RSS Chief Mohan Bhagwat बोले, भारत को विश्वगुरु बनाने के खिलाफ काम कर रही हैं कई ताकतें

RSS Chief Mohan Bhagwat बोले, भारत को विश्वगुरु बनाने के खिलाफ काम कर रही हैं कई ताकतें

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने शनिवार को लोगों से देश को खुशहाल, समृद्ध और सुरक्षित बनाकर भारत की स्वतंत्रता को मजबूत करने का आह्वान किया, ताकि देश दुनिया में सार्थक योगदान दे सके और ‘‘विश्वगुरु’’ बन सके। भागवत ने कहा कि कई लोग और ताकतें इस लक्ष्य के खिलाफ काम कर रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि व्यक्तियों के विचार भिन्न हो सकते हैं, लेकिन यह विविधता एकता को ही व्यक्त करती है।

संघ प्रमुख ने नागपुर स्थित संघ मुख्यालय में 80वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर तिरंगा फहराने के बाद एक सभा को संबोधित करते हुए लोगों से आग्रह किया कि वे मूल सिद्धांतों से समझौता किए बिना राष्ट्र को मजबूत करें और चुनौतियों का सामना करते हुए इसे ‘‘विश्वगुरु’’ बनाएं। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता दिवस सभी भारतीयों के लिए गर्व एवं उत्सव का विषय है और यदि 1857 से स्वतंत्रता संग्राम की अवधि को देखा जाए, तो देश के पूर्वजों ने आजादी हासिल करने के लिए लगभग 90 वर्षों तक निरंतर बलिदान दिया। भागवत ने हिंदुत्व विचारक वी. डी. सावरकर का उल्लेख करते हुए कहा कि यह नागरिकों का दायित्व है कि स्वतंत्रता से हासिल सभी श्रेष्ठ एवं प्रगतिशील उपलब्धियां राष्ट्र का हिस्सा बनें।

भागवत ने कहा, ‘‘जब हम राष्ट्रीय ध्वज फहराते हैं, तो इसके रंग महत्वपूर्ण संदेश देते हैं।’’
उन्होंने कहा कि केसरिया रंग कर्म, ज्ञान और त्याग का प्रतीक है। सरसंघचालक ने कहा, ‘‘किसी राष्ट्र की स्वतंत्रता कड़ी मेहनत और बलिदान से हासिल होती है और स्वतंत्रता के बाद यही गुण राष्ट्र को समृद्ध एवं सुरक्षित बनाने में मदद करते हैं। केसरिया रंग लोगों को त्याग और समर्पण की आवश्यकता की याद दिलाता है।’’
उन्होंने कहा कि सफेद रंग पवित्रता का प्रतिनिधित्व करता है और लोगों को अनुशासन का पालन करने के लिए प्रेरित करता है तथा निरंतर यह आत्मनिरीक्षण करने के लिए कहता है कि वे इसका पालन कर रहे हैं या नहीं।

उन्होंने कहा कि इन प्रयासों का परिणाम समृद्धि है, जिसे ध्वज का हरा रंग दर्शाता है। भागवत ने कहा कि व्यक्ति के रूप में लोग अलग-अलग हैं और इसलिए उनके विचार भी भिन्न हो सकते हैं। उन्होंने कहा, ‘‘हालांकि, यह विविधता भी एकता को ही व्यक्त करती है।

अशोक चक्र में कई तीलियां हैं, लेकिन वे सभी एक ही केंद्रीय बिंदु से निकलती हैं।’’
भागवत ने कहा कि यह चक्र (अशोक चक्र) व्यक्तिगत और सामाजिक जागरुकता का प्रतिनिधित्व करता है। उन्होंने उल्लेख किया कि इसकी नुकीली तीलियों को धर्म यानी अनुशासन की सीमाओं के भीतर रखा गया है ताकि समाज सुचारू रूप से कार्य करे। भागवत ने कहा, ‘‘हालांकि, हमें राष्ट्र को खुशहाल, समृद्ध एवं सुरक्षित बनाना होगा तथा यह सुनिश्चित करना होगा कि यह दुनिया में अपना उचित योगदान दे लेकिन कई लोग और ताकतें इस लक्ष्य के खिलाफ काम कर रही हैं और हमारे रास्ते में खड़ी हैं।

फिर भी, हमें अपने सिद्धांतों को छोड़े बिना दुनियाभर में इन चुनौतियों का सामना करना होगा और भारत को एक ऐसा राष्ट्र बनाना होगा जिसे ‘विश्वगुरु’ के तौर पर देखा जाए।

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