध रिपोर्ट देने के आरोप भी लगते हैं, जिससे इलाज के दौरान मरीजों को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। सरकारी अस्पतालों में मशीनें हैं, रेडियोलॉजिस्ट नहीं एक तरफ बड़ी संख्या में निजी अल्ट्रासाउंड केंद्र बिना निबंधन चल रहे हैं। वहीं, दूसरी ओर सरकारी अस्पतालों में मशीनें उपलब्ध होने के बावजूद मरीजों को जांच के लिए बाहर जाना पड़ रहा है। न्यू गार्डिनर रोड अस्पताल, गर्दनीबाग अस्पताल और दानापुर अस्पताल में अल्ट्रासाउंड मशीनें उपलब्ध हैं, लेकिन रेडियोलॉजिस्ट की कमी के कारण नियमित जांच की सुविधा शुरू नहीं हो सकी है। बिना रजिस्ट्रेशन वाले केंद्रों पर होगी कार्रवाई पटना के सिविल सर्जन योगेंद्र प्रसाद मंडल ने कहा, ‘बिना रजिस्ट्रेशन अल्ट्रासाउंड केंद्र चलाना नियमों के खिलाफ है। स्वास्थ्य विभाग को मरीजों और उनके परिजनों की ओर से ऐसे केंद्रों की जानकारी और शिकायतें मिली हैं।’ बिहार के 10 जिलों में 775 अल्ट्रासाउंड केंद्र अवैध RTI से मिली जानकारी के मुताबिक, दस जिलों में से पूर्वी चंपारण में 130 और पश्चिमी चंपारण में 90 केंद्र बिना निबंधन के चल रहे हैं। मधुबनी और दरभंगा में 70-70, रोहतास में 55, सारण और पूर्णिया में 50-50, गोपालगंज में 45, बक्सर में 35 ऐसे केंद्र हैं। ऐसे करें रजिस्टर्ड अल्ट्रासाउंड केंद्र की पहचान अल्ट्रासाउंड कराने से पहले मरीज और परिजनों को कुछ बातों की जांच जरूर करनी चाहिए— 180 केंद्रों की जांच पर उठे सवाल? पटना जैसे बड़े जिले में 556 अल्ट्रासाउंड केंद्रों में से 180 का बिना निबंधन संचालन स्वास्थ्य व्यवस्था और पीसी-पीएनडीटी कानून के पालन पर गंभीर सवाल खड़े करता है। खासकर उन इलाकों में, जहां सरकारी अस्पतालों में अल्ट्रासाउंड की सुविधा उपलब्ध नहीं है, वहां मरीज निजी केंद्रों पर निर्भर हैं। ऐसे में स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वह केंद्रों के रजिस्ट्रेशन की नियमित जांच करे और बिना रजिस्टर्ड संचालित केंद्रों पर समय रहते कार्रवाई सुनिश्चित करे।

